Savitribai Phule Birth Anniversary: सावित्रीबाई फूले ने महिलाओं के अधिकारों के लिए उठाई थी आवाज, शिक्षा का दिलाया था अधिकार

By अनन्या मिश्रा | Jan 03, 2025

आज ही के दिन यानी की 03 जनवरी को भारत की पहली महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फुले का जन्म हुआ था। यह भारत के नारी मुक्ति आंदोलन की पहली नेता, समाज सुधारक और मराठी कवयित्री भी थी। बता दें कि सावित्री बाई फूले भारत के पहले बालिका विद्यालय की पहली प्रधानाचार्या भी रहीं और पहले किसान स्कूल की संस्थापिका भी थीं। उन्होंने अपना पूरा जीवन एक मिशन की तरह बिताया था। बालिकाओं को शिक्षित करने के लिए सावित्री बाई फूले को काफी विरोध भी झेलना पड़ा था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर सावित्री बाई फूले के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...

महाराष्ट्र के सतारा जिले के एक गांव में 03 जनवरी 1831 को सावित्राबाई फूले का जन्म हुआ था।  इनके पिता का नाम खन्दोजी नैवेसे और माता का नाम लक्ष्मी था। 18वीं सदी में जब महिलाओं का शिक्षा ग्रहण करना पाप समझा जाता था, तब सावित्रीबाई फूले ने वह कर दिखाया जोकि साधारण उपलब्धि नहीं है। बताया जाता है कि जब सावित्री फूले स्कूल जाती थीं, तो उन पर पत्थर फेंके जाते थे, लेकिन फिर भी वह अपने लक्ष्य से नहीं भटकीं और महिलाओं को शिक्षा का अधिकार दिलाने में अहम योगदान दिया।

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लंबे संघर्ष के बाद बदला समाज

18-19वीं सदी में महिलाओं को शिक्षा का अधिकार नहीं था। इस दौरान सिर्फ ऊंची जाति के पुरुष ही शिक्षा लिया करते थे। वहीं सावित्रीबाई भी शादी होने तक स्कूल नहीं गईं। वहीं उनके पति तीसरी कक्षा तक पढ़े थे। शादी के बाद सावित्रीबाई ने अपने पति और समाजसेवी महात्मा ज्योतिबा फुले से शिक्षा ली। फिर पति से प्रेरित होकर उन्होंने महिलाओं के अधिकार, शिक्षा, छुआछूत, सतीप्रथा, बाल विवाह और विधवा विवाह को लेकर समाज में जागरुकता फैलाने का काम किया।

सवित्रीबाई फूले ने अपने पति ज्योतिबा फूले के साथ मिलकर अंधविश्वास और रूढ़िवादी धारणाओं को खत्म करने के लिए लंबा संघर्ष किया। उन्होंने पति के साथ मिलकर लड़कियों के लिए 18 स्कूल खोले। बता दें कि साल 1848 में सावित्रीबाई ने पुणे में देश के पहले बालिका स्कूल की शुरूआत की थी।

प्लेग मरीजों की सेवा

सावित्रीबाई का मराठी साहित्य में भी अहम योगदान रहा है। साल 1890 में पति ज्योतिबाफूले की मृत्यु के बाद उन्होंने अपने पति के अधूरे कामों को पूरा करने का जिम्मा अपने कंधे पर लिया। वहीं उस दौरान सावित्रीबई ने सभी सामाजिक मानदंडों को पीछे छोड़ते हुए अपने पति का अंतिम संस्कार किया और ज्योतिबाफूले की चिता को खुद अग्नि दी। पति की मृत्यु के करीब 7 साल बाद जब साल 1897 में पूरे महाराष्ट्र में प्लेग की बीमारी फैली, तो उन्होंने प्रभावित क्षेत्रों में लोगों की मदद की।

मृत्यु

प्लेग मरीजों की सेवा करते हुए सावित्री बाई फूले खुद भी प्लेग का शिकार हो गईं और 10 मार्च 1897 को सावित्री बाई फूले का निधन हो गया।

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