By नीरज कुमार दुबे | Oct 12, 2026
विपक्षी नेता किसी सरकार पर हमला बोलें तो समझ आता है, लेकिन मध्य प्रदेश में तो राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपनी ही पार्टी की सरकार के मुख्यमंत्री मोहन यादव को घेरकर पूरी भाजपा को सकते में डाल दिया है। हम आपको बता दें कि आदिवासियों के घरों पर बुलडोजर चलाए जाने के मुद्दे पर शिवराज की नाराजगी ने मध्य प्रदेश की सियासत में एक नई बहस छेड़ दी है। सवाल सिर्फ आदिवासी परिवारों के घरों को तोड़े जाने का नहीं है, बल्कि यह भी है कि क्या भारतीय जनता पार्टी के भीतर सत्ता और नेतृत्व को लेकर कोई ऐसी खींचतान चल रही है, जिसकी झलक अब सार्वजनिक रूप से दिखाई देने लगी है? मुख्यमंत्री मोहन यादव और शिवराज सिंह चौहान के बीच कथित मतभेदों की चर्चाओं के बीच इस घटनाक्रम के राजनीतिक मायने तलाशे जा रहे हैं।
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शिवराज सिंह चौहान को इसकी जानकारी मिली तो वह सीधे गांव पहुंच गए। पीड़ित परिवारों से मुलाकात की, उनके साथ धरने पर बैठे और मौके से ही मुख्य सचिव अशोक वर्णवाल तथा भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल से बात की। शिवराज ने प्रभावित परिवारों को नए मकान बनवाने और तब तक रहने-खाने की व्यवस्था कराने का भरोसा दिया। उन्होंने अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि गरीब आदिवासियों के साथ हुआ अन्याय बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
लेकिन शिवराज के बयान का सबसे अहम हिस्सा वह था, जिसमें उन्होंने सवाल उठाया कि जिन लोगों के वोट से भाजपा को जीत मिलती है, उन्हीं के घर क्यों उजाड़े जा रहे हैं? उन्होंने यह आशंका भी जताई कि कुछ अधिकारी मुख्यमंत्री मोहन यादव की छवि खराब करने की साजिश कर रहे हो सकते हैं। यानी शिवराज ने एक तरफ मुख्यमंत्री के प्रति अपनी चिंता जताई, तो दूसरी तरफ उनके अधीन काम करने वाले प्रशासनिक तंत्र को कठघरे में खड़ा कर दिया।
सवाल उठता है कि क्या यह शिवराज बनाम मोहन यादव की लड़ाई है? देखा जाये तो राजनीतिक गलियारों में इस घटनाक्रम को सिर्फ प्रशासनिक कार्रवाई के विरोध तक सीमित करके नहीं देखा जा रहा है। दिसंबर 2023 में शिवराज सिंह चौहान की जगह मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद से ही दोनों नेताओं की राजनीतिक भूमिका और उनके बीच संबंधों को लेकर समय-समय पर चर्चाएं होती रही हैं। शिवराज लंबे समय तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे हैं और बुधनी उनकी पुरानी राजनीतिक कर्मभूमि रही है। ऐसे क्षेत्र में आदिवासी परिवारों के घर उजड़ना और फिर उनका खुद मौके पर पहुंचकर प्रशासन के खिलाफ खड़ा होना, उनकी स्थानीय राजनीतिक पकड़ और जननेता की छवि से भी जुड़ा है। ऐसे में उनकी प्रतिक्रिया को जनहित की चिंता और अपने राजनीतिक प्रभाव को बनाए रखने, दोनों संभावित संदर्भों में भी देखा जा सकता है।
उधर, कांग्रेस ने इस प्रकरण को भाजपा के अंदरूनी मतभेदों से जोड़ते हुए मुख्यमंत्री पर निशाना साधा है। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने आरोप लगाया कि भाजपा की अंदरूनी खींचतान का खामियाजा आदिवासी परिवारों को भुगतना पड़ रहा है। हालांकि, भाजपा के लिए असली चुनौती विपक्ष के आरोपों से ज्यादा इस सवाल का जवाब देना है कि कथित अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई में प्रभावित परिवारों के पुनर्वास, आजीविका और बुनियादी जरूरतों का ध्यान रखा गया या नहीं। अगर केंद्रीय मंत्री को अपनी ही राज्य सरकार के अधिकारियों के खिलाफ सार्वजनिक रूप से हस्तक्षेप करना पड़ रहा है, तो प्रशासनिक समन्वय और जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
वैसे यह पहली बार नहीं है जब शिवराज ने मध्य प्रदेश सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हों। उन्होंने पहले भी आदिवासियों से जुड़े मामलों और मूंग की खरीद के मुद्दे पर हस्तक्षेप किया था। अब निगाहें मुख्यमंत्री मोहन यादव की प्रतिक्रिया और प्रभावित परिवारों को मिलने वाली राहत पर हैं। शिवराज का कहना है कि वह मुख्यमंत्री के सामने पूरा मामला उठाएंगे। यदि दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई होती है और परिवारों का पुनर्वास सुनिश्चित किया जाता है, तो विवाद का प्रशासनिक समाधान निकल सकता है। लेकिन यदि मामला लंबा खिंचता है, तो भाजपा के भीतर समन्वय और नेतृत्व की कार्यशैली पर बहस और तेज हो सकती है। बहरहाल, कोसमी की घटना को शिवराज और मोहन यादव के बीच टकराव कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना स्पष्ट है कि केंद्रीय मंत्री का सार्वजनिक विरोध राज्य सरकार के लिए असहज स्थिति पैदा करता है।
-नीरज कुमार दुबे