संस्कृत किसी धर्म-विशेष की भाषा नहीं है, इसे अनिवार्य रूप से सबको पढ़ाना चाहिए

By डॉ. वेदप्रताप वैदिक | Jun 29, 2022

गुजरात के शिक्षा मंत्री से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कुछ प्रमुख कार्यकर्ताओं ने अनुरोध किया है कि वे अपने प्रदेश में संस्कृत की अनिवार्य पढ़ाई शुरू करवाएं। यह मांग सिर्फ संघ के स्वयंसेवक ही क्यों कर रहे हैं और सिर्फ गुजरात के लिए ही क्यों कर रहे हैं? भारत के हर तर्कशील नागरिक को सारे भारत के लिए यह मांग करनी चाहिए, क्योंकि दुनिया में संस्कृत जैसी वैज्ञानिक, व्याकरणसम्मत और समृद्ध भाषा कोई और नहीं है। यह दुनिया की सबसे प्राचीन भाषा तो है ही, शब्द भंडार इतना बड़ा है कि उसके मुकाबले दुनिया की समस्त भाषाओं का संपूर्ण शब्द-भंडार भी छोटा है।

संस्कृत को किसी धर्म-विशेष से जोड़ना भी गलत है। संस्कृत जब प्रचलित हुई, तब पृथ्वी पर न तो हिंदू, न ईसाई और न ही इस्लाम धर्म का उदय हुआ था। संस्कृत भाषा किसी जाति-विशेष की जागीर नहीं है। क्या उपनिषदों का गाड़ीवान रैक्व ब्राह्मण था? संस्कृत को पढ़ने का अधिकार हर मनुष्य को है। औरंगजेब के भाई दाराशिकोह क्या हिंदू और ब्राह्मण थे? उन्होंने 50 उपनिषदों का संस्कृत से फारसी में अनुवाद ‘सिर्रे अकबर’ के नाम से किया था। अब्दुल रहीम खानखाना ने ‘खटकौतुकम’ नामक ग्रंथ संस्कृत में लिखा था। तेहरान विश्वविद्यालय में मेरे एक साथी प्रोफेसर कुरान-शरीफ का अनुवाद संस्कृत में करने लगे थे। कुछ ईसाई विद्वानों ने संस्कृत ‘ख्रीस्त गीता’ और ‘ख्रीस्त भागवत’ भी लिखी है।

कुछ अंग्रेज विद्वानों ने अब से लगभग पौने 200 साल पहले बाइबिल का संस्कृत अनुवाद ‘नूतनधर्म्मनियमस्य ग्रंथसंग्रहः’ के नाम से प्रकाशित कर दिया था। लगभग 40 साल पहले पाकिस्तान में मुझे एक पुणे के मुसलमान विद्वान मिले। मैं उनके घर गया। वे मुझसे लगातार संस्कृत में ही बात करते रहे। भारत में पंडित गुलाम दस्तगीर और डॉ. हनीफ खान जैसे संस्कृत के विद्वानों से मेरी पत्नी डॉ. वेदवती का सतत संपर्क बना रहा। अलीगढ़ मुस्लिम वि.वि. की संस्कृत पंडिता डॉ. सलमा महफूज ने ही दाराशिकोह के 'सिर्रे अकबर' का हिंदी अनुवाद किया है। अभी भी मेरे कई परिचित मुसलमान मित्र विभिन्न विश्वविद्यालयों में संस्कृत के आचार्य हैं। इसीलिए मेरा निवेदन है कि संस्कृत को किसी मजहब या जाति की बपौती न बनाएं। जरूरी यह है कि भारत के बच्चों को संस्कृत, उनकी मातृभाषा और राष्ट्रभाषा हिंदी 11वीं कक्षा तक अवश्य पढ़ाई जाए और फिर अगले तीन साल बी.ए. में उन्हें छूट हो कि वे अंग्रेजी या अन्य कोई विदेशी भाषा पढ़ें। कोई भी विदेशी भाषा सीखने के लिए तीन साल बहुत होते हैं। उसके कारण हमारे बच्चों को संस्कृत के महान वरदान से वंचित क्यों किया जाए?

-डॉ. वेदप्रताप वैदिक

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