रूस-चीन की दिलचस्पी सैनिक कार्रवाई रही नहीं

By उमेश चतुर्वेदी | Jan 19, 2026

साल 2026 के तीसरे ही दिन अमेरिका ने जिस तरह वेनेजुएला के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की, उसके बाद से विशेषकर सैनिक रूप से कमजोर देशों में चिंता की लहर है। चाहे अमेरिकी खेमे में हो या फिर अमेरिका विरोधी खेमे में, हर देश आशंकित हो उठा है। अमेरिका के सर्वोच्च पद पर डोनॉल्ड ट्रंप के रहते ऐसी चिंताएं स्वाभाविक भी हैं। जिस तरह अपने ही खेमे के देश डेनमार्क के ग्रीनलैंड द्वीप पर ट्रंप ने अपनी नजर टिका रखी है, उससे दुनिया को चिंतित होना ही चाहिए। ऐसे में विश्व की निगाह दुनिया के सैनिक रूप से दूसरे शक्तिशाली देश रूस और आर्थिक रूप से दूसरे और सैनिक रूप से तीसरे ताकतवर देश चीन पर लगना स्वाभाविक है। लेकिन दोनों ही देशों ने वेनेजुएला पर जिस तरह रस्मी प्रतिक्रिया जताई है, उससे लगता नहीं कि वे भविष्य में ऐसी अमेरिकी कार्रवाइयों के खिलाफ अपने मित्र देशों के पक्ष में खड़े होने आएंगे।

इसे भी पढ़ें: Vishwakhabram: तेल आयात घटा, पर भरोसा और बढ़ा, पुराने दोस्त India-Russia ने आगे बढ़ने के लिए खोज लिये नये रास्ते

वेनेजुएला पर कार्रवाई को लेकर रूस और चीन ने चिंताएं तो जाहिर कीं, लेकिन वे वेनेजुएला को सैनिक सहयोग करने के लिए इच्छुक नहीं दिखे। इसकी मोटे तौर पर दो वजहें सामने आती हैं। वेनेजुएला से रूस ने 2010 में समझौता तो किया, लेकिन वह रणनीतिक, तकनीकी और आर्थिक मामलों पर केंद्रित है। सैनिक सहयोग की बात उसमें नहीं है। दिलचस्प यह है कि वेनेजुएला के विशाल तेल भंडार का सबसे ज्यादा फायदा उठाने वाला चीन भी इस मामले में उसको सैनिक सहयोग करने से दूर है। वेनेजुएला के तेल निर्यात का 50 से 89 प्रतिशत तक हिस्सा सिर्फ चीन जाता था। मोटे तौर पर चीन रोजाना वेनेजुएला से चार लाख बैरल से लेकर छह लाख साठ हजार बैरल तेल आयात कर रहा था। इसके बावजूद वह वेनेजुएला को सैनिक सहायता देने से हिचक रहा है।

चीन की स्थिति यह है कि वह एशिया में अपनी सैन्य ताकत का गाहे-बगाहे मुजाहिरा तो करता है, लेकिन वह सुदूर दक्षिणी अमेरिकी या अफ्रीकी महाद्वीप के देशों में ऐसा करने से हिचक रहा है। इसकी वजह यह है कि चीन की नीतियां कम से कम एशिया से बाहर सिर्फ और सिर्फ आर्थिक मुद्दों पर ही टिकी हैं। पारंपरिक भारतीय शब्दावली में कह सकते हैं कि चीन बनिया बन चुका है। यानी उसका पूरा ध्यान आर्थिक लाभ और हानि पर है। फिर ट्रंप काल में अमेरिका से कारोबारी मुद्दे पर उसकी ठनी हुई है। जिसे वह सहज करने की कोशिश में है। इसलिए वह कोई ऐसा कदम नहीं उठाना चाहता, जिससे ट्रंप नाराज हों और अमेरिका से उसके कारोबारी रिश्तों पर असर पड़े। चीन की पूरी कोशिश अमेरिका से जारी व्यापार युद्ध को खत्म करे और आर्थिक मोर्चे पर अपनी ताकत बढ़ाए। उसकी कोशिश किसी तरह अमेरिका को खुश करने की भी होगी, ताकि वेनेजुएला से वह पहले की तरह तेल का भारी आयात कर सके।

वेनेजुएला के मसले पर रूस की भी स्थिति बहुत बेहतर नहीं है। रूस यूक्रेन में फंसा हुआ है। वेनेजुएला से रूस की रणनीतिक संधि तो है, लेकिन उसमें साझा रक्षा का जिक्र नहीं है। फिर रूस के संसाधन, सेना, सैन्य उपकरण आदि यूक्रेन युद्ध में लगे हुए हैं। ऐसे में अगर वह वेनेजुएला का सैन्य सहयोग करता है तो एक तरह से वह अमेरिका के खिलाफ नया मोर्चा खोलना होगा। रूस इस वजह से बचना चाहता है। इसीलिए जब रूसी झंडा लगे पोत को अमेरिकी सेना ने रोका तो रूस ने सिर्फ अमेरिका से रूसी नागरिकों की हिफाजत और उन्हें छोड़ने की अपील ही की। अतीत में जब सोवियत संघ था, तब अमेरिका ऐसी हिम्मत ही नहीं करता था और अगर करता भी तो सोवियत सेनाएं उस ओर कूच कर सकती थीं। 

जाहिर है कि लगातार अर्थकेंद्रित होती दुनिया में देशों की प्राथमिकताएं बदल गई हैं। किसी मसले को सुलझाने के लिए सैन्य कार्रवाई अब आखिरी विकल्प के तौर पर उभरी है। रूस और चीन इसी मानस से ग्रस्त हैं। इसीलिए वेनेजुएला ही नहीं, ऐसे अपने किसी और साथी के सहयोग के लिए सक्रिय रूप से सामने आने में अब उनकी दिलचस्पी नहीं है। ऐसे में दुनिया, विशेषकर अमेरिकी कोप से आशंकित देशों को चिंतित होने की जरूरत है। उन्हें वैकल्पिक राह भी तलाशनी होगी। 

-उमेश चतुर्वेदी

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं

प्रमुख खबरें

ट्रंप मीडिया को $238 Million का भारी घाटा, Bitcoin और Crypto बाजार में गिरावट ने बढ़ाई Donald Trump की टेंशन

Banking Sector में UPI जैसा बदलाव लाएगा AI, कर्ज देने के पुराने तरीके बदलेंगे RBI Governor Sanjay Malhotra

Toronto Semifinal: Iga Swiatek ने श्नाइडर को रौंदा, स्वितोलिना से होगा पुरानी हार का हिसाब

FIFA World Cup की सफलता का हवाला देकर Donald Trump ने Infantino को बताया शानदार व्यक्तित्व