Sabarimala पर धर्म और कानून में महासंग्राम, Supreme Court के फैसले से सियासत में आएगा तूफान?

By कमलेश पांडे | Apr 11, 2026

सबरीमाला प्रकरण के बहाने भारतीय लोकतंत्र में, संसद और संविधान के दायरे में, सियासत और न्यायपालिका के मठाधीशों के नजरिए में, क्या सही है और क्या गलत? क्या जिम्मेदारी है और क्या नहीं?, यह बहस का विषय नहीं होना चाहिए, बल्कि स्पष्ट कार्रवाई नजर आनी चाहिए। या तो सियासतदान, संसद और विधानमंडलों में कानून स्पष्ट बनाएं या फिर सुलगते सवालों पर न्यायपालिका के न्यायाधीशगण स्वतः संज्ञान लेकर निष्पक्ष न्यायदेश देने की पहल करें, क्योंकि आम जनता का हित सर्वोपरि होना चाहिए। 

धर्मनिरपेक्षता की आड़ में एक शांति प्रिय धर्म के बारे में  सुनवाई और दिशानिर्देश, जबकि दूसरे-तीसरे कट्टर धर्म के बारे में अपेक्षित सुनवाई पर टालमटोल ज्यादा दिन तक नहीं चलने वाला है, क्योंकि प्रबुद्ध हिंदुओं के संज्ञान में सारी बातें आईने की तरह चमक रही हैं और कॉन्वेंट एजुकेटेड लोगों से ज्यादा अपेक्षा भी किसी को नहीं है। 

लिहाजा, केंद्र सरकार और न्यायमूर्ति के स्टैंड अपनी अपनी जगह पर सही हैं, इसलिए भारतीय जनता के व्यापक हित में फैसला आना चाहिए, न कि पीक एंड चूज! जैसा कि विभिन्न विवादास्पद मामलों में प्रतीत होता है। सरकार और न्यायालय से जुड़े लोगों से बहुमत का पक्ष लेने की अपेक्षा नहीं कि जाती है, बल्कि बिटवीन द लाइंस की तरह ऐसा निर्णय आना चाहिए, जिसपर तर्क-वितर्क की कोई गुंजाइश ही न बने। 

बीच बहस में पड़ने का दूसरा अदृश्य पहलू यह है कि आम तौर पर किसी न्यायाधीश या नौकरशाह की बुद्धि आम  बहुमतधारी नेताओं की बुद्धि से औसत रूप में अच्छी समझी जाती है! फिर भी जब राजनीतिक अतिरेक पर, धार्मिक चुनींदेपन पर, व्यक्तिगत विभेद आदि पर न्यायपालिका और ओछी सियासत के बीच सबकुछ गड्डमड्ड दिखाई देने लगता है तो न्यायिक विवेक और विधायी विवेक के ऊपर सवाल उठाना लाजिमी है। यही पर जनमत को प्रभावित करने वाले संपादकीय विवेक का उत्तरदायित्व बढ़ जाता है! पर दुर्भाग्य की बात है कि इसे भी खुल्लमखुल्ला बाजार बनने को अभिशप्त बना दिया गया है।

सुलगता सवाल है कि आखिर विधायिका और न्यायपालिका देश के सुलगते हुए सवालों का हल बीते सात-आठ दशकों में भी क्यों नहीं ढूंढ पाई हैं? वहीं सामाजिक न्याय और साम्प्रदायिक सोच से जुड़े मसलों पर कड़वा सच कहने का हौसला नहीं प्रदर्शित कर पाई। इससे बहुमत का नँगानाच बढ़ा और मानवीयता नकार दी गई। विधिवत पक्षपात दिखता रहा, लेकिन न्यायविदों की खामोशी पीड़ितों की सिसकन पर भारी पड़ी। यह कोई उलाहना नहीं, बल्कि आपकी अंतरात्मा को झकझोरने की एक पहल है। आखिर कई बार न्यायपालिका/कार्यपालिका  भीड़तंत्र के समक्ष घुटने टेकती हुई प्रतीत क्यों होती हैं? यक्ष प्रश्न है।

खैर, जब जब ऐसा हुआ, उन्हें संपादकीय विवेक सम्मत आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। बावजूद इसके मुद्दे जस के तस बने हुए हैं और व्यवस्था पूंजीवादी सोच के प्रति नतमस्तक नजर आती है, क्योंकि 'दीपावली उपहार' तो किसान-मजदूर-कारीगर कभी दे नहीं सकते। सबसे बड़ा सवाल यह कि भारतीय संविधान के प्रथम संशोधन पर यानी संविधान की नौवीं अनुसूची पर न्यायिक चुप्पी आजतक प्रबुद्ध लोगों को खल रही है, क्योंकि जब सुप्रीम कोर्ट संविधान का संरक्षक है तो ऐसा कोई विषय नहीं छोड़ा जाना चाहिए, जिसकी न्यायिक समीक्षा नहीं हो सके, जैसा कि प्रथम संवैधानिक संशोधन के बाद प्रचलन में आया। यह तो महज एक बानगी है, अन्यथा कार्यपालिका की हरकतों पर न्यायपालिका की लाचारी दिखाती है कि लोकतंत्र आना अभी शेष है!

