By अभिनय आकाश | Oct 13, 2026
1970 के दशक का अंत हो गया है। जब भारतीय सेना के बेड़े में सोवियत संघ से एक ऐसा लड़ाकू बख्तरबंद सिपाही शामिल होता है भारत में जिसने भारत की जमीनी सरहदों पर अभेद दीवार खड़ी कर दी। नाम T72। राजस्थान के धधकते थार मरुस्थल से लेकर पूर्वी लद्दाख की 15,000 फीट ऊंची 0 डिग्री वाली बर्फीली चोटियों तक। इस बख्तरबंद दैत्य ने दशकों तक पाकिस्तान और चीन के मंसूबों को धूल चटाए रखी। लेकिन आधुनिक युद्ध का मैदान अब बदल चुका है। यूक्रेन युद्ध ने पूरी दुनिया को दिखा दिया कि सिर्फ भारी भरकम लोहा काफी नहीं होता है। अगर टैंक के पास आधुनिक आंखें, तेज दिमाग और सटीक सुरक्षा कवच ना हो तो वह दुश्मन के एक सस्ते ड्रोन का शिकार भी बन सकता है। ठीक इसी ऐतिहासिक मोड़ पर एक बार फिर भारत के दोस्त रूस से एक ऐसी कूटनीतिक और सामरिक हलचल उठी है जिसने नई दिल्ली और वैश्विक रक्षा गलियारों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। रूस की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक टेक निर्माता कंपनी ने खुले तौर पर भारत के सामने साझेदारी की पेशकश कर दी है।
रूस अच्छे से जानता है कि अब 1980 या 1990 का दौर नहीं है जब भारत सिर्फ विदेशी कारखानों से सीधे हथियार खरीदता था। पोतापोब ने खुद तमिलनाडु के हैवी व्हीकल फैक्ट्री यानी एचवीएफ का जिक्र किया। यानी रूस समझ चुका है कि अगर सौदा होता है तो वो भारत की शर्तों पर होगा और काम भारत की जमीन पर ही होगा। संख्या के लिहाज से देखें तो भारतीय सेना की बख्तरबंद ताकत दुनिया की सबसे बड़ी विशाल आम ताकतों में से एक है। हमारी कोर के पास आधुनिक T90s भीष्म अत्याधुनिक T90 एमएस और स्वदेशी अर्जुन एमबीटी मौजूद है। लेकिन रीड की हड्डी आज भी सोवियत मूल के लगभग 2400 T72 अजय टैंक ही हैं। जब भारत ने इन्हें शामिल किया था तब यह अपने समय के सबसे आधुनिक टैंक में से एक था। मगर पिछले चार दशकों में टैंक विरोधी तकनीकों में जमीन आसमान का फर्क आ चुका है। हालिया युद्धों ने यह साबित कर दिया, प्रमाणित कर दिया कि आधुनिक युद्ध क्षेत्र में एक टैंक को जीवित रहने के लिए नाइट विज़न और हंटर किलर क्षमता कैबिलिटी बहुत जरूरी है। पुराने T72 में रात के समय लक्ष्य साधने की क्षमता बहुत सीमित थी।