By नीरज कुमार दुबे | Jul 16, 2026
जम्मू-कश्मीर में पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग के बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सैफुद्दीन सोज ने जिस तरह बहस का रुख अनुच्छेद 370 की बहाली और तथाकथित अंदरुनी स्वायत्तता की ओर मोड़ने की कोशिश की है, उसने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सोज ने साफ कहा कि नेशनल कांफ्रेंस को जंतर मंतर पर केवल राज्य का दर्जा मांगने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि अनुच्छेद 370 की बहाली के लिए भी संघर्ष करना चाहिए। इतना ही नहीं, उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर का असली मुद्दा अंदरुनी स्वायत्तता है और यह उनकी अपनी शर्तों पर बहाल होनी चाहिए।
दिलचस्प यह भी है कि सोज ने राज्य का दर्जा बहाल करने के मुद्दे को लगभग गौण बताते हुए कहा कि उसे कोई हमेशा के लिए केंद्र शासित प्रदेश नहीं रख सकता, इसलिए असली लड़ाई अनुच्छेद 370 और अंदरुनी स्वायत्तता की है। इससे यह संदेश जाता है कि राज्य का दर्जा उनके लिए प्राथमिक विषय नहीं, बल्कि विशेष संवैधानिक व्यवस्था की वापसी ही मुख्य लक्ष्य है।
उधर, सोज के बयान पर भारतीय जनता पार्टी ने तीखी प्रतिक्रिया दी। पार्टी प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने इसे राष्ट्रविरोधी बताते हुए कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, सोनिया गांधी और राहुल गांधी से स्पष्ट जवाब मांगा कि क्या यह कांग्रेस का आधिकारिक रुख है। उनका कहना था कि यदि कांग्रेस सोज के बयान से सार्वजनिक रूप से दूरी नहीं बनाती और उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं करती, तो इसे पार्टी की आधिकारिक सोच माना जाएगा। भाजपा ने यह भी आरोप लगाया कि अंदरुनी स्वायत्तता की मांग भारत की एकता और अखंडता के लिए खतरनाक संदेश देती है।
देखा जाये तो अब सबसे बड़ा सवाल कांग्रेस के सामने है। क्या सैफुद्दीन सोज का बयान उनकी व्यक्तिगत राय है या पार्टी की राजनीतिक सोच? यदि यह निजी विचार हैं तो कांग्रेस अब तक स्पष्ट खंडन क्यों नहीं कर रही? और यदि पार्टी इस सोच से सहमत है तो क्या वह देश को यह बताने का साहस करेगी कि जम्मू-कश्मीर पर उसका वास्तविक रुख क्या है? इस पूरे विवाद ने केवल सोज की सोच को ही कठघरे में नहीं खड़ा किया है, बल्कि कांग्रेस के नेतृत्व की चुप्पी को भी कटघरे में ला खड़ा किया है। देश अब बयान नहीं, बल्कि स्पष्ट और दो टूक जवाब चाहता है।