By नीरज कुमार दुबे | May 06, 2026
तमिलनाडु की राजनीति में आज एक बड़ा और चौंकाने वाला मोड़ देखने को मिला, जब कांग्रेस ने विजय की तमिलगा वेत्री कड़गम यानि टीवीके को सरकार गठन के लिए समर्थन देने की घोषणा कर दी। इस फैसले के साथ ही द्रविड़ मुनेत्र कषगम यानि द्रमुक और कांग्रेस के बीच दो दशक से अधिक पुराने राजनीतिक रिश्ते पर लगभग विराम लग गया है। कांग्रेस ने साफ किया है कि उसका यह गठबंधन केवल सरकार गठन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि स्थानीय निकाय, लोकसभा और राज्यसभा चुनावों तक जारी रहेगा।
कांग्रेस ने अपने समर्थन के साथ एक महत्वपूर्ण शर्त भी रखी है। पार्टी ने कहा है कि टीवीके किसी भी परिस्थिति में भाजपा या उसके सहयोगी दलों को सरकार या गठबंधन का हिस्सा नहीं बनाएगी। तमिलनाडु प्रभारी गिरीश चोडानकर ने कहा कि कांग्रेस धर्मनिरपेक्ष, प्रगतिशील और संवैधानिक मूल्यों वाली राजनीति के साथ खड़ी है और जनता के जनादेश का सम्मान करना उसका कर्तव्य है।
उधर, कांग्रेस के इस फैसले ने द्रमुक को गहरा राजनीतिक झटका दिया है। द्रमुक नेताओं ने इसे ‘‘पीठ में छूरा घोंपना’’ बताया है। यह नाराजगी इसलिए भी अधिक है क्योंकि द्रमुक और कांग्रेस का रिश्ता केवल चुनावी समझौता नहीं बल्कि लंबे समय की राजनीतिक साझेदारी माना जाता रहा है। दोनों दल पहली बार 1971 में साथ आए थे और बाद में 2004 से 2013 तक द्रमुक केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार का अहम हिस्सा रही थी। 2016 के बाद दोनों ने फिर मिलकर चुनाव लड़े और राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा विरोधी राजनीति की मजबूत धुरी बने।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस का यह कदम केवल तमिलनाडु तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर राष्ट्रीय राजनीति और विपक्षी गठबंधन इंडिया पर भी पड़ेगा। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब कांग्रेस और द्रमुक तमिलनाडु में आमने सामने होंगे, तब क्या वह राष्ट्रीय स्तर पर एक मंच पर बने रह पाएंगे। कांग्रेस यह तर्क दे रही है कि वाम दलों और तृणमूल कांग्रेस की तरह अलग अलग राज्यों में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बावजूद इंडिया गठबंधन जारी रह सकता है। लेकिन द्रमुक की नाराजगी और कांग्रेस के नए रुख ने विपक्षी एकता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
इस घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक लाभ विजय और उनकी पार्टी टीवीके को मिलता दिखाई दे रहा है। पहली बार चुनाव लड़कर सबसे बड़ी पार्टी बनना और उसके तुरंत बाद कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दल का समर्थन हासिल करना विजय को राज्य की राजनीति में एक मजबूत विकल्प के रूप में स्थापित करता है। यही कारण है कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने चेन्नई स्थित सत्यमूर्ति भवन में जश्न मनाया और इसे नई राजनीतिक शुरुआत बताया।
विजय ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी से बात कर उन्हें शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित भी किया है। इससे यह संकेत मिलता है कि दोनों दल भविष्य में स्थायी राजनीतिक साझेदारी की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। कांग्रेस नेता प्रवीण चक्रवर्ती ने बताया कि विजय ने राहुल गांधी और खरगे को फोन कर समर्थन के लिए धन्यवाद दिया। हालांकि सरकार गठन का रास्ता अभी पूरी तरह साफ नहीं है। कांग्रेस के समर्थन के बाद भी टीवीके बहुमत से पांच सीट दूर है। ऐसे में नजर अब अन्नाद्रमुक पर टिकी है, जिसके पास 47 विधायक हैं। यदि अन्नाद्रमुक किसी रूप में समर्थन देती है, तो विजय आसानी से बहुमत हासिल कर सकते हैं। लेकिन यही वह स्थिति है जिसने कांग्रेस को असहज कर रखा है, क्योंकि उसने स्पष्ट कहा है कि भाजपा या उसके सहयोगियों की भागीदारी स्वीकार नहीं होगी। ऐसे में देखना होगा कि क्या अन्नाद्रमुक में विभाजन होता है या फिर अन्नाद्रमुक भाजपा का साथ छोड़कर विजय के साथ आ जाती है।
देखा जाये तो तमिलनाडु की राजनीति का इतिहास भी बताता है कि यहां गठबंधन स्थायी नहीं रहे हैं। कभी कांग्रेस और द्रमुक साथ रहे, फिर कांग्रेस अन्नाद्रमुक के साथ चली गई। 1999 में द्रमुक ने भाजपा के साथ हाथ मिलाया, जबकि 2004 में वह फिर कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन में लौट आई। इस बार भी सत्ता समीकरण ने पुराने रिश्तों को बदल दिया है। राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो कांग्रेस का यह फैसला व्यावहारिक राजनीति का उदाहरण माना जा रहा है। पार्टी को यह एहसास हो गया था कि द्रमुक के साथ रहते हुए उसकी भूमिका सीमित होती जा रही थी। वहीं टीवीके के साथ आने से उसे भविष्य में अधिक सीटें और सत्ता में भागीदारी मिलने की संभावना दिखाई दे रही है। दूसरी ओर द्रमुक के लिए यह संकट का समय है, क्योंकि उसका सबसे पुराना सहयोगी अब उसके विरोधी खेमे में खड़ा दिखाई दे रहा है।
आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या इंडिया गठबंधन इस राजनीतिक झटके को संभाल पाता है या फिर राज्यों में बदलते समीकरण राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता को कमजोर कर देंगे। फिलहाल इतना तय है कि तमिलनाडु की राजनीति में विजय का उदय और कांग्रेस का नया दांव देश की राजनीति में एक नए दौर की शुरुआत का संकेत दे रहा है।
-नीरज कुमार दुबे