कश्मीर के बदलते रंग, टूटी अलगाववाद की कमर, हुर्रियत का कम हुआ प्रभाव, गिलानी का उत्तराधिकारी तक नहीं मिल रहा

By अभिनय आकाश | Aug 02, 2020

हमारे देश में कुछ लोग ऐसे हैं जिनके दिल में भारत के लिए नफरत का अंधेरा है और पाकिस्तान के लिए प्यार की मोमब्बतियां। ऐसी ही देशद्रोही सोच रखने वाले लोगों में से हैं जम्मू कश्मीर के अलगाववादी नेता और उन जैसे लोगों की नुमाइंदगी वाली हुर्रियत कॉन्फ्रेंस। आखिर ये हुर्रियत कॉन्फ्रेंस क्या है? इसका मकसद क्या है और इसकी शुरुआत कब हुई थी? इसके बारे में तो इस विश्लेषण में बात करेंगे ही इसके साथ ही आपको बताएंगे कि कैसे फारूक अहमद दार ऊर्फ बिट्टा कराटे, नईम खान, अल्ताफ फनटूश और अन्य अलगाववादी और हुर्रियत नेताओं की आतंक, पत्थर फेंकने वालों, स्कूल जलाने वालों, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने वालों के खिलाफ बीते कुछ बरस में एक-एक कर कार्रवाई की गई और हुर्रियत के नेटवर्क को नेस्तनाबूद किया गया। नौबत ये आ गई कि सैयद अली शाह गिलानी ने एक महीने पहले हुर्रियत से इस्तीफा दे दिया था। उनके इस्तीफे के समय कहा जा रहा था कि अगले दो तीन दिनों में ही उनके उत्तराधिकारी की नियुक्ति हो जाएगी, लेकिन अब तक कोई सामने नहीं आया है। 

एनआईए के शिकंजे से हुई शुरुआत

अगस्त- सितबंर 2017 में फारूक अहमद दार ऊर्फ बिट्टा कराटे, नईम खान, अल्ताफ फनटूश जैसे अलगाववादियों की गिरफ्तारी के वक्त सरकार ने यह जता दिया था कि अब कश्मीर घाटी में आतंक को जो समर्थन मिलता रहा उसकी जड़ काटने के प्रयास में लग गई। यह अपने आप में अलगाववादियों के खिलाफ उठाया गया पहला महत्वपूर्ण कदम था। जम्मू कश्मीर में पिछले साल 5 अगस्त से पहले ही अलगाववादी राजनीति कमजोर होना शुरू हो गई थी। जनता के सामने उनके आंतरिक कलह की खबरें सामने आने लगी थीं। भाजपा सरकार ने एनआईए के जरिए अलगाववादियों के खिलाफ कार्रवाई की और गिलानी और मीरवाइज उमर फारूक के हुर्रियत कांफ्रेंस के दोनों धड़ों को करारा झटका दिया। 12 जुलाई को, गिलानी के बाद सबसे सीनियर अलगाववादी नेता मुहम्मद अशरफ सेहरी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। गिलानी ज्वाइंट रेजिस्टेंस फोरम(जेआरएफ) का हिस्सा थे, जिसमें यासीन मलिक और मीरवाइज उमर फारूक भी थे। यासीन पिछले साल अप्रैल से एनआईए की हिरासत में हैं। वे1990 में एक इंडियन एयरफोर्स अधिकारी की हत्या के मुकदमे का भी सामना कर रहे हैं। मीरवाइज भी ज्यादातर नेताओं की तरह पिछले साल अगस्त से ही खामोश हैं।

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क्या है हुर्रियत कॉन्फ्रेंस 

हुर्रियत कॉन्फ्रेंस एक ऐसा संगठन है जो कि जम्मू कश्मीर में अलगाववाद की विचारधारा को प्रोत्साहित करती है। साल 1987 में नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस ने गठबंधन कर चुनाव लड़ने का ऐलान किया। घाटी में इसके खिलाफ जमकर विरोध हुआ। इस चुनाव में भारी बहुमत से जीतकर फारुख अब्दुल्ला ने जम्मू कश्मीर में अपनी सरकार बनाई। इसके विरोध में खड़ी हुई विरोधी पार्टियों की मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट को महज 4 सीटों पर संतोष करना पड़ा जबकि जम्मू और कश्मीर नेशनल कांफ्रेंस को 40 और कांग्रेस को 26 सीटें मिलीं। इसके ही विरोध में घाटी में 13 जुलाई 1993 को ऑल पार्टीज हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की नींव रखी गई। हुर्रियत कांफ्रेंस का काम पूरी घाटी में अलगाववादी आंदोलन को गति प्रदान करना था। यह एक तरह से घाटी में नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस के विरोध स्वरूप एकत्रित हुई छोटी पार्टियों का महागठबंधन था। हुर्रियत कॉन्फ्रेंस स्थापना के बाद कई बार टूट भी चुकी है। साल 2003 में इनमें बिखराव की शुरूआत हुई। जब भारत सरकार से बातचीत के मुद्दे पर सैय्यद अली शाह गिलानी और मीरवाइज अलग हो गए। हुर्रियत कॉन्फ्रेंस में 23 अलग-अलग धड़े हैं। इसके बड़े नेताओं में मीरवाइज उमर फारूक, सैयद अली शाह गिलानी, मुहम्मद यासीन मलिक प्रमुख चेहरे हैं। लेकिन ये वो लोग हैं जो अपनी जरूरत और सुविधा के मुताबिक नागरिकता चुनते हैं और देश का माहौल खराब करने में अपनी सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं। 

गिलानी का इस्तीफा

इसी वर्ष 29 जून को जम्मू-कश्मीर के वरिष्ठ अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी ने ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस (एपीएचसी) से इस्तीफा देने का ऐलान किया। जारी किए गए एक ऑडियो संदेश में गिलानी ने कहा, ‘हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की मौजूदा स्थिति को देखते हुए, ‘मैं इस फोरम से अपने को अलग करने की घोषणा कर रहा हूं। इस परिप्रेक्ष्य में मैंने इस फोरम से संबंधित सभी धड़ों को विस्तृत पत्र भेज दिया है। अलगवावादियों में गिलानी का कद इतना बड़ा था कि उनके जाने के बाद एक बड़ा पॉवर वैक्यूम पैदा हो गया है। नौबत ये है कि गिलानी को हुर्रियत से इस्तीफा दिए एक महीने से ज्यादा का वक्त हो गया लेकिन अभी तक उनके उत्तराधिकारी के रूप में किसी कोई नाम सामने नहीं आया। हुर्रियत का उदारवादी गुट भी चुप है। दोनों गुटों में एकता बघारने वाले घाटी के कुछ खास बुद्धिजीवियों की बोलती बंद है। 

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