Menstrual Leave के मुद्दे पर Supreme Court ने दखल देने से कर दिया इंकार, सरकार पर छोड़ा फैसला

By नीरज कुमार दुबे | Mar 13, 2026

देश के सर्वोच्च न्यायालय ने आज उस जनहित याचिका पर सुनवाई से इंकार कर दिया जिसमें महिलाओं और छात्राओं को मासिक धर्म के दौरान अवकाश देने के लिए पूरे देश में एक समान नीति बनाने की मांग की गयी थी। अदालत ने इस विषय पर विस्तृत सुनवाई नहीं की, लेकिन कुछ महत्वपूर्ण कारण बताते हुए कहा कि इस तरह का निर्णय न्यायालय की बजाय नीति बनाने वाले संस्थानों के अधिकार क्षेत्र में आता है।

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सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि यदि किसी संस्था या कंपनी द्वारा स्वेच्छा से ऐसा अवकाश दिया जाता है तो यह स्वागत योग्य है, लेकिन यदि इसे कानून द्वारा अनिवार्य बना दिया गया तो कई नियोक्ता महिलाओं को नौकरी देने से हिचक सकते हैं। अदालत ने कहा कि ऐसा कदम महिलाओं की सहायता करने की बजाय उनके पेशेवर अवसरों को सीमित भी कर सकता है।

पीठ ने यह भी चिंता व्यक्त की कि मासिक धर्म को अवकाश का कानूनी आधार बनाने से महिलाओं के बारे में गलत धारणाएं मजबूत हो सकती हैं। न्यायालय का कहना था कि इससे यह संदेश जा सकता है कि महिलाएं कार्यस्थलों पर कम सक्षम या कम भरोसेमंद हैं। अदालत ने कहा कि इस प्रकार की दलीलें कई बार महिलाओं को कमतर दिखाने की आशंका पैदा करती हैं, जबकि मासिक धर्म एक सामान्य जैविक प्रक्रिया है।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इस प्रकार की नीतियां बनाने का अधिकार सरकार और नीति निर्माताओं के पास है। विभिन्न पक्षों से विचार विमर्श करने के बाद ही ऐसी नीति तैयार की जानी चाहिए। अदालत ने यह भी बताया कि याचिकाकर्ता पहले ही इस संबंध में संबंधित अधिकारियों को एक प्रतिवेदन दे चुके हैं। इसलिए सक्षम प्राधिकारी उस प्रतिवेदन की जांच कर सकता है और आवश्यकता समझे तो परामर्श के बाद कोई नीति बना सकता है। इसी आधार पर न्यायालय ने जनहित याचिका का निस्तारण कर दिया और कोई अतिरिक्त निर्देश देने से परहेज किया।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एमआर शमशाद ने तर्क दिया कि देश के कुछ हिस्सों में पहले से ही मासिक धर्म अवकाश की व्यवस्था लागू है। उन्होंने बताया कि केरल में कुछ शिक्षण संस्थानों ने मासिक धर्म के दौरान छात्राओं को विशेष छूट देने की व्यवस्था की है। इसके अलावा कई निजी कंपनियों ने भी स्वेच्छा से ऐसी नीतियां लागू की हैं। हालांकि न्यायालय ने इन उदाहरणों को स्वीकार करते हुए भी यह कहा कि स्वैच्छिक व्यवस्था को ही प्राथमिकता दी जानी चाहिए। अदालत के अनुसार यदि संस्थान और कंपनियां स्वयं इस दिशा में पहल करती हैं तो यह अधिक व्यावहारिक और संतुलित समाधान हो सकता है।

देखा जाये तो सर्वोच्च न्यायालय के इस रुख के कई महत्वपूर्ण निहितार्थ हैं। अदालत ने यह संकेत दिया है कि सामाजिक और श्रम संबंधी जटिल मुद्दों का समाधान केवल न्यायिक आदेशों से नहीं बल्कि व्यापक नीति निर्माण से होना चाहिए। इससे सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वे महिलाओं की आवश्यकताओं को समझते हुए संतुलित व्यवस्था तैयार करें। साथ ही अदालत ने रोजगार के क्षेत्र में संभावित दुष्परिणामों की ओर ध्यान दिलाया है। यदि अनिवार्य अवकाश कानून बना दिया जाता है तो कुछ नियोक्ता महिलाओं को नियुक्त करने से बच सकते हैं। इससे लैंगिक समानता के लक्ष्य को नुकसान पहुंच सकता है।

इसके अलावा, यह फैसला इस बहस को भी रेखांकित करता है कि महिलाओं के स्वास्थ्य और कार्यस्थल की समानता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाये। मासिक धर्म से जुड़ी समस्याएं वास्तविक हैं, लेकिन नीति बनाते समय यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इससे महिलाओं की पेशेवर छवि कमजोर न हो। कुल मिलाकर देखें तो अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मासिक धर्म अवकाश का मुद्दा महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन इसका समाधान न्यायिक आदेश के बजाय व्यापक सामाजिक और प्रशासनिक संवाद से निकलना चाहिए। अब निगाहें सरकार और नीति निर्माताओं पर रहेंगी कि वे इस विषय पर आगे क्या कदम उठाते हैं।

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