कृष्ण एकादशी के दिन तिल का प्रयोग होता है फलदायी

By प्रज्ञा पाण्डेय | Feb 06, 2021

हिंदू धर्म में पवित्र माघ महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी को कृष्ण एकादशी कहा जाता है। इसे षटतिला एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। यह व्रत भगवान विष्णु के प्रति समपर्ण भाव को प्रदर्शित करता है तो आइए हम आपको कृष्ण एकादशी के महत्व एवं व्रत की विधि के बारे में बताते हैं।

हिंदू धर्म में एकादशी का व्रत महत्वपूर्ण होता है। हर साल चौबीस एकादशी व्रत होते हैं। जब अधिकमास या मलमास आता है तब इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। इस एकादशी को षटतिला एकादशी भी कहा जाता है। इस दिन तिल का छः प्रकार से प्रयोग किया जाता है। साथ ही कृष्ण एकादशी के दिन भगवान विष्णु की तिल से पूजा की जाती है जिससे समस्त प्रकार के सुख, भोग और मोक्ष प्राप्त होते हैं। 

कृष्ण एकादशी से जुड़ी व्रत कथा 

हिंदू धार्मिक ग्रंथों में कृष्ण एकादशी से जुड़ी एक कथा प्रचलित है। इस कथा के अनुसार एक महिला बहुत धनवान थी। वह गरीब और जरूरतमंदों को बहुत दान करती थी। दान में वह स्त्री हमेशा बहुमूल्य उत्पाद, कपड़े और पैसे बांटती थी लेकिन गरीबों को कभी भी भोजन नहीं देती थी। ऐसी मान्यता है कि दिव्य भोजन का दान करने वाला व्यक्ति महान होता है। यह देखकर भगवान कृष्ण ने उस महिला को इस दान के बारे में अवगत कराने का निर्णय लिया। इसके लिए भगवान श्रीकृष्ण ने भिखारी का रूप धारण किया और महिला के घर पहुंच गए। उस महिला के घर पहुंच कर उन्होंने भीख में भोजन मांगा। उस महिला ने भोजन देने से इंकार कर दिया। लेकिन भिखारी बार-बार खाना मांगता रहा। परिणामस्वरूप, महिला ने भिखारी रूप धारण किए हुए भगवान कृष्ण का अपमान किया। उस स्त्री में भिखारी के कटोरे में मिट्टी की गेंद डाल दी। यह देखकर उस भिखारी ने महिला को धन्यवाद दिया और वहां से निकल गया। जब महिला वापस अपने घर लौटी, तो वह यह देखकर हैरान रह गई कि घर में जो भी खाना था, वह सब मिट्टी में बदल गया। यही नहीं उसने जो कुछ भी खरीदा वह भी मिट्टी में बदल गया। उसके बाद भूख के कारण उसका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। उसने इन सब से दुखी होकर बचने के लिए भगवान से प्रार्थना की। महिला की विनती सुनकर, भगवान कृष्ण उसके सपनों में प्रकट हुए और उन्होंने उस दिन की याद दिलाई जब उसने उस भिखारी को भगा दिया था। भगवान कृष्ण ने उसे समझाया कि इस तरह के काम करने से उसने अपने दुर्भाग्य को आमंत्रित किया और इस कारण ऐसी परिस्थितियां बन रही हैं। उन्होंने उसे कृष्ण एकादशी के दिन गरीबों और जरूरतमंदों को भोजन दान करने की सलाह दी और पूरी निष्ठा के साथ कृष्ण एकादशी का व्रत रखने को भी कहा। महिला ने कृष्ण एकादशी व्रत का पालन किया और साथ ही जरूरतमंद और गरीबों को बहुत सारा भोजन दान किया। इस प्रकार के कर्मों के कारण उस स्त्री ने जीवन में अपना सारा धन, अच्छा स्वास्थ्य और सुख प्राप्त किया।

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कृष्ण एकादशी के दिन इन नियमों का पालन होगा लाभकारी

कृष्ण एकादशी का व्रत विशेष प्रकार का होता है। यह एकादशी भोर से शुरू होकर द्वादशी की सुबह तक संपन्न होता है। व्रत का समापन केवल भगवान विणु की पूजा अनुष्ठान करने के बाद पारण के दौरान द्वादशी के दिन किया जा सकता है। व्रत के दौरान, व्रती भोजन और अनाज का सेवन नहीं करते हैं, लेकिन इस विशेष दिन पर कुछ लोग तिल का सेवन करते हैं। व्रत के दिन भक्त फल और दूध का सेवन करके भी व्रत का पालन कर सकते हैं।

कृष्ण एकादशी के दिन तिल का है खास महत्व 

कृष्ण एकादशी के दिन तिल का बहुत महत्व है। इस दिन व्यक्ति को अपनी दिनचर्या में तिल का इस्तेमाल करना चाहिए। साथ ही तिल का दान भी करना चाहिए। तिल का दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। ऐसी मान्यता है कि अगर इस दिन 6 तरह के तिल का प्रयोग किया जाए तो पापों का नाश होता है और आपको बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है। इस दिन तिल का प्रयोग परम फलदायी होता है। इस दिन आप तिल का इस्तेमाल स्नान, उबटन, आहुति, तर्पण, दान और खाने में अवश्य करें। जो भी व्यक्ति कृष्ण एकादशी का व्रत करता है उसे वाचिक, मानसिक और शारीरिक पापों से मुक्ति मिलती है। कृष्ण एकादशी के दिन काली गाय और तिल के दान का विशेष महत्व है।

कृष्ण एकादशी के दिन ऐसे करें पूजा 

हिन्दू शास्त्रों में कृष्ण एकादशी का खास महत्व होता है। इस दिन आप सबसे पहले प्रातः उठकर व्रत का संकल्प करें। उसके बाद स्नान इत्यादि कार्यों से निवृत्त होकर साफ वस्‍त्र धारण करें। उसके बाद श्री हरि विष्‍णु का स्‍मरण करें और घर के मंदिर में श्री हरि विष्‍णु की मूर्ति या फोटो के सामने दीपक जलाएं। आप भगवान विष्‍णु की प्रतिमा या फोटो को वस्‍त्र पहनाएं। प्रसाद व फलों का भोग लगाएं। कृष्ण एकादशी के दिन काले तिल का दान महत्वपूर्ण होता है। भगवान विष्‍णु को पंचामृत में तिल मिलाकर स्‍नान कराएं। इस व्रत को रखने से भक्त को आरोग्यता प्राप्त होती है और धन-धान्य में वृद्धि होती है। अंत में भगवान को धूप-दीप दिखाकर पूजा-अर्चना कर  आरती उतारें। कृष्ण एकादशी को पूरे दिन निराहार रहें और शाम के समय कथा सुनने के बाद फलाहार करें। साथ ही भक्त रात में जागरण करें।

- प्रज्ञा पाण्डेय

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