By नीरज कुमार दुबे | Oct 02, 2026
कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर की भारत में बढ़ती सक्रियता पर सवाल उठाते हुए कहा है कि गोर का आचरण अब ऐसा दृश्य पैदा कर रहा है, मानो औपनिवेशिक दौर का कोई वायसराय संवेदनशील इलाकों का दौरा कर रहा हो, स्थानीय मुद्दों में खुद को शामिल कर रहा हो और अधिकार-बोध के साथ कूटनीतिक गतिविधियों का संचालन कर रहा हो। यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब गोर के दौरे दिल्ली की राजनयिक सीमाओं से निकलकर कश्मीर, लद्दाख, पूर्वोत्तर, पंजाब और विभिन्न राज्यों के राजनीतिक गलियारों तक पहुंच चुके हैं।
सवाल सिर्फ अमृतसर का नहीं है। अगस्त में सर्जियो गोर श्रीनगर पहुंचे और मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से मुलाकात के बाद उन्होंने जम्मू-कश्मीर को ‘भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा’ बताया। यह 2019 के बाद किसी कार्यरत वरिष्ठ अमेरिकी राजनयिक की पहली कश्मीर यात्रा थी। उनके बयान पर पाकिस्तान ने आपत्ति दर्ज कराई और अमेरिकी राजनयिक को तलब किया। इसके बाद गोर लद्दाख भी गए, जहां उन्होंने जांस्कर क्षेत्र में रिवर राफ्टिंग की। लद्दाख की यात्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण थी क्योंकि यह चीन के साथ सैन्य तनाव वाले संवेदनशील क्षेत्र से जुड़ा है।
इसके बाद गोर का पूर्वोत्तर दौरा भी चर्चा में आया। उन्होंने दार्जिलिंग में राज्यसभा सांसद और पूर्व विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला के साथ समय बिताया और फिर मणिपुर पहुंचे। मणिपुर में उन्होंने राज्यपाल अजय कुमार भल्ला और मुख्यमंत्री युमनाम खेमचंद सिंह से मुलाकात की तथा ऐतिहासिक कंगला किले और ईमा कैथेल का दौरा किया। मुख्यमंत्री ने उन्हें आगामी संगाई महोत्सव में आने का निमंत्रण भी दिया। यह दौरा ऐसे समय हुआ जब मणिपुर लंबे समय से जातीय संघर्ष की परिस्थितियों से गुजर रहा है।
गोर की गतिविधियों का एक दूसरा पहलू राज्यों के राजनीतिक नेतृत्व से उनकी लगातार सीधी बातचीत है। केरल, कर्नाटक और तेलंगाना के मुख्यमंत्रियों से उनकी मुलाकातों में निवेश, व्यापार, वीजा और आर्थिक सहयोग जैसे मुद्दे उठे। तमिलनाडु में उन्होंने मुख्यमंत्री और राजनीतिक दल के प्रमुख सी. जोसेफ विजय से उनके जन्मदिन पर मुलाकात की और आर्थिक सहयोग की चर्चा की। इसी दौरान गोर की उस सार्वजनिक टिप्पणी पर विवाद हुआ जिसमें उन्होंने भारत और तमिलनाडु को ‘हमारे दो राष्ट्र’ कहा। बाद में इस शब्दावली पर राजनीतिक नेताओं ने सवाल उठाए और इसे अनुचित बताया।
बेंगलुरु में भी गोर कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के साथ अमेरिकी स्वतंत्रता की 250वीं वर्षगांठ के कार्यक्रम में शामिल हुए। यानी उनकी भूमिका केवल पारंपरिक राजनयिक मुलाकातों तक सीमित दिखाई नहीं दे रही; राज्यों के राजनीतिक नेतृत्व, कारोबारी समुदाय और सार्वजनिक कार्यक्रमों तक उनकी प्रत्यक्ष मौजूदगी लगातार दिखाई दे रही है।
हम आपको यह भी बता दें कि वरिष्ठ पत्रकार प्रभु चावला ने द न्यू इंडियन एक्सप्रेस में अपने एक लेख के माध्यम से गोर की गतिविधियों पर कई सवाल उठाये थे। उनके लेख ने गोर की गतिविधियों को भारत के राजनीतिक, सैन्य और कारोबारी प्रतिष्ठान तक असाधारण पहुंच के नजरिए से देखा और विशेष रूप से चंडीगढ़ स्थित पश्चिमी कमान की उनकी यात्रा पर सवाल उठाए थे। हम आपको याद दिला दें कि सर्जियो गोर ने अमेरिकी भारत-प्रशांत कमान के प्रमुख एडमिरल सैमुअल पापारो के साथ पश्चिमी कमान का दौरा किया था, जहां अभियानगत तैयारी, पश्चिमी मोर्चे की रणनीतिक परिस्थितियों और ऑपरेशन सिंदूर से जुड़े विषयों पर जानकारी दी गई। इस यात्रा पर विपक्षी नेताओं ने भी सवाल उठाए थे।
देखा जाये तो अमेरिका इन यात्राओं को व्यापार, निवेश, सुरक्षा और भारत-अमेरिका संबंधों को मजबूत करने वाली सामान्य राजनयिक गतिविधि बता सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सर्जियो गोर की सक्रियता अब सामान्य कूटनीति की सीमा से आगे बढ़ती दिखाई दे रही है? कश्मीर से लद्दाख, मणिपुर से दार्जिलिंग और अब अमृतसर तक उनकी लगातार मौजूदगी, वह भी ऐसे इलाकों में जहां राजनीतिक और सुरक्षा संवेदनशीलता बेहद ज्यादा है, कई सवाल खड़े करती है। खासकर तब, जब उनकी मुलाकातें राज्यों के राजनीतिक नेतृत्व से लेकर विवादित और संवेदनशील मुद्दों तक पहुंच रही हों।
बहरहाल, अभिषेक मनु सिंघवी की ‘वायसराय’ वाली टिप्पणी को महज राजनीतिक बयान कहकर टाल देना आसान है, लेकिन सर्जियो गोर की बढ़ती सक्रियता यह सवाल जरूर खड़ा करती है कि आखिर एक विदेशी राजदूत की भूमिका की सीमा कहां तक होनी चाहिए?
-नीरज कुमार दुबे