संजय राउत ने डोनाल्ड ट्रंप को पत्र में जो कुछ लिखा है उससे विपक्षी नेताओं की देशभक्ति पर सवाल उठ गया है

By नीरज कुमार दुबे | May 08, 2026

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद विपक्षी गठबंधन के कई नेताओं की प्रतिक्रियाएं अब केवल राजनीतिक असहमति तक सीमित नहीं रह गई हैं, बल्कि वह भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं और संवैधानिक व्यवस्था पर सीधे सवाल खड़े करती दिखाई दे रही हैं। शिवसेना यूबीटी के नेता संजय राउत द्वारा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को पत्र लिखना और ममता बनर्जी द्वारा अंतरराष्ट्रीय अदालत जाने की चेतावनी देना इसी प्रवृत्ति का ताजा उदाहरण है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या देश के आंतरिक मामलों को विदेशी शक्तियों और वैश्विक मंचों तक ले जाना लोकतंत्र की रक्षा है या फिर भारत की छवि को नुकसान पहुंचाने का प्रयास?

क्या भारत इतना कमजोर लोकतंत्र है कि यहां के चुनावों का फैसला विदेशी नेताओं की राय से तय होगा? क्या विपक्ष यह संदेश देना चाहता है कि भारत की संवैधानिक संस्थाओं पर उसे भरोसा नहीं है? यदि हर हार के बाद अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जाकर देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को कठघरे में खड़ा किया जाएगा, तो इससे दुनिया में भारत की छवि पर क्या असर पड़ेगा?

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इस पूरे विवाद में ममता बनर्जी का बयान भी कम गंभीर नहीं है। चुनाव हारने के बाद उनका यह कहना कि वह अंतरराष्ट्रीय अदालत तक जाएंगी, कई सवाल खड़े करता है। क्या किसी राज्य के चुनावी परिणाम को लेकर संयुक्त राष्ट्र की न्यायिक संस्था में जाने की बात करना भारत की संप्रभुता पर प्रश्नचिह्न लगाने जैसा नहीं है? जब देश का संविधान, सर्वोच्च न्यायालय और चुनाव आयोग मौजूद हैं, तब विदेशी अदालतों की चर्चा क्यों?

दरअसल यह वही राजनीति है जिसमें जब तक सत्ता हाथ में रहे तब तक संस्थाएं निष्पक्ष लगती हैं, लेकिन हार मिलते ही चुनाव आयोग, सुरक्षा बल, न्यायपालिका और लोकतंत्र सब कटघरे में खड़े कर दिए जाते हैं। यह प्रवृत्ति केवल राजनीतिक असंतोष नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता के विश्वास को कमजोर करने का प्रयास भी मानी जा सकती है।

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या विपक्षी दल अपनी राजनीतिक हार को स्वीकार करने का साहस खो चुके हैं? क्या लोकतंत्र केवल तब तक सही है जब तक परिणाम उनके पक्ष में आएं? यदि हर चुनाव के बाद विदेशी शक्तियों से हस्तक्षेप की मांग की जाएगी, तो क्या यह देश की आंतरिक संप्रभुता के खिलाफ कदम नहीं माना जाएगा?

भारत का लोकतंत्र दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहां सत्ता परिवर्तन चुनावों के माध्यम से होता है, अदालतें स्वतंत्र हैं और मीडिया पूरी तरह सक्रिय है। ऐसे में विदेशी नेताओं और अंतरराष्ट्रीय मंचों को भारत के घरेलू राजनीतिक विवादों में घसीटना न केवल राजनीतिक अपरिपक्वता दर्शाता है, बल्कि यह देश की गरिमा को भी ठेस पहुंचाता है।

राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन देश की छवि और संस्थाओं की विश्वसनीयता से खिलवाड़ किसी भी स्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता। देखा जाये तो लोकतंत्र में हार और जीत दोनों को स्वीकार करना ही सबसे बड़ी लोकतांत्रिक मर्यादा होती है। लेकिन संजय राउत जैसे लोग जोकि खुद करोड़ों के घोटाले के आरोप से जुड़े हैं और जेल काट चुके हैं, वह भारत के लोकतंत्र की शुचिता और जनमत की ईमानदारी पर सवाल उठा रहे हैं। यहां एक सवाल यह भी उठता है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दी गयी बधाई विपक्ष को इतनी चुभ क्यों रही है?

साथ ही संजय राउत भारतीय लोकतंत्र को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से शिकायत कर रहे हैं, लेकिन उन्हें यह भी देखना चाहिए कि स्वयं अमेरिका में लोकतंत्र की स्थिति को लेकर कितने गंभीर सवाल उठ चुके हैं। दुनिया ने देखा कि वर्ष 2020 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में हार के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने चुनाव परिणाम स्वीकार करने से इंकार कर दिया था। चुनावी धांधली के आरोपों को लेकर उनके समर्थकों ने अमेरिकी संसद भवन कैपिटल हिल पर हमला तक कर दिया था, जिसे अमेरिकी लोकतंत्र के इतिहास का सबसे काला अध्याय माना गया। उस घटना में हिंसा हुई, कई लोग घायल हुए और पूरे विश्व ने अमेरिका की लोकतांत्रिक व्यवस्था को संकट में देखा। इतना ही नहीं, ट्रंप लगातार अमेरिकी चुनाव प्रणाली, न्याय व्यवस्था और मीडिया की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाते रहे हैं। ऐसे में भारतीय नेताओं द्वारा अमेरिका को सर्वश्रेष्ठ लोकतंत्र का प्रमाण पत्र बांटने वाला देश मान लेना अपने आप में कई प्रश्न खड़े करता है। भारत में चुनाव करोड़ों मतदाताओं की भागीदारी से शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न होते हैं और सत्ता परिवर्तन भी संवैधानिक प्रक्रिया के तहत होता है। इसलिए विदेशी नेताओं से शिकायत करने से पहले विपक्ष को यह भी देखना चाहिए कि जिन देशों की ओर वह उम्मीद भरी नजरों से देख रहा है, वहां स्वयं लोकतंत्र कितनी चुनौतियों से गुजर रहा है।

-नीरज कुमार दुबे

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