सुन्नी भीड़ पर गोलियां, बहाई को मरने पर कब्र भी नसीब नहीं, भारतीय मुसलमानों को पीड़ित बताने वाले ईरान को आईना दिखाने वाली रिपोर्ट

By अभिनय आकाश | Sep 17, 2024

ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुर रसूलुल्लाह यानी अल्लाह के अलावा कोई दूसरा भगवान नहीं है। मोहम्मद साहब उसके सच्चे रसूल हैं। इस्लाम को मानने वाले दुनियाभर के मुसलमान खुद को इस्लाम के अनुयायी कहते हैं। लेकिन इस्लामी कानून की अपनी समझ और इसके इतिहास के मुताबिक इस्लाम के मानने वाले मुसलमान कई पंथों में बंटे हुए हैं। शिया और सुन्नी मुस्लिमों ने अलग-अलग विचारधारा अपना ली। सुन्नी मुस्लिमों ने सेक्युलर लीडरशिप चुनी। वहीं दूसरी ओर शिया मुस्लिम इमामों को अपना धार्मिक नेता मानते हैं, जिन्हें वह पैगंबर मोहम्मद के परिवार द्वारा नियुक्त किया हुआ मानते हैं। लेकिन शिया और सुन्नी के विवाद की अक्सर कहानी देखने और पढ़ने को मिलती रहती हैं। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनई ने कहा है कि भारत में मुसलमानो का उत्पीड़न हो रहा है। हालांकि भारत ने ईरान को आईना दिखा दिया है। लेकिन आपको बता दें कि भारत में अल्पसंख्यकों पर टिप्पणी करने वाले ईरान का अपना खुद का रिकॉर्ड इस मामले में बेहद खराब है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उसे इसको लेकर आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है। ईरान इसकी वजह से अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन के निशाने पर भी रहता है। ईरान के सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार देश की कुल आबादी में 99.4 प्रतिशत मुस्लिम आबादी रहती है। जिसमें 90 से 95 प्रतिशत शिया और पांच प्रतिशत के लगभग सुन्नी मुसलमान हैं। 

पैगबंर मोहम्मद की जयंती पर ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह खामनेई ने एक विवादित बयान दिया। उन्होंने भारतीय मुसलमानों को गाजा और म्यांमार में पीड़ित मुसलमानों के साथ जोड़ दिया। इसके बाद भारत के विदेश मंत्रालय का जवाब आया है। खामनेई ने अपने पोस्ट में लिखा था कि इस्लाम के दुश्मन हमेशा हमें इस्लामी उम्माह के तहत हमारी साझा पहचान के प्रति उदासीन बनाने की कोशिश करते हैं। अगर हम म्यांमार, गाजा, भारत या किसी और देश में मुसलमान की पीड़ा से अंजान हैं तो हम खुद को मुसलमान नहीं मान सकते। 

ईरान को भारत सरकार की तगड़ी चेतावनी

ये बयान भारत को गाजा में घट रहे त्रासदी के साथ तो जोड़ता ही है। साथ ही इसे दुनियाभर में मुसलमानों के साथ हो रही हिंसा से भी जोड़ता है। खामनेई के इस ट्वीट के तुरंत बाद भारत के विदेश मंत्रालय ने इसकी कड़ी निंदा की। एक आधिकारिक बयान जारी किया गया। इसमें कहा गया कि ईरान के सर्वोच्च नेता ने जो भारत के अल्पसंख्यकों के बारे में टिप्पणी की है, हम उसकी कड़ी निंदा करते हैं। ये गलत सूचना पर आधारित है और अस्वीकार्य है। अल्पसंख्यकों पर टिप्पणी करने वाले देशों को सलाह दी जाती है कि वे दूसरों के बारे में कोई भी टिप्पणी करने से पहले अपना रिकॉर्ड देखे। 

कुर्द सुन्नी महिला महसा अमीनी की हिरासत में मौत

एक तरफ खामनेई भारत पर टिप्पणी कर रहे हैं और उसी वक्त महिलाओं पर अत्याचार और अभिव्यक्ति की आजादी को सिमित करने के लिए ईरान की आलोचना की जा रही है। दिलचस्प ये है कि ईरान के सुप्रीम लीडर का ट्वीट 16 सितंबर को आया है। ठीक दो साल पहले 16 सितंबर 2022 को ही महसा अमिनि नाम की ईरानी युवती की पुलिस हिरासत में मौत हो गई थी। वो सिर्फ 22 साल की थी। उसे इस्लामिक ड्रेस कोड का पालन न करने के चलते गिरफ्तार किया गया था। कस्टडी में ही उसकी मौत हो गई। मौत से देशभर में व्यापक प्रदर्शन का दौर देखने को मिला था। 16 सितंबर 2024 को  34 ईरानी महिला कैदी भूख हड़ताल पर चली गई हैं और दर्जनों लोग उनकी मृत्यु को याद करने के लिए हिजाब वाले नियम का उल्लंघन कर रहे हैं। 

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धार्मिक अल्पसंख्यकों दमन के शिकार

भारत को अल्पसंख्यकों पर ज्ञान देने वाले ईरान का इस मामले में रिकॉर्ड बहुत ही खराब रहा है। मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल की 2023 की रिपोर्ट में कहा गया कि बहाई, ईसाई, गोनाबाड़ी दरवेश, यहूदी, सुन्नी मुस्लिम और यारेसन सहित धार्मिक अल्पसंख्यकों को कानून में भेदभाव का सामना करना पड़ा हैं, जिसमें शिक्षा, रोजगार, बच्चे को गोद लेने, राजनीतिक कार्यालयों और धार्मिक स्थलों तक पहुंच शामिल है। सैकड़ों लोगों को मनमाने ढंग से हिरासत में लिया जाता है। उनके खिलाफ अन्नयायपूर्ण तरीके से मुकदमा चलाया गया और यातनाएं दी गई।  

बहाईयों के साथ भेदभाव

बहाई अल्पसंख्यक लोगों के साथ ईरान में भेदभाव होता है। इनके हाई एजुकेशन पर बैन है और बिजनेस को जबरन बंद करना या उनकी संपत्तियों को जब्त करना, साथ ही बड़े पैमाने पर मनमाने ढंग से हिरासत में लेना तो आम बात है। अधिकारियों ने तेहरान में दशकों से इस्तेमाल किए जा रहे कब्रिस्तान में बहाई लोगों को दफनाने से भी रोक दिया और कई मृतक बहाई लोगों को जबरन पास के खवारन सामूहिक कब्र स्थल पर दफना दिया, जिसके बारे में माना जाता है कि वहां 1988 में जेल में हुए नरसंहार के पीड़ितों के अवशेष हैं। इस समुदाय को संविधान में दर्जा तक नहीं मिला है और संसद में इसके लिए एक भी सीट रिजर्व नहीं है।

शरणार्थियों और प्रवासियों के अधिकार

ईरान में लगभग 5 मिलियन अफ़गान नागरिकों को व्यापक भेदभाव का सामना करना पड़ता है।  शिक्षा, आवास, रोज़गार, स्वास्थ्य सेवा, बैंकिंग सेवाएँ और कहीं भी आने जाने की आजादी से जुड़ी पाबंदियां शामिल हैं।  सरकारी मीडिया और कुछ अधिकारियों ने अफ़गान शरणार्थियों के खिलाफ़ तीखी आलोचना की, जिससे ईरान में अफ़गान नागरिकों के खिलाफ़ नफ़रत भरे भाषण और घृणा अपराधों को बढ़ावा मिला।

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