शुभ कामनाओं का मौसम (व्यंग्य)

By संतोष उत्सुक | Jan 10, 2025

नए साल में, नए संकल्प लेने बारे कई लेख पढ़े लेकिन प्रेरित नहीं हो पाया। पिछले कई सालों में जितने संकल्प लिए कुछ दिन बाद सब उदास जो हो गए थे। अब हाल यह है कि याद भी नहीं कि कौन कौन से संकल्प लिए थे। इस बार भी अस्त व्यस्त ज़िंदगी के कारण कोई नया संकल्प लेने की हिम्मत नहीं हुई। असली बात यह है कि जब से सेवानिवृत हुआ हूं संकल्प शब्द ही काफी भारी लगने लगा है। जब नौकरी में था तो बॉस कई तरह के दबाव डालकर अपने संकल्प भी मुझ पर डाल दिया करता थे। लेकिन कहने के लिए अब वक़्त बदल चुका है वरना अब तो चाय बनाते समय अदरक का छोटा सा टुकड़ा भी पत्नी से पूछ कर डालता हूं। संबध सुधारने के वार्षिक कार्यक्रम के अंतर्गत खूब सारे लोगों को नए साल की शुभ कामनाएं वह्ट्सएप के माध्यम से भेजी। इधर मुझे भी नए साल में दूसरों की कामनाएं मिली जिनसे एक बारगी तो अभिभूत सा हो गया था लेकिन जैसे जैसे जनवरी का महीना जा रहा है और फरवरी आने को बेकरार होने लगी है, सब पुराना उदास सा लगने लगा है।

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ज़िंदगी की असलीयत कितनी चमकदार होती है, उसके सामने हर शब्द फीका पड़ जाता है। कितनी बार समृद्धि अस्वस्थता से हार जाती है और कामना सिर्फ बात बन कर रह जाती है। किसी ने सच कहा है ज़िंदगी लम्बी नहीं बल्कि बड़ी होनी चाहिए लेकिन प्रसन्नता और आनंद किस चिड़िया का नाम है यही खोजना मुश्किल है। सब कुछ नया हो गया तो पुराने का क्या करेंगे। अधिक संचार ने सुख, शान्ति सुरक्षा का बेस्वाद अचार डाल दिया। यश कमाना अब जुगाड़ हो गया और सक्रियता कुरूप होने लगी है। पहेलियां अनसुलझी रहें तो दिलचस्प रहेंगी। सोना इतना महंगा हो गया है कि प्राकृतिक फूल दोबारा अच्छे लगने लगे हैं।  समय साथ नहीं देता समय के साथ चलना पड़ता है। ऐसा कभी नहीं होगा कि सभी इच्छाएं पूरी हो जाएं और कोई ख़्वाब अधूरा न रहे।

बातें हैं बातों का क्या। मीठी मीठी बातें करने में किसी का क्या जाता है।

- संतोष उत्सुक

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