By नीरज कुमार दुबे | Sep 29, 2026
भारतीय राजनीति में भगवानों के नाम पर सियासत कोई नई बात नहीं, लेकिन सवाल तब खड़ा होता है जब सत्ता की राजनीति में भगवानों को भी जाति, वर्ग और क्षेत्र के खांचों में बांटने की कोशिश होने लगे। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के ताजा बयान ने यही सवाल देश के सामने ला खड़ा किया है कि क्या अब भगवान राम और भगवान शिव को भी राजनीति के अलग-अलग खेमों में खड़ा किया जाएगा? क्या राम को अमीरों का और शिव को गरीबों का भगवान बताकर आस्था को भी वोटबैंक की राजनीति में बांटने की कोशिश होगी? सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि एक मुख्यमंत्री के मुंह से निकले ऐसे शब्द देश की धार्मिक और सामाजिक एकता को कहां ले जाएंगे?
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यहीं से विवाद ने राजनीतिक रूप ले लिया। केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता बंडी संजय कुमार ने रेड्डी पर भगवान राम और भगवान शिव के बीच राजनीतिक विभाजन खड़ा करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि तेलंगाना के मुख्यमंत्री को यह नहीं भूलना चाहिए कि उसी तेलंगाना में वेमुलवाड़ा को दक्षिण काशी और भद्राचलम को दक्षिण अयोध्या कहा जाता है। ऐसे में राम और शिव को उत्तर और दक्षिण की सीमाओं में बांटना उचित नहीं है। बंडी संजय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वाराणसी और काशी विश्वनाथ से जुड़ाव का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद नरेंद्र मोदी पहले प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने वेमुलवाड़ा स्थित श्री राजराजेश्वर स्वामी मंदिर का दौरा किया।
देखा जाये तो भारतीय राजनीति में धर्म को चुनावी हथियार बनाने की प्रवृत्ति कोई नई बात नहीं है। लेकिन जब राजनीति सीधे भगवानों के बीच भी वर्ग, क्षेत्र और विचारधारा की दीवार खड़ी करने लगे, तब सवाल सिर्फ किसी एक पार्टी या नेता का नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन में आस्था की मर्यादा का बन जाता है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी का ताजा बयान इसी वजह से गंभीर राजनीतिक बहस का विषय बन गया है। सवाल उठ रहा है कि भगवान राम और भगवान शिव को राजनीति के दो अलग-अलग खेमों में खड़ा करने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी? क्या किसी भी राजनीतिक दल के लिए यह उचित है कि करोड़ों लोगों की साझा आस्था को “अमीर बनाम गरीब” या “उत्तर बनाम दक्षिण” की राजनीतिक श्रेणियों में बांट दिया जाए?
वैसे रेवंत रेड्डी का यह पहला विवादित बयान नहीं है। दिसंबर 2025 में उन्होंने हिंदू देवी-देवताओं की संख्या और अलग-अलग पूजा परंपराओं को लेकर भी ऐसी टिप्पणियां की थीं, जिन पर भाजपा और अन्य विपक्षी दलों ने हिंदू आस्था का मजाक उड़ाने का आरोप लगाया था। यही वजह है कि अब यह सवाल और तेज हो रहा है कि रेवंत रेड्डी के राजनीतिक भाषणों में हिंदू आस्था ही बार-बार निशाने पर क्यों दिखाई देती है? यहां हम यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि यह सवाल उठाना किसी दूसरे धर्म के प्रति पूर्वाग्रह नहीं है; बल्कि उद्देश्य यह पूछना है कि सत्ता और राजनीति में धार्मिक आस्थाओं के साथ समान मर्यादा क्यों नहीं होनी चाहिए?
साथ ही यहां सवाल यह भी उठता है कि धर्म और भगवान पर टिप्पणी कर रहे मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी को हिंदू धर्म के बारे में कितना ज्ञान है? राम को अमीरों का भगवान बता रहे रेड्डी को शायद यह पता नहीं कि भगवान राम का शबरी के आश्रम में जाना और उनकी भक्ति स्वीकार करना, निषादराज गुह के साथ उनका आत्मीय संबंध तथा वनवासी समाज के लोगों के साथ उनका लगाव इस बात के उदाहरण हैं कि राम के लिए भक्त की सामाजिक या आर्थिक स्थिति जरा भी महत्व नहीं रखती। जिन राम ने पिता के वचन की लाज रखने के लिए सारा राजपाट छोड़कर वन की राह पकड़ ली उन्हें अमीरों का भगवान बताना बेशर्मी की पराकाष्ठा है। वहीं भगवान शिव की आराधना में भी भक्तिभाव को ही प्रमुख माना जाता है। एक और बात रेवंत रेड्डी को जाननी चाहिए कि रामचरितमानस के उत्तरकांड में भगवान राम स्वयं शिव की महिमा बताते हुए कहते हैं कि शंकर की आराधना के बिना उनकी भक्ति भी प्राप्त नहीं हो सकती। यानी जिस राम को राजनीति में “अमीरों का भगवान” और शिव को “गरीबों का भगवान” बताकर दो वर्गों में बांटने की कोशिश की जा रही है, उसी राम की परंपरा शिव को अपनी भक्ति का मार्ग बताती है।
देखा जाये तो रेड्डी के बयान के बाद कांग्रेस को यह बताना चाहिए कि क्या 'भगवानों को बांटना' उसकी नई राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है? राम को अमीर और शिव को गरीब बताकर आखिर हासिल क्या होगा? उत्तर भारत को राम और दक्षिण भारत को शिव से जोड़कर क्या देश की एकता मजबूत होगी? भगवान किसी पार्टी की संपत्ति नहीं हैं। न राम भाजपा के हैं, न शिव कांग्रेस के। आस्था करोड़ों भारतीयों की निजी और सांस्कृतिक विरासत है। राजनीति को अगर धर्म से दूरी नहीं रखनी है तो कम-से-कम धर्म के प्रति मर्यादा तो रखनी ही होगी। भगवानों के नाम पर वोट मांगने की राजनीति हो या भगवानों को ही राजनीति के अखाड़े में एक-दूसरे के सामने खड़ा करने की सियासत हो, दोनों ही रूपों में आस्था का राजनीतिक इस्तेमाल सवालों के कठघरे में खड़ा होता है।
-नीरज कुमार दुबे