Prof. Sanjay Dwivedi की Book 'संजय उवाच' बनी 'संवाद की सभ्यता' का घोषणापत्र, जानिए क्या है इसमें खास

By प्रेस विज्ञपति | Jun 02, 2026

कुछ लोग जब बोलते हैं, तो शब्द नहीं, विचारों की बौछार होती है। कभी वह बौछार भिगो देती है, कभी चौंका देती है, और कभी-कभी असहज भी कर देती है। प्रो. संजय द्विवेदी ऐसे ही वक्ता हैं। उनकी बातचीत की शैली में चुटकियाँ भी हैं, तंज भी, और वह बेधड़क स्पष्टता भी, जो कभी मुरीद बनाती है, कभी बेचैन कर देती है। पर यह भी सच है कि संजय जी की कही हर बात को उनके लहजे से हटकर सुना जाए, तो भीतर कुछ बहुत महीन और जरूरी मिलता है। यही बात उनकी नवीनतम पुस्तक 'संजय उवाच' पर भी लागू होती है।

पुस्तक का पहला अध्याय 'संवाद से बनेगी सुंदर दुनिया', केवल शीर्षक नहीं, एक दर्शन है। लेखक उपदेशक की ऊँची पीठ से नहीं बोलते, बल्कि एक सहयात्री की तरह साथ चलते हैं। और यही उनकी सबसे बड़ी शक्ति है  यह पुस्तक पढ़ी नहीं जाती, सुनी जाती है।मीडिया पर उनका चिंतन उस दौर में और भी अनिवार्य हो जाता है, जब पत्रकारिता बाज़ार के शोर में अपनी आत्मा गँवाती जा रही है। पैंतीस से अधिक पुस्तकों के रचयिता और 'मीडिया विमर्श' पत्रिका के कार्यकारी संपादक यह स्थापित करते हैं , पत्रकारिता मिशन है, व्यवसाय नहीं। जड़ों की ओर लौटने का उनका आग्रह, भारतीय लोकजीवन से मीडिया के टूटते रिश्ते की व्याकुल पुकार है।

भाषा पर वे न तलवार उठाते हैं, न किसी को कठघरे में खड़ा करते हैं , बस इतना याद दिलाते हैं कि भाषा केवल संप्रेषण का उपकरण नहीं, किसी जाति की सांस्कृतिक स्मृति की जड़ें हैं। हिंदी को वे भारत की सेतु-भाषा बताते हैं ,वर्चस्व की भाषा नहीं, प्रेम की भाषा। अंबेडकर, तुलसीदास, नेताजी, दीनदयाल  इन सबको एक ही सूत्र में पिरोते हुए वे सिद्ध करते हैं कि भारत राजनीतिक राष्ट्र-राज्य नहीं, करुणा और सहअस्तित्व से निर्मित एक जीवंत सभ्यता है।

'संजय उवाच' को ठहरकर पढ़िए, जल्दी में नहीं। जैसे संजय जी की बातें उनके लहजे के पार जाकर सुनने पर असली अर्थ देती हैं, वैसे ही इस किताब के पन्ने भी उन्हें ही कुछ देंगे, जो रुककर पढ़ेंगे। क्योंकि यह पुस्तक अंततः एक ही बात कहती है- सभ्यता का आधार शक्ति नहीं, ’संवाद’ है।

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