By नीरज कुमार दुबे | Sep 02, 2026
भारत एक तरफ ‘आत्मनिर्भर भारत’ के तहत अपनी स्वदेशी रक्षा क्षमता को तेज रफ्तार से खड़ा कर रहा है, दूसरी तरफ रूस से अतिरिक्त S-400 एयर डिफेंस सिस्टम खरीदने जा रहा है। यहां तक कि अत्याधुनिक S-500 Prometheus की खरीद पर विचार करने की संभावनाएं भी खुली हैं। इसलिए सवाल सीधा है कि जब भारत अपना Project Kusha विकसित कर रहा है, तो आखिर हमें और रूसी एयर डिफेंस सिस्टम की जरूरत क्यों पड़ रही है? इस सवाल का जवाब भारत की सुरक्षा जरूरतों, चीन-पाकिस्तान के दोहरे खतरे और आने वाले वर्षों की सामरिक तस्वीर में छिपा है।
देखा जाये तो भारत के लिए S-400 केवल एक आयातित हथियार प्रणाली नहीं रह गया है। यह देश की बहुस्तरीय एयर डिफेंस संरचना का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन चुका है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान से आने वाले हवाई खतरों के खिलाफ S-400 की व्यापक तैनाती ने इसकी उपयोगिता को और मजबूत किया था। एक S-400 ने बेहद लंबी दूरी पर पाकिस्तानी एयरबोर्न अर्ली वॉर्निंग एंड कंट्रोल विमान को भी निशाना बनाया था, जिसने भारतीय सैन्य प्रतिष्ठान में इस सिस्टम की प्रतिष्ठा बढ़ा दी। यही कारण है कि रूस अब भारत को पांच अतिरिक्त S-400 स्क्वाड्रन देने की नई पेशकश कर रहा है। यदि यह प्रस्ताव आगे बढ़ता है, तो भारत के पास पहले से अनुबंधित S-400 क्षमता लगभग दोगुनी हो सकती है।
लेकिन यहीं सबसे बड़ा विरोधाभास सामने आता है। भारत उसी समय DRDO के नेतृत्व में Project Kusha विकसित कर रहा है, जिसे भविष्य में S-400 श्रेणी की स्वदेशी लंबी दूरी की एयर डिफेंस क्षमता के रूप में देखा जा रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत अपनी ही तकनीक पर भरोसा नहीं करता? लेकिन यहां इस सवाल से ज्यादा यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि भारत भविष्य की आत्मनिर्भरता का इंतजार करते हुए वर्तमान की सुरक्षा को कमजोर नहीं कर सकता।
इसमें कोई दो राय नहीं कि Project Kusha भारत के लिए सिर्फ एक नया मिसाइल प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि रणनीतिक आत्मनिर्भरता का बड़ा दांव भी है। इस प्रस्तावित प्रणाली में M1, M2 और M3 जैसे अलग-अलग इंटरसेप्टर शामिल हैं, जिनकी अनुमानित मारक क्षमता लगभग 150, 250 और 350 से 400 किलोमीटर तक हो सकती है। इसका उद्देश्य लड़ाकू विमान, ड्रोन और आने वाली मिसाइलों जैसे हवाई खतरों को नष्ट करना है। इसके इंटरसेप्टर उन्नत Gallium Nitride आधारित AESA सीकर, इनर्शियल नेविगेशन और मिड-कोर्स अपडेट जैसी तकनीकों से लैस बताए गए हैं। यहां तकनीकी रूप से यह सवाल भी उठता है कि क्या S-400 या Project Kusha की मिसाइलों को जरूरत पड़ने पर जमीन पर हमला करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है?
इस सवाल का सैद्धांतिक जवाब है, हां लेकिन ऐसा करना समझदारी नहीं होगी। दरअसल, यूक्रेन युद्ध में रूस ने कुछ परिस्थितियों में S-400 के 48N6 मिसाइल श्रेणी से जुड़े इंटरसेप्टरों को जमीन पर स्थित लक्ष्यों के खिलाफ इस्तेमाल किया। देखा जाये तो सिद्धांत रूप से यदि मिसाइल को किसी स्थिर भू-निर्देशांक की ओर भेजा जाए, तो उसकी गाइडेंस प्रणाली उसे उस दिशा में बैलिस्टिक मार्ग पर ले जा सकती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि S-400 अचानक एक प्रभावी सतह से सतह पर मार करने वाला हथियार बन गया। S-400 इंटरसेप्टर का वारहेड मुख्य रूप से हवा में उड़ते विमानों और मिसाइलों को नष्ट करने के लिए डिजाइन किया गया है। इसका ब्लास्ट-फ्रैगमेंटेशन प्रभाव विमान जैसे अपेक्षाकृत नाजुक लक्ष्यों के लिए उपयोगी है, लेकिन मजबूत बंकरों या कठोर जमीनी संरचनाओं को नष्ट करने के लिए यह समर्पित प्रहारक वारहेड जैसा प्रभावी नहीं है। दूसरे शब्दों में, जमीन पर इस्तेमाल होने पर ऐसा इंटरसेप्टर एक बेहद महंगा और सीमित प्रभाव वाला रॉकेट बन सकता है।
रक्षा विश्लेषकों के अनुसार, रूस द्वारा ऐसा उपयोग समर्पित सतह से सतह पर मार करने वाली मिसाइलों के दबाव या कमी जैसी युद्धकालीन परिस्थितियों का परिणाम हो सकता है, न कि किसी आदर्श सैन्य रणनीति का मॉडल। और यही भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण सबक है कि एयर डिफेंस मिसाइल को जमीन पर खर्च करना, आसमान की सुरक्षा कमजोर करना है।
