भैयाजी की कुतिया (व्यंग्य)

By दीपक गिरकर | Feb 05, 2022

यह कहना कठिन है कि हमारे शहर में लोग भैयाजी को उनकी कुतिया की वजह से पहचानते हैं या कुतिया को भैयाजी के कारण पहचानते हैं। यह एक बहुत बड़े शोध का विषय है। वैसे शहर के लोगों को मालूम हैं कि भैयाजी एक बहुत बड़े नेता हैं। वे शहर की कई धार्मिक और साहित्यिक संस्थाओं के अध्यक्ष हैं। भैयाजी भाषण कला में निपुण हैं। वे तेजस्वी वक्ता हैं। भैयाजी के पास एक बहुत ही सुन्दर कुतिया थी। वह कुतिया भी भौंकने की कला में बड़ी निपुण थी। भैयाजी की कुतिया ने मालवा की सौंदर्य प्रतियोगिता जीत कर मिस मालवा कुतिया अवार्ड प्राप्त कर इस शहर का नाम और भैयाजी का नाम रोशन किया था। कुतिया की इस उपलब्धि पर शहर में जगह-जगह उसका तथा भैयाजी का सम्मान किया गया। भैयाजी को अपने बच्चों की अपेक्षा अपनी कुतिया से बहुत अधिक प्रेम था। भैयाजी के बच्चे भैयाजी की पत्नी के साथ सोते थे जबकि भैयाजी की कुतिया भैयाजी के साथ सोती थी। भैयाजी के बच्चे लाइफबॉय साबुन से नहाते थें जबकि भैयाजी की कुतिया डॉव साबुन से नहाती थी। जिस दिन भैयाजी कुतिया को शैम्पू से नहलाते थे उस दिन कुतिया के शरीर से आती भीनी भीनी सुगंध से मोहल्ले के कुत्ते दीवाने हो जाते थें। कुतिया को सुबह नाश्ते में महंगे बिस्कुट और विदेशी चॉकलेट मिलती थी जबकि भैयाजी के बच्चों को रात की बची हुई रोटियां मिलती थी। कुतिया हर सुबह भैयाजी को मॉर्निंग वॉक पर ले जाती थी। कुतिया की खूबसूरती की वजह से कई कुत्ते भैयाजी के घर के आसपास घूमते रहते थें।

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एक बार भैयाजी की कुतिया खो गई थी। मैं और मेरे जैसे भैयाजी के ढेर सारे चमचे कुतिया को खोजने शहर की हर गली, मोहल्ले में निकल पड़े थें। उस समय भैयाजी ने प्रशासन का जीना हराम कर दिया था। जब मैं भैयाजी के साथ थाने में कुतिया के खोने की एफआईआर लिखवाने गया तब थानेदार ने भैयाजी को अपनी कुर्सी पर बैठाकर खड़े-खड़े एफआईआर लिख ली और भैयाजी को विश्वास दिलाया कि 24 घंटे के अंदर वे भैयाजी की कुतिया को ढूंढ निकालेंगे। उस समय थाने में एक व्यक्ति अपनी 16 साल की बिटिया के खोने की एफआईआर लिखवाने आया हुआ था और थानेदार साहब के पैरों में गिरकर एफआईआर लिखने के लिए निवेदन कर रहा था।  थानेदार ने उस व्यक्ति को झिड़क दिया और थाने से यह कहते हुए भगा दिया कि तुम्हारी बेटी किसी लफंगे के साथ भागकर गुलछर्रे उड़ा रही होगी, पुलिस वालों को और कुछ काम नहीं है क्या? खैर भैयाजी की कुतिया 24 घंटे के अंदर ही मिल गई थी।  वह एक कुत्ते के प्यार में दीवानी हो गई थी और उस कुत्ते के पीछे-पीछे चली गई थी।

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कुतिया की मृत्यु पर भैयाजी बहुत अधिक फूट-फूट कर रोए थें। भैयाजी के चमचे भी रोने में भैयाजी का साथ दे रहे थें। भैयाजी के आस-पड़ोस के लोगों ने बताया था कि भैयाजी अपने मातापिता की मृत्यु पर भी इतना नहीं रोए थें। मुझे बहुत अधिक अफ़सोस है कि मैं कुतिया की मृत्यु के दिन कुतिया के अंतिम संस्कार में और मृत्यु के तीसरे दिन उठावने में नहीं जा सका था। लोग बताते हैं कि भैयाजी की कुतिया के अंतिम संस्कार में और उठावने में इतने अधिक प्राणी आए थे कि पूरे शहर में जाम लग गया था और प्रशासन को मोर्चा संभालना पड़ा था। भैयाजी की कुतिया की अंतिम यात्रा बहुत भव्य थी। कुतिया की अंतिम यात्रा का कई टीवी चैनल ने लाइव प्रसारण किया था। लोग बताते हैं कि भैयाजी के माता-पिता को अंतिम संस्कार में गीली लकड़ी मिली थी लेकिन कुतिया बहुत नसीब वाली थी। उसका अंतिम संस्कार चन्दन की लकड़ी से हुआ था। 


- दीपक गिरकर

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