रूस-यूक्रेन युद्ध से हो रही बर्बादी ने अंहिसा की ताकत का महत्व दर्शाया

By ललित गर्ग | Mar 25, 2022

रूस-यूक्रेन युद्ध को चलते हुए लगभग एक माह होने जा रहा है। रूस वांछित नतीजा हासिल नहीं कर पाया है। जैसे-जैसे समय बीत रहा है, अधिक विनाश एवं विध्वंस की संभावनाएं बढ़ती जा रही है। यूक्रेन और रूस में शांति का उजाला करने, अभय का वातावरण, शुभ की कामना और मंगल का फैलाव करने के लिये भारत को शांति प्रयास करने चाहिए। एकमात्र भारत ही ऐसा देश है जो अपने आध्यात्मिक तेज एवं अहिंसा की शक्ति से मनुष्य के भयभीत मन को युद्ध की विभीषिका से मुक्ति दे सकता। इन दोनों देशों को युद्ध विराम के लिये राजी करके विश्व को निर्भय बना सकता है। इन युद्ध एवं हिंसा के वातावरण में अहिंसा यात्रा एवं उसके प्रणेता आचार्य श्री महाश्रमण का सन्देश कारगर हो सकता है। क्योंकि राष्ट्रसंत आचार्य श्री महाश्रमण कीर्तिधर यायावर संतपुरुष हैं, जिन्होंने अपनी अहिंसा यात्रा के माध्यम से न केवल सम्पूर्ण भारत की बल्कि पडौसी देश नेपाल, भूटान की पदयात्रा की है और अहिंसा एवं अयुद्ध का प्रभावी वातावरण निर्मित किया। गांव-गांव, नगर-नगर, प्रांत-प्रांत एवं निकट के देशों में घूमते हुए उन्होंने अहिंसा, अयुद्ध, साम्प्रदायिक सौहार्द, मैत्री, समन्वय, राष्ट्रीय एकता, एवं सद्भाव की प्रतिष्ठा करने में अपूर्व एवं ऐतिहासिक योगदान दिया है तथा लाखों-लाखों लोगों से सीधा सम्पर्क स्थापित कर उन्हें अहिंसक बनने, साम्प्रदायिक सौहार्द स्थापित करने एवं व्यसनमुक्त जीवन जीने की प्रेरणा दी। उनके इस चरैवेति-चरैवेति जीवनक्रम एवं संकल्प को देखकर सहसा वेदमंत्र -‘पश्य सूर्यस्य श्रेमाणं, यो न तन्द्रयते चरन्’ की स्मृति हो उठी है अर्थात् सूर्य चिरकाल से भ्रमण कर रहा है, पर कभी थकता नहीं, चलता ही जाता है।

आचार्य श्री महाश्रमण की अहिंसा यात्रा धर्म की यात्रा बनी, अहिंसा एवं अयुद्ध की यात्रा बनी, मैत्री यात्रा बनी, प्रेम एवं अपनत्व की यात्रा बनी, नशामुक्ति की यात्रा बनी, साम्प्रदायिक सौहार्द की यात्रा बनी, समता एवं समन्वय की यात्रा बनी, जीवनमूल्यों की यात्रा बनी एवं सेवा-परोपकार की यात्रा बनी। भाषा, रंग, सम्प्रदाय एवं भौगोलिकता में बंटी मानव जाति की एकता को सुनिश्चित करना ही इस यात्रा का उद्देश्य रहा है। इंसानों को आपस में तोड़ने नहीं, बल्कि जोड़ने के लिये इस यात्रा ने ऐतिहासिक भूमिका निभाई। विशेषतः अहिंसक शक्तियों को संगठित किया गया। क्योंकि अहिंसा ताकतवरों का हथियार है। दमनकारी के खिलाफ वही सिर उठाकर खड़ा हो सकता है, जिसे कोई डर न हो, जो अहिंसक हो एवं मूल्यों के लिये प्रतिबद्ध हो। इस कसौटी पर कसेंगे, तो आपको साफ-साफ समझ में आ जाएगा कि मौजूदा समय में कौन निडर है और कौन भयभीत। कौन कितना नैतिक है और कौन कितना भ्रष्ट।

आचार्य श्री महाश्रमण ने दिनांक 9 मार्च 2014 को राजधानी दिल्ली के लाल किला प्राचीर से अहिंसा यात्रा का शुभारंभ किया था और इसी दिल्ली में 27 मार्च 2022 को आठ वर्षीय इस ऐतिहासिक, अविस्मरणीय एवं विलक्षण यात्रा का समापन तालकटोरा स्टेडियम में होना एक सुखद संयोग है। उन्होंने उन्नीस राज्यों एवं भारत सहित तीन पड़ोसी देशों की करीब सत्तर हजार किलोमीटर की पदयात्रा करते हुए अहिंसा और शांति का पैगाम फैलाया। करीब एक करोड़ लोगों को नशामुक्ति का संकल्प दिलाया। नेपाल में भूकम्प, कोरोना की विषम परिस्थितियों में इस यात्रा का नक्सलवादी एवं माओवादी क्षेत्रों में पहुंचना आचार्य महाश्रमण के दृढ़ संकल्प, मजबूत मनोबल एवं आत्मबल का परिचायक है। आचार्य महाश्रमण का देश के सुदूर क्षेत्रों- नेपाल एवं भूटान जैसे पड़ोसी राष्ट्रों सहित आसाम, बंगाल, बिहार, मध्य प्रदेश, ओडिशा, कर्नाटक, तमिलनाडू, महाराष्ट्र, राजस्थान, छत्तीसगढ़ आदि में अहिंसा यात्रा करना और उसमें अहिंसा पर विशेष जोर दिया जाना अहिंसा की स्थापना के लिये सार्थक सिद्ध हुआ है। क्योंकि आज देश एवं दुनिया हिंसा एवं युद्ध के महाप्रलय से भयभीत और आतंकित है। जातीय उन्माद, सांप्रदायिक विद्वेष और जीवन की प्राथमिक आवश्यकताओं का अभाव- ऐसे कारण हैं जो हिंसा को बढ़ावा दे रहे हैं और इन्हीं कारणों को नियंत्रित करने के लिए आचार्य महाश्रमण अहिंसा यात्रा के विशिष्ट अभियान के माध्यम से प्रयत्नशील बने थे। इन विविध प्रयत्नों में उनका एक अभिनव उपक्रम बना है- ‘अहिंसा यात्रा’। अहिंसा यात्रा एकमात्र आंदोलन बना जो समूची मानव जाति के हित का चिंतन कर एक अभिनव एवं आदर्श समाज-संरचना का माध्यम बना। अहिंसा की योजना को क्रियान्वित करने के लिए ही उन्होंने पदयात्रा के सशक्त माध्यम को चुना था। ‘चरैवेति-चरैवेति चरन् वै मधु विंदति’ उनके जीवन का विशेष सूत्र बन गया था।

