किस धातु से बने शिवलिंग से मिलता है मनचाहा फल ? शिवलिंग की कैसे करें प्राण प्रतिष्ठा ?

By शुभा दुबे | Mar 10, 2021

शिवलिंग मात्र की पूजा करने से ही पार्वती−परमेश्वर दोनों की पूजा हो जाती है। पौराणिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि लिंग के मूल में ब्रह्मा, मध्य देश में त्रैलोक्यनाथ विष्णु और ऊपर प्राणस्वरूप महादेव स्थित हैं। वेदी महादेवी हैं और लिंग महादेव हैं। अतः एक लिंग की पूजा में सबकी पूजा हो जाती है। शिव पुराण में शिवलिंग की अपार महिमा का संपूर्ण बखान किया गया है। इसमें उल्लेख मिलता है कि सृष्टि के आरम्भ काल से ही समस्त देवता, ऋषि, मुनि, असुर, मनुष्यादि विभिन्न प्रकार के शिवलिंगों की पूजा करते आये हैं। यही नहीं स्कन्दपुराण में तो उल्लेख मिलता है कि शिवलिंग की उपासना से इन्द्र, वरूण, कुबेर, सूर्य, चंद्र आदि का स्वर्ग पर राज रहा और पृथ्वी पर राजाओं का चक्रवर्ती साम्राज्य भी शिवलिंग की पूजा से ही रहा। 

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भारत में अधिकतर पाषाणमय शिवलिंग प्रतिष्ठित और पूजित होते हैं। इन्हें अचल मूर्तियां कहा जाता है। वाणलिंग या सोने−चांदी के छोटे लिंग जंगम कहलाते हैं। इन्हें प्राचीन पाशुपत−सम्प्रदाय एवं लिंगायत−सम्प्रदाय वाले पूजा के व्यवहार में लाने के लिए अपने साथ भी रखते हैं। गरूण पुराण में इसका अच्छा विस्तार है। उसमें से कुछ का संक्षेप में परिचय इस प्रकार है।

विविध द्रव्यों से शिवलिंग बनाकर इस तरह करें मनोकामना को पूर्ण

गन्धलिंग- दो भाग कस्तूरी, चार भाग चंदन और तीन भाग कुंकुम से इसे बनाया जाता है।

पुष्पलिंग- विविध सौरमय फूलों से बनाकर यह पृथ्वी के आधिपत्य लाभ के लिए पूजे जाते हैं।

गोशकृल्लिंग- स्वच्छ कपिल वर्ण की गाय के गोबर से शिवलिंग बनाकर पूजने से ऐश्वर्य मिलता है। अशुद्ध स्थान पर गिरे गोबर का उपयोग वर्जित है।

बालुकामयलिंग- बालू से बनाकर पूजने वाला शिवलिंग विद्याधरत्व और फिर शिवसायुज्य प्राप्त कराता है।

यवगोधूमशालिजलिंग- जौ, गेहूं, चावल के आटे का शिवलिंग बनाकर श्रीपुष्टि और पुत्रलाभ के लिए पूजते हैं।

सिताखण्डमयलिंग- यह शिवलिंग मिस्त्री से बनता है, इसके पूजन से आरोग्य लाभ होता है।

लवणजलिंग- यह शिवलिंग हरताल, त्रिकटु को लवण में मिलाकर बनता है। इससे उत्तम प्रकार का वशीकरण होता है।

तिलपिष्टोत्थलिंग- यह शिवलिंग तिल को पीसकर उसके चूर्ण से बनाया जाता है, यह अभिलाषा सिद्ध करता है।

भस्मयलिंग- यह शिवलिंग सर्वफलप्रद और गुडोत्थलिंग प्रीति बढ़ाने वाला है और शर्करामयलिंग सुखप्रद है।

वंशांकुरमय- बांस के अंकुर से निर्मित लिंग वंशकर है।

पिष्टमय विद्याप्रद और दधिदुग्धोद्भवलिंग कीर्ति, लक्ष्मी और सुख देता है।

धान्यज शिवलिंग धान्यप्रद, फलोत्थ शिवलिंग फलप्रद, धात्रीफलजात शिवलिंग मुक्तिप्रद और नवनीतज शिवलिंग कीर्ति और सौभाग्य देता है।

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दूर्वाकाण्डज शिवलिंग अपमृत्युनाशक, कर्पूरज शिवलिंग मुक्तिप्रद, अयस्कान्तमणिज शिवलिंग सिद्धिप्रद, मौक्तिक शिवलिंग सौभाग्यकर और स्वर्णिनर्मित महामुक्तिप्रद शिवलिंग राजत भूतिवर्धक है।

पित्तलज तथा कांस्यज शिवलिंग मुक्तिद, त्रपुज शिवलिंग, आयस शिवलिंग और सीसकज शिवलिंग शत्रुनाशक होते हैं। अष्टधातुज शिवलिंग सर्वसिद्धप्रद, अष्टलौहजात शिवलिंग कुष्ठनाशक, वैदूर्यज शिवलिंग शत्रुदर्पनाशक और स्फटिकलिंग सर्वकामप्रद हैं।

शिव पूजा के समय यह अवश्य ध्यान रखें कि ताम्र, सीसक, रक्तचंदन, शंख, कांसा, लोहा, इन द्रव्यों के लिंगों की पूजा कलियुग में वर्जित है।

पारे का शिवलिंग महान ऐश्वर्यप्रद माना जाता है।

शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा अवश्य करें

लिंग बनाकर उसका संस्कार करना पड़ता है। इसके लिए स्वर्णपात्र में दूध के अंदर तीन दिनों तक इसे रखकर फिर 'त्र्यम्बकं यजामहे' इत्यादि मंत्रों से स्नान कराकर वेदी पर पार्वतीजी की षोडशोपचार से पूजा करनी चाहिए। फिर पात्र से उठाकर लिंग को तीन दिन गंगाजल में रखना होता है। उसके बाद प्राण प्रतिष्ठा करके स्थापना की जाती है। प्राण प्रतिष्ठा यानि मूर्ति को सजीव करना और स्थापना मतलब कि आपने उन्हें विराजित कर दिया है। अब भगवान को विराजित कर दिया है तो नित्य उन्हें नहलाएं, खिलाएं, उन्हें वस्त्र पहनाएं और उनका पूजन करें।

-शुभा दुबे

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