By अनन्या मिश्रा | May 04, 2026
डायबिटीज एक वैश्विक समस्या के रूप में उभर रहा है। लगभर हर दूसरे घर में डायबिटीज का कोई न कोई मरीज नजर आता है। यही वजह है कि हाल के सालों में डायबिटीज के प्रति लोगों में जागरुकता बढ़ी है। खासकर जब किसी फैमिली में पेरेंट्स में किसी एक को डायबिटीज है, तो बच्चों में भी इसका खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में हर माता-पिता के मन में यह सवाल उठता है कि बच्चे को डायबिटीज होने से कैसे बचाया जा सकता है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि बच्चे को डायबिटीज कैसे होता है और इसको कैसे रोका जा सकता है।
टाइप 1 डायबिटीज एक ऑटोइम्यून कंडीशन है। अगर पुरुष को टाइप 1 डायबिटीज है, तो बच्चे को डायबिटीज होने की संभावना 17 में से 1 होती है। वहीं अगर मां को टाइप 1 डायबिटीज है और बच्चे का जन्म 25 साल से पहले हुआ है, तो उन बच्चों में टाइप 1 डायबिटीज का खतरा 25 में से 1 है। वहीं अगर बच्चे का जन्म 25 साल की उम्र के बाद हुआ, तो उनके बच्चों में इस डायबिटीज का खतरा 100 में से 1 है।
यह जीन और लाइफस्टाइल के मिश्रण से होने वाली समस्या है। अगर फैमिली में पहले से किसी को टाइप 2 डायबिटीज है, तो यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि आपकी डायबिटीज लाइफस्टाइल की वजह से है या फिर जेनेटिक्स की वजह से है।
जब पेरेंट्स से ऐसे जीन मिलते हैं, जोकि बॉडी को इंसुलिन का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं करने देते हैं। तो टाइप 2 डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है। जब हमारे सेल्स इंसुलिन की बात मानना बंद कर देते हैं, जिसको हम इंसुलिन रेजिस्टेंस कहते हैं। इससे हमारे ब्लड में शुगर का लेवल बढ़ने लगता है।
बता दें कि पैनक्रियाज वह अंग है, जिसमें बीटा सेल्स होती हैं। इसका काम इंसुलिन हार्मोन प्रोड्यूस करना होता है। इंसुलिन का काम ब्लड से शुगर यानी ग्लूकोज को निकालकर बॉडी की सेल्स तक पहुंचाना है। जिससे हमको एनर्जी मिल सके। इंसुलिन रेजिस्टेंस के कारण पैनक्रियाज बीटा सेल्स नहीं बना पाती है। ऐसे में भी डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है।
अगर फैमिली में किसी को पहले डायबिटीज है, साथ ही उनकी लाइफस्टाइल भी खराब है, तो डायबिटीज का रिस्क ज्यादा बढ़ जाता है। जो बचपन में ज्यादा कैलोरी वाला खाना खाते हैं, उनका वेट ज्यादा है और अक्सर तनाव में रहते हैं, तो डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है।
आंखों की रोशनी में अचानक बदलाव होना।
घाव भरने में अधिक समय लगना।
बहुत ज्यादा प्यास लगना।
बिना कारण वजन घटना
बार-बार पेशाब आना।
त्वचा का काला पड़ना।
थकान और कमजोरी।
एचबीए1सी टेस्ट के जरिए पिछले 2 से 3 महीनों का औसत शुगर लेवल का पता लगाया जा सकता है। बच्चों में डायबिटीज का पता लगाने के लिए यह सबसे आसान टेस्ट है। क्योंकि इस टेस्ट के लिए बच्चे को भूखे रहने की भी जरूरत नहीं है।
सुबह खाली पेट यह टेस्ट किया जाता है। इस टेस्ट से पहले आमतौर पर बच्चे को कम से कम 8 से 10 घंटे तक भूखे रहना होता है। इस दौरान बच्चा सिर्फ पानी पी सकता है। यह प्री-डायबिटीज और डायबिटीज का पता लगाने का आसान तरीका है।
