पहला राउंड सिद्धू भले जीत गये हों लेकिन उन्हें ध्यान रखना चाहिए- फौजी कभी भी पटखनी दे सकता है

By नीरज कुमार दुबे | Jul 20, 2021

पंजाब विधानसभा चुनाव कौन फतेह करेगा यह तो आने वाला समय बतायेगा लेकिन फिलहाल पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष पद की कमान हासिल कर नवजोत सिंह सिद्धू पहले राउंड की लड़ाई तो जीत गये हैं। लेकिन ऐसा नहीं है कि कांग्रेस में आया आंतरिक तूफान शांत हो गया है बल्कि आने वाले दिनों में इस तूफान के राजनीतिक चक्रवात में बदलने की पूरी-पूरी संभावनाएं हैं। इसके संकेत सिद्धू ने दे भी दिये हैं। अध्यक्ष पद सँभालते समय जिस तरह वह मुख्यमंत्री का नाम लेना भूल गये वह संयोगवश नहीं हो सकता। इसके अलावा कांग्रेस आलाकमान ने पंजाब में जिस तरह गांधी परिवार की ताकत दिखाई है वैसा ही कुछ राजस्थान में भी जल्द देखने को मिल सकता है जहाँ सचिन लंबे अर्से से सरकार का पायलट बनने का इंतजार कर रहे हैं।

कबसे है सिद्धू और अमरिंदर में खटास

नवजोत सिंह सिद्धू जब भाजपा में थे तब अमरिंदर उन्हें नेता नहीं कॉमेडियन बताया करते थे। जब सिद्धू भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आ रहे थे तब भी कैप्टन अमरिंदर सिंह सिद्धू को पार्टी में लाए जाने के पक्ष में नहीं थे। लेकिन उस समय भी पार्टी आलाकमान की चली थी और सिद्धू की कांग्रेस में एंट्री हो गयी थी। यही नहीं कांग्रेस में नये नवेले सिद्धू को पार्टी के अधिवेशन में जब बोलने का मौका दिया गया था तो उन्होंने सबके छक्के छुड़ा दिये थे और तबसे वह गांधी परिवार के और नजदीक आ गये। पंजाब में कांग्रेस की सरकार बनने के पहले एक साल में तो सिद्धू व कैप्टन में ठीक-ठाक बनी लेकिन कुछ दिन बाद जब मुख्यमंत्री ने कैबिनेट में फेरबदल के समय सिद्धू का मंत्रालय बदल दिया तो वह नाराज हो गये और मंत्रिमंडल से इस्तीफा देकर मुख्यमंत्री के विरोध में मोर्चा खोल दिया। इस साल की शुरुआत से ही वह लगतार ट्विटर पर अमरिंदर सिंह की सरकार पर सवाल उठाते रहे। इसके जवाब में कैप्टन गुट भी बयानबाजी करने लगा। इसके बाद कांग्रेस हाईकमान को पार्टी में उठ रहे इस असंतोष को शांत करने के लिए कमेटी बनानी पड़ी। इस कमेटी के सामने दोनों गुटों ने अपना-अपना पक्ष रखा लेकिन अमरिंदर कमेटी और सोनिया गांधी के सामने यह साफ कर चुके थे कि सिद्धू को बड़े पद देने का कोई औचित्य नहीं है लेकिन चूँकि प्रियंका गांधी सिद्धू को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद पर बैठाने को अपनी नाक का सवाल बना चुकी थीं इसलिए अमरिंदर सिंह की एक नहीं चली।

अमरिंदर ने पहली बार खाई है इतनी बड़ी मात

अंत समय तक अमरिंदर सिंह कभी सोनिया गांधी को पत्र लिख कर तो कभी अपने धुर विरोधी प्रताप सिंह बाजवा के साथ बैठक कर आलाकमान पर दबाव बनाने की कोशिश करते रहे लेकिन इस पूर्व फौजी की एक नहीं चली और दूसरी ओर सिद्धू चूँकि सोनिया गांधी की हरी झंडी के बाद पंजाब लौटे थे तो उनको पता था कि कितना भी बड़ा विरोध हो, कोई उनको अध्यक्ष बनने से नहीं रोक पायेगा इसीलिए वह पूर्व कांग्रेस अध्यक्षों और वरिष्ठ नेताओं से लगातार मुलाकातें करते रहे और आखिरकार उन्होंने पहले राउंड में अमरिंदर सिंह को हरा दिया। लेकिन सिद्धू को यह नहीं भूलना चाहिए कि फौजी कभी बूढ़ा नहीं होता और उम्र का असर अगर उसके शरीर पर पड़ने भी लग जाये तो भी दुश्मन को पटखनी देने की उसकी क्षमता कभी खत्म नहीं होती। सिद्धू और अमरिंदर में एक बड़ा फर्क यह भी है कि जहां अमरिंदर सिंह भारतीय सेना के फौजी रहे हैं वहीं सिद्धू जब इमरान खान के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने पाकिस्तान गये थे तो उन्होंने भारतीय सेना के कट्टर दुश्मन पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष को गले लगा लिया था। 

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आंतरिक युद्ध कांग्रेस को डुबा सकता है

अभी कांग्रेस की असली लड़ाई तो तब सामने आयेगी जब विधानसभा चुनावों के लिए टिकटों का बँटवारा होगा। अमरिंदर सिंह चाहेंगे कि उनके समर्थकों को ज्यादा से ज्यादा टिकट मिलें जबकि सिद्धू ऐसा होने से रोकने के हरसंभव प्रयास करेंगे। ऐसे में अमरिंदर सिंह के नेतृत्व वाला गुट और किस तरह कांग्रेस आलाकमान पर दबाव बनायेगा यह देखने वाली बात होगी। कहा जा सकता है कि पंजाब में कांग्रेस ने बैठे बिठाये अपनी राह में कांटे बो दिये हैं। हालिया निकाय चुनावों में कांग्रेस को जो शानदार बढ़त मिली थी वह भी अब इस मतभेद की भेंट चढ़ जायेगी। दरअसल कांग्रेस दिल्ली में बैठकर राज्यों में जो नियंत्रण करना चाहती है उसकी बदौलत ही यह सब स्थितियाँ उत्पन्न हो रही हैं। कुछ समय पहले तक बेहद मजबूत नजर आ रही कांग्रेस ने अपनी आपसी सिर फुटव्वल से विपक्ष को अपने खिलाफ बड़ा हथियार थमा दिया है।

-नीरज कुमार दुबे

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