एक नहीं अनेक हैं हम (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Aug 17, 2020

हर नई घटना शोर मचाकर यह साबित करने में जुट जाती है कि हम एक नहीं हैं। वैसे तो यह सामाजिक सचाई है, हम जानते हैं और दिमाग से मानते भी हैं लेकिन दिखाते यही रहते हैं कि हम सब एक हैं। इस सच को हमेशा नकारना चाहते हैं ताकि बुरा न लगे लेकिन परिस्थितियों के बदलते चेहरों ने वक़्त की विशाल दीवार पर सब साफ़ लिख दिया है। दुनिया की बड़ी बड़ी ताकतें मानती हैं कि सफ़ेद और काला, अलग अलग रंग होते हैं। कोरोना समय ने तो उनकी और सबकी पोल खोल दी है। महामारी के ऊंचे पहाड़ पर चढ़ कर सफल प्रबंधन के परचम हिलाने वाले लोग, राजनीतिक पार्टियां, घातक वायरस से घिरे आमजन के इलाज और मौत बारे अलग अलग नजरिया रखते हैं। विज्ञान, विशेषज्ञ, चिकित्सक या सही सुधार और इलाज की बातें उन्हें पसंद नहीं। शासक पार्टियों का नजरिया सदियों से जैसा भी हो लेकिन माना जाता है, ‘बॉस इज ऑलवेज राइट’।

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जिस व्यक्ति के खिलाफ सख्त कारवाई की जा सकती हो, अविलम्ब की जाए ताकि उसे पता चले कि अनुशासन और क़ानून तोड़ने के क्या परिणाम होते हैं। जिसके खिलाफ कुछ नहीं किया जा सकता, अच्छी व्यवहारिक समझ का प्रयोग करते हुए, कुछ न किया जाए बल्कि सामाजिक आयोजन कर उन्हें सफ़ेद गुलाब भेंट किया जाए। इस उचित निर्णय से बहुत लोगों की जान बच सकती है, न्यायिक प्रक्रिया के दर्जनों राष्ट्रीय बरस व धन गर्क होने से बचाया जा सकता है। अलग अलग होने का सच आत्मसात हो जाए तो चैन उगाया जा सकता है और अपना बहुमूल्य समय कविताएं गढ़ कर फेसबुक पर चिपकाने, व्ह्त्सेप पर कहानियां डालने, मनचाहे गीत गाकर फेसबुक को हिलाने, पत्नी को खुश करने के लिए छत पर किचन गार्डन स्थापित करने में प्रयोग किया जा सकता है।

- संतोष उत्सुक

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