इसमें ग्लूकोज वाला पानी पिलाया जाता है। फिर उसको 2 घंटे बाद शुगर लेवल चेक किया जाता है। ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट से पता चलता है कि बॉडी किस तरह से शुगर को हैंडल कर रहा है।
अगर माता-पिता को डायबिटीज है, तो उनको अपने बच्चे की डाइट का खास ख्याल रखना चाहिए। बच्चे को प्रोसेस्ड फूड और चीनी जैसे- पैकेट बंद जूस, बिस्किट, कोल्ड ड्रिंक्स और चॉकलेट्स बहुत कम मात्रा में दें।बच्चों में डाइट मुख्य रूप से जेनेटिक डायबिटीज को ट्रिगर करती है। जोकि आनुवांशिक रूप से संवेदनशील बच्चों में ऑटोइम्यूनिटी के लिए एक एंवायरमेंट फैक्टर्स के रूप में काम करती हैं। या फिर इंसुलिन रेजिस्टेंस को बढ़ावा देती है। पेरेंट्स को बच्चों की डाइट में फाइबर की मात्रा को बढ़ाना चाहिए। वहीं उनकी डाइट में सलाद और हरी पत्तेदार सब्जियों को जरूर शामिल करें।
आज के समय में बच्चों का स्क्रीन टाइम काफी बढ़ गया है। कई बच्चे घंटों तक मोबाइल पर समय बिताते हैं। जितना ज्यादा स्क्रीन टाइम होता है, टाइप 2 डायबिटीज का खतरा उतना बढ़ जाता है। क्योंकि स्क्रीन टाइम के समय बच्चे निष्क्रिय बैठते हैं, जिससे मांसपेशियां ग्लूकोज का इस्तेमाल कम करती हैं। इससे इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ने लगता है। अक्सर स्क्रीन देखते हुए बच्चे अनहेल्दी स्नैक्स का भी सेवन कर बैठते हैं। जिससे मोटापे का खतरा बढ़ता है। इसलिए पेरेंट्स को चाहिए कि बच्चे का स्क्रीन टाइम कम करें।
कम से कम 60 मिनट तक बच्चे को पसीने वाली फिजिकल एक्टिविटी जैसे बैडमिंटन, फुटबॉल, रनिंग या स्विमिंग करने के लिए मोटिवेट करना चाहिए। इससे बच्चा शारीरिक रूप से सक्रिय होता है और मोटापा नहीं बढ़ता है। वहीं मेटाबॉलिज्म भी ठीक तरह से काम करता है। इससे डायबिटीज के खतरे को भी कम किया जा सकता है।
माता-पिता के लिए जरूरी है कि वह अपने बच्चे का वेट कंट्रोल में रखने की कोशिश करें। एक रिपोर्ट के मुताबिक मोटापा बच्चों में इंसुलिन रिजेस्टेंस पैदा करके टाइप 2 डायबिटीज की वजह बनता है। ऐसे में बॉडी सेल्स इंसुलिन के प्रति किसी भी तरह की प्रतिक्रिया नहीं कर पाती है। जिस कारण पैनक्रियाज को ज्यादा काम करना पड़ता है। वहीं ब्लड शुगर का लेवल बढ़ जाता है। बच्चों में वेट कंट्रोल करके इंसुलिन रेजिस्टेंस की समस्या को कंट्रोल किया जा सकता है।
बता दें कि नींद की कमी होने पर शरीर में हार्मोन असंतुलित हो जाते हैं। जिससे शुगर बढ़ने का खतरा रहता है। पेरेंट्स को चाहिए कि वह सुनिश्चित करें कि उनका बच्चा 8-9 घंटे की नींद जरूर लें। नींद स्वस्थ रहने के लिए बेहद जरूरी होती है। अच्छी और गहरी नींद ग्लूकोज मेटाबॉलिज्म को कंट्रोल करती है। बच्चों में नींद में बदलाव होने पर मोटापा, एपनिया, इंसुलिन रेजिस्टेंस और टाइप 2 डायबिटीज के साथ गहरा संबंध हो सकता है। इसलिए पेरेंट्स को बच्चे की नींद का विशेष ध्यान देना चाहिए।
जिन भी परिवारों में डायबिटीज की समस्या है। उनको साल में एक बार अपने बच्चे का फास्टिंग ब्लड शुगर या HbA1c test जरूर कराना चाहिए। प्राप्त जानकारी के मुताबिक साल 2020 में टाइप 2 डायबिटीज वाले ज्यादातर बच्चों में किसी तरह के लक्षण नजर नहीं आते हैं। इसलिए उनका स्क्रीनिंग जरूरी हो जाता है। लेकिन इसके लिए प्रोफेशनल की मदद ली जानी जरूरी है।