लोकसभा चुनावों से पहले राष्ट्रीय दल कांग्रेस को आईना दिखा रही हैं क्षेत्रीय पार्टियां

By अजय कुमार | Mar 13, 2023

आम चुनाव 2024 की सरगर्मी तेज होती जा रही है। बीजेपी और उसके गठबंधन सहयोगी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पीछे लामबंद हैं तो कांग्रेस राहुल के नेतृत्व में विपक्ष को गोलबंद होते देखना चाहती है, लेकिन विरोधी हैं कि राहुल को अपना नेता ही मानने को तैयार नहीं हैं। कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश सबसे बड़ी मुसीबत बना हुआ है। यहां न तो समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव और न ही बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती को कांग्रेस का साथ रास आ रहा है। ऐसा नहीं है कि इन तीनों दलों में विचारधारा की बात आड़े आ रही हो, लेकिन तीनों दलों के नेताओं का ईगो और सियासी ताकत अलग-अलग होने की वजह से कोई किसी का ‘हाथ’ नहीं थामना चाहता है। वैसे भी कांग्रेस आलाकमान यूपी पर ज्यादा ध्यान नहीं दे रहा है। यहां तक कि राहुल गांधी 2019 में अमेठी से लोकसभा चुनाव हारने के यहां से पूरी तरह से गायब हो गए हैं। सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली का भी यही हाल है। इस बीच प्रियंका वाड्रा के जरूर कभी-कधार रायबेरली से चुनाव लड़ने की चर्चा छिड़ जाती है, लेकिन यूपी में उनकी सक्रियता चुनावी समय में ही देखने को मिलती है।

    

लोकसभा चुनाव में करीब साल भर का समय बचा है। ऐसे में स्वाभाविक है कि विभिन्न राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारियां भी तेज कर दी हैं। कुछ समय पहले भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हुई तो हाल में कांग्रेस का महाधिवेशन हुआ। दोनों दलों ने अपने इन आयोजनों में 2024 लोकभा चुनाव के लिए सीधी लाइन खींचने की भी कोशिश की। इस बीच विपक्षी एकता के प्रयास भी तेज हुए, वहीं भाजपा गठबंधन को लेकर ज्यादा चिंतित नहीं दिखी, जबकि पंजाब, तमिलनाडू, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना जैसे राज्यों में बीजेपी को अभी तका कोई बहुत बड़ी सफलता नहीं मिल पाई है। झारखंड और छत्तीसगढ़ भी उसके लिए थोड़ी बहुत चिंता का सबब बने हुए हैं। वहीं बात जब गैर बीजेपी गठबंधनों के प्रयासों की होती है तो निश्चित रूप से प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ही इन प्रयासों के केंद्र में दिखाई देती है। हालांकि कांग्रेस ही इसके लिए पूरी तरह से तैयार नजर नहीं आती है। एक ओर वह विपक्षी एकता के लिए कोई भी कीमत अदा करने के लिए तैयार होने की बात करती है तो दूसरी ओर जदयू नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जैसे सहयोगियों के गठबंधन की कोशिशों को गम्भीरता से नहीं लेती है। उस पर काग्रेस का तुर्रा यह है कि उसके बिना भाजपा के विरुद्ध किसी भी राजनीतिक गोलबंदी की कवायद मुश्किल है। यह बात सही है कि राष्ट्रीय स्तर की पार्टी होने के साथ कांग्रेस के सबसे पुरानी पार्टी भी होने के नाते उसे विपक्षी एकता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाना चाहिए, लेकिन ऐसा होता दिख नहीं रहा है। इसीलिए विपक्षी एकता का प्रश्न भी बहुत जटिल बना हआ है।

