नीली चिड़िया का टिटिम्मा... (व्यंग्य)

By डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ | Jul 28, 2023

चित्रगुप्त जी मरने वालों का हिसाब रखते-रखते बोर हो गए हैं। आजकल वे यमराज से ज्यादा नीली चिड़िया के आगे-पीछे लगे हुए हैं। सुबह से लेकर शाम तक और शाम से लेकर सुबह तक वे नीली चिड़िया से प्यार करते हैं। यह देख यमराज जी उन पर कई बार गुस्सा हुए। उनका इन्क्रिमेंट रोका, वर्क लोड बढ़ाया, लेकिन चित्रगुप्त हैं कि नीली चिड़िया के प्यार में दीवाने हुए पड़े हैं।

इस पर चित्रगुप्त ने कहा, “महाराज! नीली चिड़िया के बारे में आप ठीक से नहीं जानते हैं। हम इंसानों का हिसाब रखते हैं और इंसान हैं कि नीली चिड़िया के बहाने हर चहचहाहट का हिसाब किताब रखते हैं। इसका ट्विटराना मेरे हिसाब-किसाब को भी मात देता है। किसने कब, कहाँ, क्यों और क्या कहा सब पता चल जाता है। एक झटके में दुनिया भर में उसकी चहचहाहट की खुजली का पता चल जाता है। नीली चिड़िया मेरी जैसी भुलक्कड़ नहीं है। सबका कहा बवाल की प्लेट में धरकर खूब मजे लेती है। 

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चित्रगुप्त कुछ कह ही रहे थे कि तभी ट्विटर के एक ट्विट ने फलां देश पर शासन कर रहे सफेदचोलाधारियों का ट्विट टरका दिया। उस ट्विट में आलू से सोना बनाने वाली बात का प्रचार-प्रसार करने वाले अंधे लोग की पोल उस समय खुल गयी जब पता चला कि ऐसी बातें पप्पू नहीं गप्पू ही कर सकता है। लंबी-लंबी फेंकने वाले को नीली चिड़िया धर दबोचती है। उनकी कही पुरानी बातों को आगे ला-लाकर उनके आगे की जिंदगी हराम कर देती है। महंगाई के नाम पर रोने वाले और अपनी कार फूँकने की बात करने वाले अपने ही चहचहाहट में छटपटा के रह जाते हैं। कई तो अपनी चहचहाहट रोकने के नाम पर उसे हटाने की कोशिश करते हैं।     

“ये क्या चित्रगुप्त ! नीली चिड़िया तो बड़े कमाल की है। किंतु मैंने सुना है कि इस पर गन्दी-गन्दी पोस्ट से लेकर नफ़रत फ़ैलाने वाली पोस्ट तक भेजते हैं। मुझे डर है कि कहीं ऐसे चहचहाने वाले हमारे यहाँ आ जायेंगे तो हमारी चहचहाहट कब थरथराहट में बदल जाएगी पता भी नहीं चलेगा।” प्रभु ने भृकुटी चढ़ाते हुए कहा।

''महाराज! बात तो सही है, किंतु जो भी हो नीली चिड़िया का हिसाब-किताब हमसे पक्का है। हम एक बार के लिए भूल सकते हैं, किंतु वह कतई नहीं।''

''तो क्या कहना चाहते हो? तुम्हें रिटायर करके नीली चिड़िया को काम पर लगा दूँ?''

''महाराज! ऐसा मत कहिए। ये तो मेरा पूर्णकालिक काम है। इसी से मेरा घर-बार चलता है। मैं पहले से लोगों के अच्छे-बुरे कामों का हिसाब-किताब रखता आया हूँ। मैं तो नीली चिड़िया के बारे में इसलिए बता रहा था, कि भविष्य में नीली चिड़िया वाला विकल्प बहुत काम आएगा। एकदम पक्का और सही-सही हिसाब का बाप है वो।''

“नहीं नारद नहीं! कतई नहीं। जब तक शरीर में प्राण है तब तक नीली चिड़िया के बारे में नहीं सोचूँगा। मुझे अपनी गद्दी बचाए रखना है तो नीली चिड़िया से बचकर रहना होगा। तुम बहुत अच्छा काम कर रहे हो। मुझे कोई शिकायत नहीं है। मैं तुम्हें हटाकर नीली चिड़िया को काम पर लगाऊँगा तो मेरे पैरों पर मैं खुद कुल्हाड़ी चलाने वाला हो जाऊँगा। इंसान जब पीड़ा में होता है तो सुख खोजता है और जब सुख में होता है तब नीली चिड़िया जैसा टिटिम्मा पालता है। हम इंसान को क्या मारेंगे, वे खुद अपने हाथों मरने के लिए एक से बढ़कर एक बहाने खोज लेते हैं।“

- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’,

(हिंदी अकादमी, मुंबई से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

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