आध्यात्मिक राष्ट्रीयता के जनक हैं महर्षि अरविन्द घोष

By शिवकुमार शर्मा | Dec 05, 2022

महर्षि अरविंद घोष एक महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी होने के साथ-साथ योगी, दार्शनिक, कवि और प्रकांड विद्वान भी थे। उनके क्रांतिकारी विचार और भाषणों में ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों की कड़ीआलोचना शामिल रहती थी और समाचार पत्र "वंदे मातरम" तो अंग्रेजी शासन के विरुद्ध आग उगलता था। अलीपुर बम कांड में गिरफ्तार किए गए 40 लोगों में श्री अरविंद घोष भी शामिल थे उन्होंने जेल जाने के अच्छे परिणाम को बताते हुए कहा था कि "ब्रिटिश सरकार का कोप भाजन बनकर मैं ईश्वर का अनुग्रह पात्र बन गया जिसके फलस्वरूप मैंने अंतस्थ ईश्वर को प्राप्त कर लिया है।" मातृभूमि के प्रति प्रेम की भावना का उच्च स्तर उनके हृदय में इस प्रकार समाया हुआ था कि उसे वे ईश्वर प्रदत्त प्रेरणा का रूप मानते थे।उनका मानना था कि राष्ट्रवाद उदान्त तथा दैवी शक्ति का प्रतीक है। राष्ट्रीयता एक परमात्मा से उद्भूत धर्म है। राष्ट्रीयता ईश्वर की शक्ति में अमर होकर रहती है और उसका किसी भी शस्त्र से संहार नहीं किया जा सकता है। उनके चिंतन में अतिमानुषी चेतना, वसुधैव कुटुंबकम, सर्वभूत हिताय, राष्ट्रीय एकता और मानव एकता के आदर्श को परस्पर पूरक होने तथा परम सत्ता केआरोहण और अवरोहण से प्रकृति और जगत की उत्पत्ति के विचार और राष्ट्रआत्मा की अवधारणा प्रमुखता से शामिल हैं। श्रीअरविंद "आध्यात्मिक राष्ट्रवाद" अथवा राष्ट्रवादी आध्यात्मिक दर्शन के जनक थे।

कारा कहिन, लाइफडिवाइन, सावित्री, ऐसेजऑन गीता, द फ्यूचर पोएट्री, सिंथेसिस ऑफ योगा, द ह्यूमन साइकिल, द आइडियल ऑफ ह्यूमन यूनिटी, कलेक्टेड पोयम्स एंड प्लेज, द मदर, फाउंडेशन ऑफ इंडियन कल्चर, ए डिफेंस ऑफ इंडियन कल्चर आदि में दृष्टव्य है। 5 दिसम्बर1950 को काया त्याग कर अनन्त यात्रा पर निकल गया। महान क्रांतिकारी,तत्व चिंतक,योगी का पुण्य स्मरण करते हुए कृतज्ञतापूर्वक श्रद्धावनत हैं।

- शिवकुमार शर्मा

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