By संतोष उत्सुक | Dec 16, 2022
झाड़ू का एक ख़ास विज्ञापन मुझे पिछले दिनों से पटाने में लगा है। बहुत भक्तिशाली विज्ञापन बनाया और मॉडलिंग कराई हुडदंगी फ़िल्म ज़माने के प्रसिद्ध खलनायक से, जिन्होंने हीरो से खूब झाड़ू और झाड़ खाई। झाड़ू बेचने वाली कम्पनी अनुभवी है। दिल चाहता है झाड़ू को झाड़ू न लिखकर झाड़ूजी लिखूं। अच्छी, प्रभावशाली चीजों के नाम के साथ जी लिखना और बोलना सभ्य संस्कृति है।
विशेषता यह भी है कि इस कमाल झाड़ू से धूल कम उड़ेगी। यह तो वाकई नया आविष्कार हुआ। संभव है इसकी घास ऐसी गुण रखती हो तभी हर सतह के लिए लाजवाब रहेगा। किसी भी मौसम में एक जैसे परिणाम देगा। एक खूबी और भी है, यह झाड़ू तीन तरह की पैकिंग में उपलब्ध है। मकान के फर्श के रंग और ढंग, उस पर लगी टाइलें या संगमरमर, आंगन की शक्ल के हिसाब से सिल्वर, डायमंड और गोल्डन शैली में पेश किया गया है। संभव है इन झाड़ूजी में से साफ़ करते हुए खुशबू भी आए। मनपसंद खुशबुओं में भी आने लगे। विकासजी की कितनी मेहरबानी हो रही है।
एक जोड़ी दस्ताने भी ‘मुफ्त’ साथ होते तो हैंडल पर फिंगर प्रिंट्स भी न आते। पता न चलता सफाई पति ने की या पत्नी ने ही निबटाया। यह तारीफ़ लायक है कि इन तीन तरह के झाडुओं के हैंडल अलग अलग रंग के हैं, पैकिंग तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर की है ही। दिलचस्प यह है कि पैकिंग का रूप, राष्ट्रीय खेल क्रिकेट के बल्ले जैसा बनाया गया है। बाज़ार या मॉल कहीं से भी लाओ तो निश्चय ही लगेगा कि क्रिकेट का बल्ला लाए हैं। वह अलग बात है कि घर आकर झाड़ूजी ही निकलेंगे। कुछ दिन तक क्रिकेट प्रभाव के लिए यूं ही रख सकते हैं।
झाड़ूजी की जानकारी सीमित लगे तो अधिक जानकारी के लिए संपर्क नंबर दिए हैं। ऑनलाइन भी मंगा सकते हैं। जिन चीज़ों को समाज की बहुत ज़रूरत है उन्हें बढ़ावा देने के लिए विज्ञापन वार जारी है। इंसान की आंतरिक स्वच्छता के लिए हो रहे विज्ञापन भी तो बाहरी झाड़ू बनकर रह गए हैं। हैरान होने की बात नहीं है, अब ईमानदारी, इंसानियत, सदभाव, प्रेम, सच, विशवास सिर्फ बातों में ज्यादा रह गए है। बदलते वक़्त ने हमारी समझ पर और हमने अपनी सोच पर विज्ञापन का प्रभावशाली झाड़ू फेर दिया है।
- संतोष उत्सुक