Shophian Case सुलझा कर Pakistani साजिश का पर्दाफाश करने वाले Satish Golcha ने संभाली Delhi Police की कमान

By नीरज कुमार दुबे | Aug 22, 2025

1992 बैच के आईपीएस अधिकारी सतीश गोलचा ने आज दिल्ली पुलिस आयुक्त का पदभार संभाल लिया। वह 26वें पुलिस आयुक्त बने हैं। उनका कार्यकाल अप्रैल 2027 तक रहेगा। दिल्ली पुलिस आयुक्त पद पर यह नियुक्ति ऐसे समय हुई है जब राजधानी में सुरक्षा में चूक से जुड़ी कई घटनाएं सामने आई हैं। साथ ही महज 21 दिनों के भीतर ही एसबीके सिंह को हटाकर सतीश गोलचा को यह जिम्मेदारी सौंपा जाना आश्चर्यजनक रहा। हम आपको बता दें कि एसबीके सिंह का कार्यकाल सबसे छोटा रहा और इसमें मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता पर हमला और वीवीआईपी क्षेत्र में चैन झपटमारी जैसी घटनाएं सुर्खियों में रहीं। हालांकि गृह मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि गोलचा की नियुक्ति का सीधा संबंध इन घटनाओं से नहीं है, लेकिन यह बदलाव संकेत देता है कि केंद्र सरकार राजधानी की कानून-व्यवस्था पर अतिरिक्त गंभीरता दिखाना चाहती है।

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सतीश गोलचा की छवि तब बेहद मजबूत हुई थी जब उन्होंने 2009 के शोपियां बलात्कार और हत्या कांड मामले की जांच की थी। हम आपको याद दिला दें कि शुरुआत में इसे सुरक्षा बलों पर गंभीर आरोप की तरह प्रस्तुत किया गया था और घाटी में हिंसक विरोध-प्रदर्शन भड़क उठे थे। उस समय 47 दिनों तक घाटी की शांति बाधित रही थी। लेकिन सीबीआई की 12 सदस्यीय टीम का नेतृत्व करते हुए गोलचा ने कठोर दबाव और राजनीतिक हस्तक्षेप के बावजूद सच को सामने लाने का साहसिक काम किया था। फॉरेंसिक सबूतों से यह साबित हुआ था कि मामला बलात्कार या हत्या का नहीं बल्कि दुर्घटनावश डूबने का था। इस जांच ने न केवल पांच निर्दोष पुलिस अधिकारियों को राहत दी थी बल्कि पाकिस्तान की आईएसआई की साजिश को भी उजागर किया, जो घाटी में अस्थिरता फैलाने के लिए गढ़ी गई थी। यह प्रकरण गोलचा की वैज्ञानिक दृष्टि, निष्पक्षता और साहसिक निर्णय क्षमता का प्रमाण माना जाता है।

हम आपको याद दिला दें कि तीस मई 2009 को शोपियां जिले में एक जलाशय से दो महिलाओं के शव बरामद हुए थे। वे एक दिन पहले परिवार के बगीचे से लापता हुई थीं। शुरुआत में यह दावा किया था कि महिलाओं के साथ बलात्कार कर सुरक्षा बलों ने उन्हें पानी में डूबो दिया। जन आक्रोश इतना बढ़ा कि घाटी में पूरी तरह बंद का माहौल बन गया और पांच पुलिसकर्मी गिरफ्तार कर लिए गए। राज्य की विशेष जांच टीम मामले को सुलझा नहीं कर पाई, जिसके बाद सीबीआई को जांच सौंपी गई। गोलचा के नेतृत्व वाली टीम ने जांच का जिम्मा संभाला। उन्हें एम्स के प्रसिद्ध फॉरेंसिक विशेषज्ञों- डॉ. टीएस डोगरा और डॉ. अनुपमा रैना की भी मदद मिली ताकि जांच पूरी तरह वैज्ञानिक और निष्पक्ष रहे। भारी जनदबाव और राजनीतिक हस्तक्षेप के बावजूद गोलचा की टीम सच्चाई को सामने लायी। निर्णायक मोड़ तब आया जब उन्होंने साहसिक कदम उठाते हुए मजिस्ट्रेट के आदेश से दोनों महिलाओं के शवों को दफनाने के 40 दिन से अधिक समय बाद कब्र से निकलवाया। इसके बाद हुई फॉरेंसिक जांच निर्णायक रही और इसमें साबित हुआ कि महिलाओं के साथ बलात्कार नहीं हुआ था तथा उनकी मौत डूबने से हुई थी।

जांच से यह भी स्पष्ट हुआ कि बलात्कार और हत्या की कहानी पूरी तरह झूठी थी और इसे सुनियोजित तरीके से गढ़ा गया था। निष्कर्ष इस ओर इशारा करते थे कि साजिश पाकिस्तान से रची गई थी और इस मामले को आईएसआई ने अशांति फैलाने और क्षेत्र को अस्थिर बनाए रखने के लिए गढ़ा था। बाद में सीबीआई ने मामले में आरोपपत्र दाखिल किया और कहा कि दोनों महिलाओं की न तो हत्या हुई थी और न ही उनके साथ बलात्कार। उनकी मौत डूबने से हुई थी। सीबीआई की रिपोर्ट के बाद 13 लोगों के खिलाफ सबूत गढ़ने और जानबूझकर जांच को गुमराह करने के आरोप में आरोपपत्र दाखिल किया गया। इनमें डॉक्टर और वकील भी शामिल थे। सीबीआई ने उन पांच पुलिस अधिकारियों को भी निर्दोष पाया, जिन्हें पहले इस मामले में गिरफ्तार कर निलंबित कर दिया गया था।

दिल्ली पुलिस आयुक्त के रूप में गोलचा की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि राजधानी राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्र है। यहाँ कानून-व्यवस्था की चुनौतियाँ आम अपराधों से लेकर दंगे, साइबर क्राइम और आतंकी खतरे तक फैली हुई हैं। इसके अलावा, हाल ही में राजधानी में वीआईपी सुरक्षा और जनसुरक्षा से जुड़े सवालों ने फिर से पुलिस की साख पर प्रश्नचिह्न लगाए हैं। हम आपको बता दें कि सतीश गोलचा के पास सख़्त प्रशासनिक छवि और जटिल मामलों में सटीक निष्कर्ष तक पहुँचने का अनुभव दोनों हैं। यही गुण उन्हें दिल्ली पुलिस के लिए उपयुक्त बनाते हैं।

बहरहाल, सतीश गोलचा की नियुक्ति को दिल्ली पुलिस और देश की सुरक्षा व्यवस्था में नई उम्मीद और नई सख़्ती का संकेत माना जा रहा है। उनका पूर्व अनुभव बताता है कि वह न केवल आपराधिक मामलों में कठोरता दिखाते हैं बल्कि राजनीतिक दबावों से ऊपर उठकर कानून और सच्चाई के पक्ष में खड़े होने का साहस भी रखते हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि वह दिल्ली जैसी बहुआयामी चुनौतियों वाले महानगर की सुरक्षा को किस प्रकार मजबूत और संतुलित बनाते हैं।

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