युगों पहले कर दी गई थी बद्रीनाथ-जोशीमठ पर चौकाने वाली भविष्यवाणी, क्या सच होने वाला है धार्मिक किताबों का भविष्य

By अनन्या मिश्रा | Feb 21, 2023

हाल ही में उत्तराखंड के जोशीमठ में भूस्खलन के मामले के साथ लोगों की चिंता बढ़ गई है। जोशीमठ में रहने वाले लोगों के सिर से छत हटने के बाद उन्हें सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा रहा है। बता दें कि धार्मिक पुस्तकों में जोशीमठ और बद्रीनाथ के बारे में कई भविष्यवाणी की गई हैं। कई धार्मिक पुस्तकों में की गई भविष्यवाणी के अनुसार, भविष्य में भूकंप, सूखे और जलप्रलय के बाद गंगा के लुप्त होने के साथ ही जोशीमठ में बद्रीनाथ मार्ग बंद होने का जिक्र किया गया है। ऐसे में क्या धार्मिक पुस्तकों में की गई भविष्यवाणी सच होने की राह पर हैं। जोशीमठ के सैकड़ों घरों में दरार आ गई है। आज इस आर्टिकल में हम आपको बताने जा रहे हैं कि जोशीमठ को लेकर क्या भविष्यवाणी की गई हैं और क्या इन भविष्यवाणियों के सच होने का समय आ गया है।

आपको बता दें कि जोशीमठ का पुराना नाम था। जोशीमठ उस दौरान कत्यूरी राजाओं की राजधानी हुआ करती थी। कहते हैं कि जब आदि शंकराचार्य चारों धामों की स्थापना के लिए भ्रमण पर थे तो उन्होंने जोशीमठ में एक शहतूत के पेड़ के नीचे बैठकर तपस्या की थी। इसी स्थान पर उन्हें ज्योतिष ज्ञान प्राप्त हुआ था। इसी के चलते जोशीमठ को ज्योतिषपीठ और ज्योतिर्मठ के नाम से जाना जाता है। शंकराचार्यजी ने यहां भगवान नृसिंह की एक मूर्ति स्थापित की थी। जोशीमठ को भगवान नृसिंह की तपस्थली कहा जाता है। कहा जाता है कि पहले जोशीमठ समुद्र में स्थित था। इसके पर्वत रूप में खड़े होने के बाद भगवान नृसिंह ने इसे अपनी तपस्थली बनाई थी।

रामायण-महाभारत काल से है संबंध

जोशीमठ का संबंध रामायण और महाभारत काल से है। रामायण काल में हनुमानजी काजोशीमठ में आगमन हुआ था। जब मेघनाथ की शक्ति लगने से लक्ष्मणजी मूर्छित हो गए थे। तब संजीवनी बूटी की खोज में हनुमानजी यहां आए थे। जोशीमठ पर हनुमानजी ने रावण द्वारा भेजे गए असुर कालनेमि का वध किया था। कहा जाता है कि जहां पर हनुमान ने असुर को मारा था, वहां की जमीन आज भी लाल दिखती है। इसके अलावा महाभारत काल में हनुमानजी ने जोशीमठ में पांडवों को दर्शन दिए थे। मान्यता है कि पांडव जोशीमठ होकर स्वर्ग यात्रा पर गए थे।

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जोशीमठ के बारे में की गई भविष्यवाणी

जोशीमठ में स्थित नृसिंह मंदिर में भगवान नृसिंह की एक प्राचीन मूर्ति है। इस मूर्ति को लेकर कई तरह की मान्यताएं प्रचलित हैं। बता दें कि नृसिंह भगवान की एक भुजा काफी पतली है, जबकि दूसरी भुजा सामान्य है। धार्मिक पुस्तकों के अनुसार, भगवान नृसिंह का पतला हो रहा हाथ जिस दिन टूट जाएगा। उस दिन से भगवान बद्रीनाथ जाने का रास्ता बंद हो जाएगा। इसके अलावा यह भी कहा जाता है कि जब नर और नारायण पर्वत आपस में मिलकर एक हो जाएंगे। तब बद्रीनाथ नाथ धाम लुप्त हो जाएगा। फिर भक्त भगवान बद्रीनाथ के दर्शन नहीं कर पाएंगे। इसके बाद भक्तों को बद्रीनाथ के दर्शन दर्शन भविष्य बद्री में मिल सकेगा।

भविष्य बद्री तीर्थ

इन पुस्तकों के मुताबिक भविष्य में बद्रीनाथ और केदारनाथ लुप्त हो जाएंगे और भविष्यबद्री नामक नए तीर्थस्थल का उद्गम होगा। बता दें कि चमोली में जोशीमठ के पास सुभैन तपोवन में यह स्थान स्थित है। वर्तमान में बद्रीनाथ और केदारनाथ धाम का मुख्य द्वार जोशीमठ है। जोशीमठ से दोनों तीर्थस्थलों के लिए रास्ता जाता है। वहीं इस तीर्थस्थान की प्राचीनता का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं। स्कंद पुराण में भगवान शंकर ने माता पार्वती से कहा था कि जितना पुराने वह हैं, उतना ही पुराना यह क्षेत्र है। इसी स्थान पर भगवान शंकर ने सृष्टि की रचना के लिए ब्रह्मा के रूप में परम ब्रह्मत्व को प्राप्त किया था। यह भोलेनाथ का आराम स्थान माना जाता है।

हालांकि बद्रीनाथ मंदिर कितना प्राचीन है, इसके बारे में ठीक से जानकारी नहीं है। कहा जाता है कि भगवान विष्णु ने सतयुग में बद्रीनाथ धाम की स्थापना की थी। मान्यता है कि भगवान विष्णु को यह स्थान इतना अधिक पसंद आया कि उन्होंने बाललीला कर भगवान शंकर और माता पार्वती से निवास स्थान ले लिया था। इसे आठवां बैकुंठ भी कहा जाता है। बैकुंठ में भगवान विष्णु 6 महीने निद्रा में और 6 महीने जागते हैं। इसके अलावा यहां से जुड़ी कई कहावतें भी लोगों के बीच में प्रचलित हैं। कहते हैं कि जो आए बदरी ओ न आए ओदरी। इसका अर्थ है कि बद्रीनाथ के दर्शन के बाद दोबारा से गर्भ में आने की जरूरत नहीं पड़ती। उसे जीवन-चक्र से मुक्ति मिल जाती है।

वहीं बद्रीनाथ मंदिर की प्राचीनता के विषय में भी ठीक से जानकारी नहीं है। कहते हैं सतयुग में भगवान विष्णु ने की थी, यहां भगवान विष्णु आराम करते हैं। यह भी मान्यता है कि यह जगह पहले माता पार्वती और भगवान शिव का निवास स्थान था पर भगवान विष्णु को यह इतना पसंद आया कि उन्होंने बाललीला कर दोनों से यह स्थान ले लिया। इसे सृष्टि का आठवां बैकुंठ भी कहते हैं, जहां भगवान छह माह जागते हैं और 6 माह निद्रा में रहते हैं। इसे सबसे प्राचीन स्थान कहा जाता है। चमोली के कर्ण प्रयाग में स्थित इस जगह पर भगवान श्रीहरि विष्णु विराजमान हैं।

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