India-US Trade Deal पर आया Russia का बयान, विदेश मंत्री Sergey Lavrov बोले, ''सस्ता तेल खरीदने से रोक रहा है अमेरिका''

By नीरज कुमार दुबे | Feb 10, 2026

अमेरिका से भारत की ट्रेड डील के बाद रूस सरकार की ओर से किसी बड़े मंत्री की यह पहली आधिकारिक टिप्पणी मानी जा रही है, जिसमें रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने खुलकर कहा है कि वाशिंगटन भारत सहित कई देशों को सस्ते रूसी तेल की खरीद से रोकने की कोशिश कर रहा है। एक टीवी साक्षात्कार में लावरोव ने आरोप लगाया कि अमेरिका प्रतिबंध, टैरिफ और तरह तरह के रोक लगाने वाले कदमों के जरिये देशों पर दबाव बना रहा है ताकि वे रूसी ऊर्जा से दूर हो जाएं और महंगी अमेरिकी आपूर्ति लें।

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रूसी मंत्री ने कहा कि यूरोप को पहले ही रूसी ऊर्जा से दूर किया जा चुका है और अब भारत तथा अन्य भागीदार देशों को भी सस्ती आपूर्ति से काटने का प्रयास है। उन्होंने दावा किया कि अमेरिका चाहता है कि देश महंगी अमेरिकी एलएनजी और अन्य ऊर्जा स्रोत खरीदें, भले ही वह उनके आर्थिक हित के खिलाफ हो। लावरोव ने यह भी कहा कि रूस भारत, चीन, इंडोनेशिया और ब्राजील जैसे देशों की तरह सभी के साथ सहयोग के लिए खुला है, जिनमें अमेरिका भी शामिल है। उन्होंने साथ ही यह भी कहा कि लेकिन खुद अमेरिकी नीतियां रास्ते में कृत्रिम रुकावटें खड़ी कर रही हैं।

हम आपको यह भी बता दें कि रूसी तेल पर भारत ने अपनी स्थिति दोहराते हुए कहा है कि उसकी ऊर्जा नीति केवल राष्ट्रीय हित से संचालित होगी। विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने कहा है कि भारत की प्राथमिकता पर्याप्त उपलब्धता, उचित कीमत और भरोसेमंद आपूर्ति है। भारत ने यह साफ किया कि वह बाजार की स्थिति और अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य को देखकर स्रोतों का विविधीकरण करेगा।

दरअसल, अमेरिका की ओर से भारत पर लगाये गये अतिरिक्त टैरिफ हटाने के फैसले के बाद यह अटकलें तेज हुईं कि क्या भारत रूसी कच्चे तेल की खरीद घटाएगा? हालांकि नई दिल्ली ने न तो खरीद रोकने की पुष्टि की है और न ही इन खबरों को पूरी तरह खारिज किया है। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा है कि 140 करोड़ लोगों की ऊर्जा सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और सभी फैसले इसी कसौटी पर होंगे। उल्लेखनीय है कि अमेरिका का आरोप है कि रियायती रूसी तेल की खरीद से मास्को को यूक्रेन युद्ध के लिए संसाधन मिलते हैं। इस पर भारत का रुख रहा है कि वह अपने उपभोक्ताओं और अर्थव्यवस्था के हित को ध्यान में रखकर ही निर्णय लेगा।

देखा जाये तो ऊर्जा आज की दुनिया में सामरिक शक्ति का मूल आधार है। जो देश तेल और गैस की धार को मोड़ सकता है, वह कई बार गोलियों के बिना भी दबाव बना सकता है। ऐसे में अगर अमेरिका सचमुच बाजार के नाम पर दबाव की राजनीति कर रहा है तो यह मुक्त व्यापार के दावे पर खुद सवाल खड़ा करता है। भारत के लिए यह पल कसौटी का है। एक तरफ पश्चिमी दबाव, दूसरी तरफ सस्ती आपूर्ति से मिलने वाली राहत। भारत के लिए महंगा ईंधन सीधे महंगाई, उद्योग लागत और आम जन के जीवन पर असर डालता है। इसलिए ऊर्जा फैसले भावनाओं से नहीं, कठोर गणना से होंगे। यही परिपक्व विदेश नीति का संकेत भी है।

सामरिक नजर से देखें तो रूसी तेल ने भारत को छूट दी है कि वह अपनी रिफाइनरी क्षमता का पूरा उपयोग करे और निर्यात भी बढ़ाए। इससे विदेशी मुद्रा आय और कूटनीतिक लचीलापन दोनों मिले हैं। अगर यह विकल्प अचानक सीमित होता है तो भारत को पश्चिम एशिया, अफ्रीका और अमेरिका से महंगी खरीद करनी पड़ेगी, जिससे व्यापार घाटा बढ़ सकता है।

दूसरी ओर अमेरिका के साथ गहरे होते रिश्ते भी भारत के लिए अहम हैं। रक्षा, तकनीक और निवेश में सहयोग की जरूरत है। इसलिए नई दिल्ली को रस्सी पर चलने वाले खिलाड़ी की तरह संतुलन साधना होगा। खुले टकराव की जगह चुपचाप विविधीकरण, दीर्घकालिक करार और भंडारण क्षमता बढ़ाना समझदारी होगी। भारत को अपने हित को केंद्र में रखकर बहुध्रुवीय ऊर्जा रणनीति बनानी होगी, जहां कोई एक देश नल बंद कर पूरी अर्थव्यवस्था को बंधक न बना सके।

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