ब्लू ड्रम (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ | Aug 11, 2025

यह भी एक अजीब दौर है। पहले प्रेम कहानियाँ लिखी जाती थीं, कविताएँ गढ़ी जाती थीं, लेकिन अब तो हर तरफ 'ब्लू ड्रम' की चर्चा है। यह ‘ब्लू ड्रम’ अब केवल एक ड्रम नहीं रहा, बल्कि एक प्रतीक बन गया है। प्रतीक उस प्रेम का, जो लाल रंग से नहीं, नीले रंग से लिखा गया है। प्रतीक उस त्याग का, जो पत्नी ने अपने पति के लिए नहीं, बल्कि अपने प्रेमी के लिए किया। और प्रतीक उस आधुनिकता का, जिसमें रिश्तों की डोर इतनी कमजोर हो गई है कि वह एक ड्रम और एक बोरी सीमेंट के भार को भी नहीं सह पाती।

वैसे तो हमारे समाज में प्रेम की परिभाषा बड़ी पुरानी है। लैला-मजनूं, हीर-रांझा, शीरीं-फरहाद – इन सबकी कहानियों में न तो कोई ड्रम था, न कोई सीमेंट। उस जमाने में प्रेम के लिए दीवारें फाँदी जाती थीं, रेगिस्तान पार किए जाते थे, और न जाने क्या-क्या पापड़ बेले जाते थे। लेकिन इस आधुनिक युग में, प्रेम के लिए सबसे आसान तरीका है – पति को मारकर उसे एक ड्रम में भर देना।

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हमारे पड़ोस में एक श्रीमान खुसुरफुसुर रहते थे। उनका नाम खुसुरफुसुर इसलिए पड़ा, क्योंकि जब भी वह अपनी पत्नी से बात करते, उनकी आवाज इतनी धीमी होती थी कि कोई दूसरा सुन न पाए। लोग कहते थे, "मालिक, आप इतने धीरे क्यों बोलते हैं? पत्नी से प्रेम है तो चिल्ला कर कहिए!" इस पर श्रीमान खुसुरफुसुर मुस्कुराते हुए कहते, "प्रेम तो है, लेकिन अगर चिल्ला कर कहूँगा, तो सारा मोहल्ला सुन लेगा। फिर कहीं प्रेम की कहानी में कोई तीसरा किरदार न आ जाए।"

लेकिन श्रीमान खुसुरफुसुर की यह सावधानी काम नहीं आई। एक दिन उनके घर से नीले रंग का एक ड्रम बरामद हुआ। और उस ड्रम में सिर्फ सीमेंट ही नहीं, बल्कि श्रीमान खुसुरफुसुर का वह प्रेम भी था, जो उन्होंने अपनी पत्नी के लिए वर्षों से छिपा रखा था।

यह घटना सुनकर श्रीमान खलबली को बहुत दुख हुआ। वह अपने जमाने के आशिक थे, जो अपनी प्रेमिका के लिए सात समंदर पार करने की बात करते थे। लेकिन इस ब्लू ड्रम की कहानी ने उनका दिल तोड़ दिया।

"मास्साब," उन्होंने मुझसे कहा, "यह क्या हो रहा है? क्या हमारे देश में प्रेम की यह नई परिभाषा है? पहले तो पति-पत्नी के रिश्ते में प्यार होता था, तकरार होती थी, लेकिन अब तो केवल ड्रम और सीमेंट है।"

मैंने उनसे कहा, "श्रीमान खलबली, यह नई परिभाषा नहीं, बल्कि एक नया आविष्कार है। यह प्रेम की 'मेक इन इंडिया' पॉलिसी का हिस्सा है। अब प्यार करने के लिए किसी पहाड़ पर नहीं जाना पड़ता, किसी नदी को पार नहीं करना पड़ता, बस एक ड्रम और कुछ बोरियाँ सीमेंट खरीदनी होती हैं। यह तो 'अटल प्रेम योजना' का एक हिस्सा है, जहाँ कम खर्च में प्रेम को स्थायी बनाया जा सकता है।"

इस घटना के बाद हमारे मोहल्ले में एक नई बहस शुरू हो गई। कोई कह रहा था कि पत्नी ने गलत किया, तो कोई कह रहा था कि पति ही गलत था। लेकिन एक बात पर सब सहमत थे – ड्रम का रंग नीले के बजाय लाल होना चाहिए था। कम से कम प्रेम तो लाल रंग का होता है।

इस घटना के बाद मैंने सोचा कि क्यों न एक नया बिजनेस शुरू किया जाए – 'ब्लू ड्रम एम्बलम'। जो भी अपनी पत्नी के प्रेम से तंग आ जाए, वह यह ड्रम खरीद सकता है। और इस ड्रम के साथ एक गारंटी कार्ड भी मिलेगा, जिस पर लिखा होगा – 'आपका पति अब सुरक्षित रहेगा, और आपका प्रेम स्थायी हो जाएगा।'

इस घटना ने मुझे यह भी सिखाया कि प्यार करने के लिए एक दिल ही काफी नहीं, बल्कि एक दिमाग भी चाहिए। और वह दिमाग जो यह सोच सके कि प्यार को स्थायी बनाने का सबसे आसान तरीका क्या है। अब तो प्रेम की कहानियों में न तो कोई राजकुमार होता है, न कोई राजकुमारी। अब तो केवल एक ड्रम होता है, एक सीमेंट की बोरी होती है, और एक ऐसी पत्नी होती है, जो अपने प्रेम को स्थायी बनाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है।

- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’,

(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

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