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हिंसा, युद्ध और आतंकवाद जैसी स्थितियां असंतुलित व्यक्ति के दिमाग से उत्पन्न होती है। व्यक्ति समाज और राष्ट्र में जीता है। समाज और राष्ट्र के प्रश्न पर युद्ध को नकारा नहीं जा सकता। राष्ट्रीय सुरक्षा हेतु युद्ध अनिवार्य हो सकता है, एक सामाजिक प्राणी उससे विमुख नहीं हो सकता। पर युद्ध में होने वाली हिंसा को अहिंसा की कोटि में नहीं रखा जा सकता। अनिवार्य हिंसा भी अहिंसा नहीं बन सकती। आचार्य श्री महाश्रमण ने प्रेरणा दी है कि रूस-यूक्रेन युद्ध में भी अहिंसा के लिए बड़ा क्षेत्र खुला है- जैसे स्वयं आक्रांता न बनें, निरपराध को न मारें, आबादी वाले स्थानों पर बमबारी न करें। अस्पताल, धर्मस्थान, स्कूल, कॉलेज आदि पर आक्रमण न करें। यदि हम इन नियमों को अपनाएं तो युद्ध में भी अहिंसा की प्रतिष्ठा संभव है। एक प्रश्न यह भी है कि मनुष्य कितना भी युद्ध करे, अंततः उसे समझौते की टेबल पर आना ही होता है तो फिर पहले से ही समझौते की टेबल पर क्यों नहीं आ जाता?

युद्ध ही नहीं बल्कि आधुनिक युग की सभी समस्याओं का समाधान है अहिंसा। आज भी 98 प्रतिशत आदमी शांति, सहअस्तित्व एवं सहयोग के साथ रहते हैं, वे हिंसा नहीं चाहते। सिर्फ 2 प्रतिशत आदमी हिंसा में सम्मिलित हैं। इन दो प्रतिशत लोगों को उकसाने के लिए कितने षड्यंत्र रचे जाते हैं, हिंसा का प्रशिक्षण दिया जाता है, शस्त्रों की बिक्री के लिए हिंसा के बीज बोए जाते हैं। सत्ता, संपदा, शक्ति का आकर्षण इतना बढ़ रहा है कि इनकी आसक्ति में हमारा दृष्टिकोण निषेधात्मक हो जाता है। आदमी सिर्फ अर्थ और सत्ता को केन्द्र मानने लगा है। अर्थ आजीविका का साधन है, उसे साध्य मानने से ही सारी समस्याएं पैदा हो रही हैं। अनासक्त चेतना के जागरण से आसक्ति का आवरण हट सकता है। आकांक्षाओं का अल्पीकरण अर्थात् संयम की साधना पर जो अहिंसा का महत्वपूर्ण सूत्र है, इसको अपनाकर ही हम अपना विकास कर सकते हैं। जब तक जीवन में अहंकार रहेगा, दम्भ रहेगा, क्षोभ रहेगा तब तक शांति का अवतरण हो सके, यह संभव नहीं है। इच्छाओं का विस्तार ही हिंसा का सबसे बड़ा कारण है। दूसरों के अधिकारों पर हाथ न उठाना ही शांति एवं अहिंसा का मूल स्रोत है। विडम्बना है कि देश और दुनिया में जितनी भी हिंसा हो रही है वह सब शांति के लिए है। यह हमारे मानसिक असंतुलन का ही एक कारण है कि बात चले विश्व शांति की और कार्य हो अशांति के तो शांति कैसे संभव हो?’’

हम विश्व समाज एवं राष्ट्र के सपनों को सच बनाने में सचेतन बनें, यही आचार्य महाश्रमण की प्रेरणा है और इसी प्रेरणा को जीवन-ध्येय बनाना हमारे लिए शुभ एवं श्रेयस्कर है। आचार्य श्री महाश्रमणजी से अपेक्षा है और विनम्र निवेदन है कि वे अहिंसा यात्रा की सम्पन्नता के अवसर पर ऐसा आलोक बिखेरे, ऐसा प्रेरणा-पाथेय प्रदत्त करें कि रूस-यूक्रेन युद्ध समाप्त होकर समूची दुनिया राहत की सांस लें।

-ललित गर्ग

(लेखक पत्रकार एवं समाजसेवी हैं तथा भारत सरकार के गृह मंत्रलाय की राजभाषा समिति के सदस्य हैं)

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