तेरे कारण, कोरोना (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Apr 13, 2020

मेरा दिल कर रहा है कोरोना का शुक्रिया अदा करूं। यह हमारे जीवन में एक सख्त, अनुशासन सिखाऊ अध्यापक की तरह आया है। आप नाराज़ हो रहे होंगे कि दुश्मन का शुक्रिया अदा करने की गुस्ताखी कर रहा हूं। क्या दुश्मन को दुश्मन न मानना हमारी संस्कृति नहीं है। यह तो हमारे पुराने चीनी भाई के यहां से आया है। जय स्वदेशी के नारों के बीच, इतने बरसों से चीन से इतना कुछ आता रहा है तो कोरोना जैसा शक्तिशाली रस भी तो वहां से आ सकता था। रस सप्लाई करना उस की पारम्परिक संस्कृति है। यह सोचने की किसे फुर्सत है कि कोरोना किस किस को विस्थापित कर जाएगा लेकिन जीवन के पवित्र मूल्य जो हमने अपने जीवन से लगभग विसर्जित कर दिए थे, पुन: स्थापित हो रहे हैं। चौबीस घंटे उपलब्ध मनोरंजन, तनरंजन में खो गए थे लेकिन कोरोना से मिलने  के लिए मानवता, मदद, बचाव, सदभाव, प्यार व सम्मान सब लौट आए हैं। सच्चे धर्म कर्म में लोगों की रूचि बढ़ गई है। 

हमारे आदरणीय धर्म रक्षकों ने पूरे देशवासियों की सहनशक्ति यह कहकर बढ़ा दी थी कि कोरोना हमारे देश का कुछ नहीं बिगाड़ सकता क्यूंकि उसे हमारे करोड़ों देवी देवता संभाल लेंगे। क्या हमारे जीवन में भगवान का रोल आ गया है। दया, करुणा, सहयोग जैसे मानवीय सरोकारों ने अस्थायी रूप से सही लेकिन फिर से सर उठाना शुरू कर दिया है। स्वच्छता बनाए रखने वाले व इंसानी ज़िन्दगी बचाने वालों की कीमत पता चल रही है तभी उनका शुक्रिया फिल्हाल ताली, शंख और ताली बजा कर अदा किया जा रहा है। संभव है असली शुक्रिया भी किया जाए। शंका में लिपटी सम्भावना लगती है कि अब हमारा समाज वास्तविक प्रतिभाओं का उचित सम्मान करना सीख लेगा। 

कोरोना ने जिनकी कलई उतार दी है उनकी असलियत से भी समाज चौकन्ना रहा करेगा। लग रहा है एक बार मिलने वाले मानवीय जीवन की अमूल्यता का एहसास होने लगा है। शायद तभी मजदूरों व कामगारों पर ख़ास ध्यान रखने की बातें राजनीति को चुपके चुपके परेशान कर रही हैं। महारथी इस बात को मानने लगे हैं कि महामारी नस्ल, जाति, धर्म, लिंग, धर्म और देश चुनकर नहीं आती। अनुशासन पसंद जनता घरों में कैद है लेकिन शहर और कस्बे प्रदूषण की गिरफ्तारी से बाहर निकल रहे हैं। इंसानी सांस की रवानगी बेहतर हो गई है। कोरोना के कारण ही कुदरत के असली प्रतिनिधियों ने फिर से इस खूबसूरत दुनिया पर अपना हक जमाना शुरू कर दिया है। 

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कुदरत की नेमतों को आबाद करने के लिए कोरोना उपजाऊ खाद हो गया है। जिस पानी में इंसान, मशीनों की भीड़ और आदतों के कारण डॉलफिन आते डरती थी अब सहर्ष विचर रही हैं। सड़कों पर मोर घूम रहे हैं, चिड़ियाँ और तितलियाँ फुदक रही हैं। नहरों के खूबसूरत शहर वेनिस की नहरें गंडोला रहित होने से खुश दिख रही हैं। सैंकड़ों जगह नाइट्रोजन का स्तर गिर रहा है और ओज़ोन की परत का नुक्सान कम हो रहा है। हमारी गंगामां भी कुछ राहत महसूस कर रही होंगी। विकासजी अपनी अति अंधी गति बारे ज़रूर सोच तो रहे होंगे। राजनीति अस्थायी रूप से उदास हो चली है। क्या यह सब सचमुच हो रहा है। लगता है आपका आना व्यर्थ नहीं जाएगा। कोरोना, मेरा शुक्रिया कबूल करो ना।

- संतोष उत्सुक

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