राममंदिर निर्माण की राह से बाधा तो हट गयी लेकिन नये झगड़े भी शुरू हो गये

By अजय कुमार | Nov 18, 2019

न्यायपालिका पर अकसर आरोप लगते थे कि वह दशकों से अयोध्या विवाद पर अंतिम फैसला देने की बजाए तारीख पर तारीख देता रहता है, लेकिन जब 'अंत भला तो सब भला' की तर्ज पर हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी अदालत ने अयोध्या विवाद का पटाक्षेप किया तो पूरे देश ने उसे सहर्ष स्वीकार लिया, ऐसा लगा पूरे देश के सिर से एक बड़ा बोझ उतर गया हो। मगर एक विवाद खत्म होते ही दूसरा विवाद शुरू हो गया है। मंदिर−मस्जिद बनाने की कवायद के नाम पर साधु−संतों, मुल्ला मौलवियों के साथ−साथ दोनों धर्मों के स्वयंभू ठेकेदारों ने आपस में सिर फुटव्वल शुरू कर दिया है। अयोध्या विवाद कोर्ट से सुलझने के बाद मंदिर−मस्जिद के पक्षकारों के बीच उलझने के चलते सुर्खियां बटोर रहा है।

बात पहले राम जन्म भूमि मंदिर निर्माण के पक्षकारों की कि जाए, जो मंदिर निर्माण के नाम पर एक−दूसरे को नीचा दिखाने में लगे हैं। यह सब तब हो रहा है जबकि सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार को बोर्ड ऑफ ट्रस्ट के गठन का निर्देश दिया है, लेकिन तमाम साधु−संतों को लगता है कि केन्द्र सरकार द्वारा उनको मंदिर निर्माण मुहिम से किनारे किए जाने की नौबत आए इससे पहले ही क्यों न सरकार पर दबाव बना लिया जाए। इसीलिए अभी जबकि कोर्ट के निर्देशानुसार केन्द्र सरकार मंथन ही कर रही है तब साधु समाज में अलग बहस और विचार सामने आने लगे हैं। कुछ लोगों को लगता है कि ट्रस्ट में भारतीय जनता पार्टी के करीबी हिन्दू संगठन को ज्यादा महत्व मिल सकता है। वहीं कई का अनुमान है कि विश्व हिन्दू परिषद अपनी बीजेपी से निकटता का फायदा उठा सकती है। विवाद का आलम यह है कि लम्बे समय से भगवान राम मंदिर निर्माण का जो मॉडल जनता को दिखाया जा रहा था, उस पर भी विवाद शुरू हो गया है। कुछ साधु−संत आदि अपना मंदिर निर्माण मॉडल तैयार करके उसके पक्ष में पैरोकारी में लगे हैं। मंदिर निर्माण को लेकर बढ़ते विवाद के बीच महंत परमहंस के आश्रम पर हमले से संत समाज में फूट और भी गहरा गई है। इससे संतों का बड़ा वर्ग क्षुब्ध है। उसका मानना है कि ऐसी घटनाओं से श्रद्धालुओं की आस्था को ठेस लगती है। इसकी पुनरावृत्ति नहीं होनी चाहिए।

अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के पूर्व अध्यक्ष एवं हनुमानगढ़ी सागरिया पट्टी के महंत ज्ञान दास का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार को आदेशित किया है। अब सरकार विधेयक लाएगी या कोई योजना प्रस्तुत करेगी, इसकी प्रतीक्षा करनी चाहिए। कुछ भी हो अच्छी बात यह है कि हम सबका अभीष्ट रामलला के भव्य मंदिर का निर्माण अब पूरा होने वाला है। यह हम सबका सौभाग्य होगा कि अपने जीवन में रामजन्मभूमि में विराजमान रामलला का दर्शन पा सकेंगे। मगर, सबकी सोच एक जैसी नहीं है। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट में पक्षकार एवं निर्वाणी अखाड़ा के महंत धर्मदास कहते हैं कि सरकार किस प्रकार का ट्रस्ट बनाएगी, यह देखना महत्वपूर्ण होगा। यदि इसमें सभी अखाड़े का प्रतिनिधित्व होगा तो उचित रहेगा। दिगम्बर अखाड़ा के महंत सुरेश दास भी मानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के पालन में सरकार जो चाहेगी वही होगा। हमें धैर्य रखकर इंतजार करना चाहिए। सुझाव मांगा जाएगा तो अलग बात है।

विवाद में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी आ गए हैं। रामजन्मभूमि के मुख्य अर्चक आचार्य सत्येन्द्र दास ने कहा कि ट्रस्ट का अध्यक्ष मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को बनाने में कोई बुराई नहीं है। उनके पास संवैधानिक अधिकार भी है जिससे विकास से लेकर अन्य समस्याओं का समाधान कराने में सक्षम होंगे। दूसरे गोरक्ष पीठ की तीन पीढ़ियां राम मंदिर आन्दोलन से जुड़ी रही हैं, लेकिन इसके साथ वह यह भी जोड़ देते हैं कि योगी जी एक राजनैतिक व्यक्ति भी हैं। आंजनेय सेवा संस्थान के संयोजक महंत शशि दास कहते हैं कि संत समाज ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर हमेशा भरोसा किया। कश्मीर में 370 हटी और राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ। जब इतना बड़ा काम हो गया तो फिर ट्रस्ट भी अच्छा ही बनेगा। संकटमोचन हनुमान मंदिर के महंत परशुराम दास ने भी कहा कि संत समाज को उतावलापन दिखाने की जरूरत कतई नहीं है। जो हो रहा है वह अच्छा हो रहा और आगे भी अच्छा ही होगा। हनुमानगढ़ी के मुख्य पुजारी रमेश दास ने कहा कि संतों को एकजुटता दिखानी चाहिए। बिखराव से गलत संदेश समूचे देश और हिन्दू समाज में जाएगा।

