मुफ्त की रेवड़ियाँ (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा 'उरतृप्त' | Aug 17, 2022

आदमी जब मुफ्तभोगी बन जाता है तब कामचोर बनना उसकी आदत बन जाती है। मुफ्त में फिनायल मिल जाए तो पीने वालों की यहाँ कमी थोड़े न है। बस पिलाने वाला मिल जाना चाहिए। और बात जब रेवड़ी की हो तो कहना ही क्या। वह भी मुफ्त की हो तो पूछिए ही मत।

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दूसरे मुफ्तभोगी नेता ने कहा- चल-चल! बड़ा आया मुफ्तभोगियों की सेवा करने वाला। हमारी योजना के आगे तुम्हारी योजना किसी काम की नहीं। हमारी जोड़तोड़ पार्टी घर गृहस्थी की सामग्री के साथ-साथ माँस, शराब, सिगरेट-बीड़ी-गुटका आदि का भी प्रबंध करेगी। तब देखना सभी हमीं को वोट देंगे। 

तीसरे मुफ्तभोगी नेता ने कहा- हमारी योजना के आगे तुम्हारी योजना पानी न माँगे। हमारी नाकरगड़ू पार्टी इन सभी रेवड़ियों के साथ-साथ अपने दो-चार आदमी उन्हीं के घर छोड़ आयेगी। ये लो घर का सारा काम जैसे झाड़ू-पोंछा लगाना, रसोई बनाना, घर के लोगों के खाना खाने के बाद उनका मुँह साफ करना। हाथ धुलाना। पखाना साफ करना, उनके सोकर उठने तक हाथ-पैर दबाना जैसे सभी काम करेगी। अब बताओ किसकी पार्टी जीतेगी? बड़े चले थे हमसे टक्कर लेने।

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इन सबकी मुफ्त की रेवड़ियों के बारे में सुन जनता बड़ी बेसब्री से इनका इंतजार कर रही है। कब चुनाव हो कब वे जीते। एक बार जीत जाएँ तो मरने तक घर से बाहर निकलने तक की फुर्सत।

- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा 'उरतृप्त'

(हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

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