दरअसल, सबरीमला मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने गत 8 अप्रैल, दिन बुधवार को एक अहम टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि उसके पास यह तय करने का अधिकार है कि किसी धर्म में कौन-सी प्रथा अंधविश्वास है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीट ने कहा, अगर विधायिका चुप रहे तो न्यायपालिका हस्तक्षेप नहीं कर सकती? बता दें कि कोर्ट की यह टिप्पणी केंद्र सरकार के उस तर्क के जवाब में आई, जिसमें कहा गया था कि अदालत यह तय नहीं कर सकती कि कोई धार्मिक प्रथा अंधविश्वास है या नहीं। 

मसलन, केंद्र का कहना था कि जज कानून के विशेषज्ञ होते हैं, धर्म के नहीं। केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 'संवैधानिक नैतिकता' और 'ट्रांसफॉर्मेटिव कॉन्स्टिट्यूशनलिज्म' पर सवाल उठाए। उन्होंने स्पष्ट कहा कि, धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में 'संवैधानिक नैतिकता' को आधार नहीं बनाया जा सकता। मेहता ने कहा कि यह न्यायिक समीक्षा का स्वतंत्र आधार नहीं हो सकता।

सॉलिसिटर जनरल मेहता ने पूछा, अदालत कैसे तय कर सकती है कि कोई प्रथा अंधविश्वास है। भले कोई प्रथा अंधविश्वासी हो, उसे ऐसा घोषित करना अदालत का काम नहीं है। कानून बनाना विधायिका का अधिकार है। इस पर जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा, कोर्ट के पास यह कहने का अधिकार है कि कोई प्रथा अंधविश्वास है या नहीं।

जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा- समाज में नैतिकता समय के साथ बदलती है। किसी प्रथा को अंधविश्वासी मानने का अधिकार कोर्ट के पास है? सुप्रीम कोर्ट का सवाल है कि अगर विधायिका चुप रहे तो क्या न्यायपालिका हस्तक्षेप नहीं कर सकती, विधायिका चुप रहे तो? मेहता ने कहा, भारत जैसे विविध समाज में एक समुदाय की धार्मिक प्रथा दूसरे के लिए अंधविश्वास हो सकती है। इस पर जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने पूछा, कोई समुदाय जादूटोना को प्रथा बताए, तो उसे अंधविश्वास नहीं माना जाएगा? अगर अनुच्छेद 32 के तहत मामला कोर्ट में आए और विधायिका चुप रहे तो?

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी पूछा कि जो लोग भगवान अयप्पा के भक्त नहीं है, क्या वे मंदिर की परपराओ को चुनौती दे सकते है? सॉलिसिटर जनरल मेहता ने बताया कि मूल याचिका इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन ने दायर की थी। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने सवाल उठाया कि क्या गैर-भक्त को ऐसा अधिकार है?

इसे भी पढ़ें: Pawan Khera पर Action को Congress ने बताया Witch-Hunt, Venugopal बोले- यह Revenge Politics है

दरअसल, सबरीमला केस की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की पीठ कर रही है। धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश से जुड़े, सबरीमला विवाद मामलों पर सुनवाई चल रही है। इसी पर केंद्र ने कहा- धर्म में अंधविश्वास है या नहीं, यह तय करना अदालत का काम नहीं है। जब भक्त नहीं तो चुनौती कैसे दे सकते है? यहां पर केंद्र सरकार और न्यायपालिका के दृष्टिकोण से असहमत होने का कोई औचित्य नजर नहीं आता है, लेकिन मामले का सकारात्मक हल निकले, यह ज्यादा महत्वपूर्ण है।

प्रमुख खबरें

US Iran Peace Talks: अमेरिका में रह रहे ईरानी मूल के लोगों पर कार्रवाई - ट्रंप प्रशासन ने ग्रीन कार्ड छीने

Hormuz जलडमरूमध्य में US Navy का एक्शन, Trump बोले- दुनिया के लिए हम कर रहे हैं रास्ता साफ

Land for Jobs Scam: लालू यादव ने Delhi High Court को दी चुनौती, अब Supreme Court में होगी सुनवाई

इस्लामाबाद मीटिंग के बाद चीन का बड़ा खेल, तेहरान में सैकड़ों टन बम और मिसाइल!