उधर, इन सब बातों से बेफिक्र रामजन्मभूमि विवाद के प्रमुख पक्षकार रहे निर्वाणी अखाड़ा के महंत धर्मदास रामजन्मभूमि में पूजा के अधिकार को लेकर अड़े हैं। उन्होंने अधिग्रहीत परिसर के रिसीवर समेत केन्द्र सरकार को भेजे अपने पत्र में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के हवाले से पूजा के अधिकार का दावा किया है। महंत दास ने अपने वकील के जरिए भेजे गए पत्र में कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में निर्मोही अखाड़ा के दावे को खारिज कर दिया है। साथ ही यह माना है कि उनके गुरु स्वर्गीय बाबा अभिराम दास अपने जीवनकाल में रामजन्मभूमि में पूजा करते थे। 22−23 दिसम्बर 1949 को रामलला के प्राकट्य के बाद कोर्ट के आदेश से जब कुर्की हुई तो रिसीवर ने उनके गुरुदेव से ही रामजन्मभूमि का चार्ज प्राप्त किया था। महंत श्री दास का कहना है कि कोर्ट के समक्ष यह तथ्य तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट की 23 दिसम्बर 1949 की रिपोर्ट में आया है कि उस समय रामलला का भोग राग बाबा अभिराम दास के अलावा, बाबा राम सुखदास व बाबा सुदर्शन दास की ओर से लगाया जा रहा था। इसके अलावा इस प्रकरण में दर्ज कराई गई प्राथमिकी के अभियुक्तों में पहला उनके गुरु बाबा अभिराम दास का ही नाम है। इसके अलावा एक फरवरी 1950 को जमानत के दौरान भी उनके गुरु बाबा अभिराम दास ने स्वयं को पुजारी रामजन्मभूमि बताया है।

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बात मुस्लिम पक्षकारों में विरोधाभास की करें तो प्रमुख पक्षकार इकबाल अंसारी ने अदालत के फैसले को स्वीकार कर लिया है। वह अब इस मामले को आगे नहीं ले जाना चाहते हैं और मस्जिद निर्माण के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश से मिलने वाली पांच एकड़ जमीन का इंतजार कर रहे हैं। वहीं सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील जफरयाब जिलानी कह रहे हैं कि हम कोर्ट के फैसले से संतुष्ट नहीं हैं। हम पुनर्विचार की मांग करेंगे। तो दूसरी तरफ वह यह भी कहते हैं कि हम सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करते हैं। यह फैसला किसी की जीत या हार नहीं है।

उधर, एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा था, ''खैरात में मस्जिद के लिए जमीन नहीं चाहिए। मैं कोर्ट के फैसले से संतुष्ट नहीं हूं। सुप्रीम कोर्ट वैसे तो सबसे ऊपर है, लेकिन अपरिहार्य नहीं है।' उन्होंने कहा था, 'हम अपने अधिकार के लिए लड़ रहे हैं, हमें खैरात के रूप में पांच एकड़ जमीन नहीं चाहिए, हमें इस पांच एकड़ जमीन के प्रस्ताव को खारिज कर देना चाहिए। हम पर कृपा करने की जरूरत नहीं है। ओवैसी ने आगे कहा था, 'अगर मस्जिद वहां पर रहती तो सुप्रीम कोर्ट क्या फैसला लेता। यह कानून के खिलाफ है। बाबरी मस्जिद नहीं गिरती तो फैसला क्या आता? जिन्होंने बाबरी मस्जिद को गिराया, उन्हें ट्रस्ट बनाकर राम मंदिर बनाने का काम दिया गया है।' अब ओवैसी अपने एक नये ट्वीट के जरिए विवाद खड़ा करते हुए कह रहे हैं' 'मुझे मेरी मस्जिद वापस चाहिए।' 

वहीं गीतकार और लेखक जावेद अख्तर मस्जिद को मिली 5 एकड़ की जगह में हॉस्पिटल बनाने की सलाह दे रहे हैं। जावेद अख्तर को लगता है कि बहुत अच्छा होगा अगर मस्जिद निर्माण के लिए 5 एकड़ मिली जगह पर चैरिटेबल हॉस्पिटल बना दिया जाएगा और इसे सभी समुदाय के लोगों का समर्थन भी मिलेगा। जावेद की तरह ही बॉलीवुड के सुपरस्टार सलमान खान के पिता सलीम खान सुप्रीम कोर्ट के फैसले के संदर्भ में मुसलमानों को नसीहत दे रहे हैं, 'अयोध्या विवाद के खत्म होने पर मुसलमानों को मोहब्बत और माफी इन दो सद्गुणों का पालन कर आगे बढ़ना चाहिए। मोहब्बत जाहिर करिए और माफ करिए। इस तरह के मामलों को रिवाइंड या रिकैप ना करें...बस यहां से आगे बढ़ें।' जावेद अख्तर और सलीम खान की प्रतिक्रिया पर मुस्लिम पक्ष के कुछ नेताओं ने अपना आपा खो दिया। उन्होंने नसीहत दे डाली कि बाबरी मस्जिद बचाने के लिए कुछ नहीं करने वाले लोग हमें नसीहत न दें।

-अजय कुमार

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