सभी के मुरादें पूरी होती है शीतला माता के मंदिर में

By प्रकृति चौधरी | May 30, 2020

शीतला माता मंदिर प्राचीन समय से ही प्रसिद्ध मंदिरों में से माना जाता है। हरियाणा राज्य के गुड़गांव में स्थित शीतला माता का मंदिर कई आस्थाओं का प्रतीक है यह मंदिर 500 साल पुराना है। छोटे बच्चों के मुण्डन के लिए इस मंदिर को अधिक प्रसिद्धता है गुड़गांव में स्थित शीतला माता के मंदिर में बच्चों का मुण्डन करवाने से, उनके जीवन में आने वाले दुःखों से मुक्ति मिल जाती है उनकी मुरादें भी माता पूरी करती है। देश-विदेश से लोग यहां शीतला माता रानी के दर्शन करने आते हैं।

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रोगों से बचाने वाली शीतला माता

शीतला माता को रोगों से बचाने वाली देवी, मसानी, चेचक की माता आदि नामों से भी बुलाते है उनके भक्त। चेचक रोग से संक्रमित कोई रोगी यहां आता है तब उसके हाथों से आटा, चावल, नारियल, गुड़ आदि माता के नाम देने से रोगी बिल्कुल स्वस्थ हो जाता है तथा अपने रोग से भी मुक्ति पा लेता है शीतला माता को स्वच्छता की देवी भी उनके भक्त बुलाते है।

शीतला माता का इतिहास

महाभारत काल मे द्रोणाचार्य यहीं रहा करते थे कौरवों और पांडवों को अस्त्र-शस्त्र की विद्या उन्होंने इसी स्थान पर दी थी, तथा अपने अनेकों शिष्यों को भी अस्त्र-शस्त्र का ज्ञान यहीं दिया था। जब महाभारत काल मे द्रोणाचार्य वीरगति को प्राप्त हुए तब उनकी पत्नी कृपी ने भी उनकी चिता पर ही सती होने का फैसला ले लिया। गांव के लोगो ने उनको बहुत समझाया मगर उन्होंने अपने पति की चिता के साथ ही सती होने का निर्णय ले लिया। 

कृपी ने सती होने से पहले सबको यह कहा कि यदि कोई भी इस स्थान पर विनती करेगा जिस जगह मैं सती धारण कर रही हूं वहां उसकी हर मनोकामना पूरी होगी। तभी से लोग वहां उनके दर्शन करने और अपनी मुरादें लेकर आने लगे, माता उनकी मुरादें भी पूरी करती रही।

17वीं शताब्दी में राजा भरपुर ने गुड़गांव में माता कृपी के स्थान पर मंदिर की स्थापना करना उचित समझा, तथा साथ ही सवा किलो सोने की मूर्ति बनवा दी। इस मूर्ति को शीतला माता का नाम दिया गया, तभी से उनके भक्त उनको शीतला माता के नाम से पुकारने लगे और उनके दर्शन करने दूर-दूर से यहां आने लगे। 

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गांव के लोगो का कहना यह भी है कि मुगल बादशाह ने शीतला माता की मूर्ति को तालाब में बहा दिया था, फिर शीतला माता ने सिंधा भगत को सपने मे दर्शन देकर अपनी मूर्ति बहने की बात बताई, सिंधा माता का भक्त था उन्होंने ही मां की मूर्ति को तालाब से निकाल कर दोबारा विधि-विधान से मंदिर में मूर्ति स्थापित की। जब गांव के लोगों को इस बात की पुष्टि हुई तब से गांववासियों ने भक्त सिंधा भगत को भी पूजना आरम्भ कर दिया।

-प्रकृति चौधरी

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