बहरहाल, कांग्रेस की गठबंधन की इच्छा या मजबूरी की बात की जाए तो कुछ क्षेत्रीय दल ऐसे हैं जिन्हें कांग्रेस के नेतृत्व में कोई समस्या नहीं और वे वर्तमान में भी पार्टी के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। जैसे झारखंड में झामुमो और तमिलनाडु में द्रमुक। यह और बात है कि राष्ट्रीय दल का रूतबा रखने के बाद भी दोनों ही जगह कांग्रेस राज्य सरकार की बी टीम बनी हुई है। इसी तरह से महाराष्ट्र में राकांपा और उद्धव ठाकरे की पार्टी को भी ऐसे ही दलों की श्रेणी में रखा जा सकता है जो कांग्रेस को साथ लेकर चलने को तैयार है, लेकिन यह दोनों दल कांग्रेस को ज्यादा जिताऊ पार्टी नहीं मानते हैं। बात बिहार की कि जाए तो यहां जनता दल युनाइटेड (जदयू) और राजद कांग्रेस के पाले में हैं तो, लेकिन कुछ किंतु-परंतु के साथ। कांग्रेस की यही स्थिति सपा, बसपा और जनता दल-सेक्युलर जैसे दलों के साथ है, जिनके साथ कांग्रेस ने अतीत में गठबंधन किया, पर इससे किसी को विशेष चुनावी लाभ नहीं हो पाया। इसी प्रकार से ओडिशा में बीजू जनता दल (बीजद), भारत राष्ट्र समिति और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस जैसे दलों के साथ कांग्रेस का पेंच फंसा है, जिनका अपने राजनीतिक गढ़ में कांग्रेस से सीधा मुकाबला है। वहीं आम आदमी पार्टी जैसे दल भी हैं जो स्वयं को राष्ट्रीय परिदृश्य में कांग्रेस के विकल्प के रूप में प्रस्तुत करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।

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लब्बोलुआब यह है कि विपक्षी दलों में व्यापक विविधता और उनके हितों को देखते हुए उनका एक छतरी के नीचे आना असंभव नहीं, किंतु कठिन अवश्य है। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में भाजपा के विरुद्ध किसी केंद्रीय महागठबंधन को सफल बनाने के लिए कुछ मुद्दों पर गंभीरता से मनन करना होगा। पहली कसौटी साझा न्यूनतम कार्यक्रम होगी। अभी तो यही स्थिति है कि विपक्षी दल विशेषकर कांग्रेस मुख्य रूप से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर निशाना साध कर या उन पर निजी हमले करके ही राजनीतिक बढ़त बनाने में लगी है, लेकिन यह रणनीति पहले भी फलदायी नहीं हुई है। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव के नतीजे इस बात के प्रमाण हैं। अच्छा होता कांग्रेस और अन्य बीजेपी विरोधी दल मोदी पर निजी हमला करने की बजाय महंगाई, बेरोजगारी और बढ़ती असमानता जैसे मुद्दों को उठाती जो कहीं ज्यादा प्रभावशाली हो सकते हैं। यदि विपक्ष बढ़ती असमानता जैसे किसी मुद्दे पर ही कुछ ठोस दलीलें रख पाए तो सरकार के विरोध में सार्थक राजनीतिक विमर्श गढ़कर अपने पक्ष में माहौल बना सकता है। महागठबंधन की एक चुनौती यह भी है कि गठबंधन होने की दशा में एक सर्वस्वीकार्य नेतृत्व बने। निःसंदेह कांग्रेस विपक्ष में सबसे बड़ी पार्टी है, मगर उसके नेतृत्व को लेकर विपक्षी खेमे में संदेह है। कांग्रेस के सबसे बड़े नेता राहुल गांधी का नेतृत्व पूरे विपक्षी खेमे को स्वीकार्य नहीं है।

बहरहाल, इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे कुछ राज्यों में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला है और यहां कांग्रेस का प्रदर्शन बेहतर न होने से भाजपा को बढ़त मिलती है और विपक्षी ताकत कमजोर पड़ जाती है। उत्तर-पश्चिम भारत में फिलहाल भाजपा के बढ़ते दबदबे का भी कांग्रेस को कोई तोड़ निकालना होगा। किसी संभावित महागठबंधन को लेकर एक व्यावहारिक प्रश्न यह भी खड़ा होता है कि ऐसी कोई पहल अगर विधानसभा चुनाव में सफल हो जाए तो आवश्यक नहीं कि लोकसभा चुनाव में भी उसे उतनी ही सफलता मिलेगी। उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे इसके तमाम उदाहरण हैं और ये ऐसे राज्य हैं जहां लोकसभा की अधिकांश सीटें हैं।

-अजय कुमार

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