By Ankit Jaiswal | Apr 09, 2026
सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला से जुड़े संवैधानिक मामलों की सुनवाई के दौरान गुरुवार को एक अहम टिप्पणी सामने आई, जिसने धार्मिक अधिकारों और सामाजिक एकता पर नई बहस छेड़ दी है। बता दें कि नौ जजों की संविधान पीठ इस मामले की समीक्षा कर रही है, जिसमें धार्मिक संप्रदायों के अधिकार और आम लोगों की पहुंच जैसे मुद्दे शामिल है।
दरअसल, वरिष्ठ वकील सी एस वैद्यनाथन ने दलील दी कि संविधान का अनुच्छेद 26(ख) धार्मिक संप्रदायों को अपने धार्मिक मामलों को स्वयं संचालित करने का अधिकार देता है और यह अनुच्छेद 25(2)(ख) से ऊपर होना चाहिए। गौरतलब है कि अनुच्छेद 25(2)(ख) राज्य को यह अधिकार देता है कि वह सभी वर्गों के हिंदुओं के लिए धार्मिक स्थलों के द्वार खोल सके।
इस पर कोर्ट ने पहले के एक महत्वपूर्ण फैसले का भी जिक्र किया, जिसमें कहा गया था कि सार्वजनिक धार्मिक स्थलों पर सभी वर्गों को प्रवेश मिलना चाहिए। जस्टिस नागरत्ना ने यह भी कहा कि अगर किसी मंदिर को केवल एक विशेष समुदाय तक सीमित कर दिया जाए, तो इससे समाज में बंटवारा बढ़ेगा और यह धार्मिक दृष्टि से भी सही नहीं होगा।
सुनवाई के दौरान जस्टिस अरविंद कुमार ने भी टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह की सीमाएं समाज को विभाजित कर सकती हैं। वहीं, मुख्य न्यायाधीश ने यह स्पष्ट किया कि संविधान में नैतिकता और समानता का सिद्धांत सर्वोपरि है, और अस्पृश्यता के खिलाफ प्रावधानों को भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
हालांकि, वैद्यनाथन ने यह तर्क दिया कि कुछ निजी और पारिवारिक मंदिर होते हैं, जहां केवल संबंधित परिवार या समुदाय के लोग ही जाते हैं। इस पर कोर्ट ने साफ किया कि वह ऐसे निजी मंदिरों की बात नहीं कर रहा, बल्कि सार्वजनिक धार्मिक स्थलों की चर्चा हो रही है।
यह बहस अब इस दिशा में आगे बढ़ रही है कि धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक समानता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। कोर्ट ने संकेत दिया कि धर्म की रक्षा के साथ-साथ समाज की एकता भी उतनी ही जरूरी है, और इसी आधार पर आगे की सुनवाई में महत्वपूर्ण फैसले सामने आ सकते हैं।