मोटापे के आयोजक (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Apr 22, 2022

जंकफूड से लगाव की नीति, खाने वालों की नीयत बदलती नहीं तभी तो, माल्स ही नहीं बहुत दुकानों पर मोटे या मोटे हो रहे शरीरों के लिए प्लस साइज़ के सभी तरह के कपडे उपलब्ध हैं। एक समय की बात है किसी ज़माने में मोटापे को बुरा मानते हुए कई बीमारियों का मकान माना जाता था। अब तो सामयिक सत्य लागू है कि, ज़िंदगी न मिलेगी दोबारा, इसलिए खाओ तन और मन विचारा। हमारे यहां तो पैदा होते ही वर्जित वस्तुओं की दीवार चिन दी जाती है, यह नहीं खाना, वह नहीं पीना। इस जगह नहीं जाना, वहां नहीं जाना। अब वर्जनाएं भी मानने लग गई हैं कि आनंद और मनोरंजन युग में ऐसा नहीं करते। यह खबर दिलचस्प है कि मोटापे से रीतिनीति आयोग भी  चिंतित हो गया है। कहीं यह विचार वर्जनाओं की दीवार गिराने का आयोजन तो नहीं। उन्होंने चिंता जताकर या दिखाकर मोटापा हटवाने का बढ़िया तरीका निकाला है।

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गांवों की गलियों में मोमो, पिज्ज़ा, स्प्रिंग रोल व् अन्य खाने परोसे जा रहे हैं उन्हें कौन खाया करेगा। पैदल चलने की ज़रूरत व आदत की ह्त्या कब की हो चुकी है। गोली खाकर मोटापा कम करने की कोशिश अभी भी जवां है। इस तरह का खाना पीना हमारी भारतीय उत्सव संस्कृति का प्राथमिक हिस्सा हो चुकी है। क्या सिर्फ चिंता का भजन गाने से कुछ होगा। चिंता के रंग आकार और प्रकार बढ़ाए जा सकते हैं। लेकिन पुराना घिसा पिटा सच यह भी  है कि चिंता पर होने वाले खर्च की नीयत खराब हो सकती है। किसी भी तरह फैलते जाना मोटापे की नियति और  चरित्र दोनों हैं। अनीति आयोग वाले पता नहीं खेल एवं स्वास्थ्य विभाग का सहयोग क्यूं नहीं ले रहे। यह बात अलग है कि उनके लिए भी यह काम आसान नहीं। वैसे मोटे दिमाग वालों की ज्यादा चिंता करने की ज़रूरत है। वर्ण, जाति, व्यवस्था, संप्रदाय और धर्म के नाम पर ज़बान चलाने वालों की मोटी चमड़ी पतली करने की अति आवश्यकता है।

- संतोष उत्सुक

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