हम आपको बता दें कि भारत के पास पहले से BrahMos, Pralay, Shaurya और Nirbhay जैसे समर्पित सतह से सतह पर प्रहार करने वाले हथियार मौजूद हैं। इन्हें शुरुआत से ही जमीनी लक्ष्यों के खिलाफ सटीक हमला करने के लिए विकसित किया गया है। इनके पास उपयुक्त वारहेड, विशेष गाइडेंस तकनीक और मिशन के अनुरूप उड़ान प्रोफाइल हैं। इसलिए भारत की सैन्य रणनीति स्पष्ट है कि आसमान की लड़ाई एयर डिफेंस लड़ेगा और जमीन पर प्रहार समर्पित स्ट्राइक मिसाइलें करेंगी।
उधर, रूस की ओर से जो पेशकश की जा रही हैं उनमें सबसे बड़ा और जटिल हिस्सा S-500 Prometheus है। रूस इसे S-400 के बाद अगली पीढ़ी की लंबी दूरी की एयर और एंटी-बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस प्रणाली के रूप में पेश कर रहा है। लेकिन भारत के लिए फैसला आसान नहीं होगा। देश पहले से अपना बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस कार्यक्रम विकसित कर रहा है और Project Kusha भी आगे बढ़ रहा है। इसलिए सवाल केवल यह नहीं होगा कि S-500 कितना शक्तिशाली है। असली सवाल होगा कि क्या यह ऐसी क्षमता देता है जो भारत के पास नहीं है, या फिर यह स्वदेशी कार्यक्रमों के साथ अनावश्यक ओवरलैप पैदा करेगा? देखा जाये तो भारत को तत्काल क्षमता और दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता के बीच बेहद सावधानी से संतुलन बनाना होगा।
इसके अलावा, रूस का दूसरा बड़ा प्रस्ताव Su-57 Felon पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर है। भारतीय वायुसेना के सामने लड़ाकू स्क्वाड्रनों की कमी और स्वदेशी AMCA के आने में समय लगने की चुनौती है। रूस ने Su-57 के साथ तकनीक हस्तांतरण, स्थानीयकरण और भारत में उत्पादन की संभावना का संकेत दिया है। इसे AMCA आने तक एक संभावित ‘स्टॉपगैप’ के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन मुश्किलें भी कम नहीं हैं। भारतीय वायुसेना के पास पहले ही Su-30MKI, MiG-29, Rafale, Mirage 2000, Jaguar और Tejas जैसे विभिन्न प्लेटफॉर्म हैं। Su-57 आने पर प्रशिक्षण, रखरखाव, हथियार, स्पेयर पार्ट्स और लॉजिस्टिक्स का एक नया तंत्र जोड़ना होगा।
फिर भी खतरा वास्तविक है। चीन के पास बड़ी संख्या में J-20 स्टील्थ फाइटर होने की बात कही जा रही है, जबकि पाकिस्तान को भी आने वाले समय में चीनी J-35 मिलने की संभावना है। ऐसे में भारत के सामने सवाल खड़ा है कि AMCA का इंतजार करे या स्टील्थ क्षमता में पैदा हो रहे अंतर को भरने के लिए विदेशी विकल्प चुने? विडंबना यह है कि भारत और रूस का पुराना FGFA कार्यक्रम कभी इसी दिशा में संयुक्त समाधान देने वाला था, लेकिन वह परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी।
हम आपको यह भी बता दें कि रूस की पेशकश केवल S-500 और Su-57 तक सीमित नहीं है। Voronezh रणनीतिक अर्ली-वॉर्निंग रडार, HAL के साथ Su-30MKI अपग्रेड और Kilo-क्लास पनडुब्बियों के आधुनिकीकरण जैसे प्रस्ताव भी महत्वपूर्ण हैं। देखा जाये तो मॉस्को के लिए दांव बहुत बड़ा है क्योंकि भारत पिछले दो दशकों से अमेरिका, फ्रांस, इजरायल और अन्य देशों के साथ भी रक्षा सहयोग बढ़ाकर अपने आपूर्तिकर्ताओं में विविधता ला रहा है। अमेरिकी Javelin मिसाइलों की खरीद की दिशा में कदम और 114 Rafale लड़ाकू विमानों की संभावित बड़ी खरीद इस बदलती तस्वीर का हिस्सा हैं। लेकिन रूस के पास अब भी एक जबरदस्त बढ़त है। भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना में रूसी मूल के लड़ाकू विमान, टैंक, पनडुब्बियां, हेलीकॉप्टर, मिसाइल और एयर डिफेंस सिस्टम गहराई तक मौजूद हैं।
बहरहाल, पुतिन की भारत यात्रा के दौरान रक्षा सौदों पर होने वाली चर्चा सिर्फ हथियार खरीदने की बातचीत नहीं होगी। यह बातचीत तय करेगी कि अगले दो दशकों में भारत का एयर डिफेंस कैसा होगा, उसकी वायुसेना कितनी तेजी से पांचवीं पीढ़ी की लड़ाई में प्रवेश करेगी। कुल मिलाकर देखें तो S-400 और Project Kusha के बीच मुकाबला वास्तव में ‘रूस बनाम भारत’ नहीं है। यह आज की तत्काल सुरक्षा बनाम कल की रणनीतिक आत्मनिर्भरता का संतुलन है। पुतिन की यात्रा इसी संतुलन को नए सिरे से परिभाषित कर सकती है।
-नीरज कुमार दुबे