Sikandar of Kashmir | कश्मीर का सम्राट जिसने अरबों को भारत से बाहर भगाया | Matrubhoomi

By अभिनय आकाश | Jan 07, 2025

जम्मू कश्मीर के अनंतनाग में बना मार्तंड मंदिर के बारे में तो आप सभी को पता ही होगा। 8वीं शताब्दी का मार्तंड मंदिर भारत के सूर्य मंदिरों में सबसे पुराना और अमूल्य प्राचीन आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक है। ये एएसआई द्वारा संरक्षित स्मारक है। लेकिन आज इसकी हालत खंडहर जैसी है। लेकिन इस मंदिर से भी ज्यादा दिलचस्प उस राजा की कहानी है जिसने इस मंदिर को बनवाया था। एक ऐसा राजा जिसने दक्षिण से लेकर पूर्वी भारत तक सैन्य अभियान चलाए थे। यहां तक की चीन के भी एक हिस्से को जीत लिया था। इसी कारण इस राजा को एलेंक्जेडर ऑफ कश्मीर की उपाधि भी मिली। सरल भाषा में कहे तो कश्मीर का सिंकदर। हम बात कश्मीर के सबसे शक्तिशाली राजा ललितादित्य मुक्तपीड की कर रहे हैं। ललितादित्य ने अपना राज्य चीन तक कैसे फैलाया। कैसे मार्तंड मंदिर का निर्माण हुआ। मातृभूमि के इस एपिसोड में जानेंगे। 

भारतीय इतिहास में बहुत से शूरवीरों की कहानी आपने सुनी होगी। हमारी भूमि पर बहुत से ऐसे शासक हुए जिन्होंने इतिहास के पन्नों में अपनी गौरव गाथा को अमर कर दिया। फिर चाहे वो सम्राट अशोक हो, चंद्रगुप्त विक्रमादित्य हो या फिर पृथ्वी राज चौहान और महाराणा प्रताप जैसे योद्धा जिनकी कहानी हम बचपन से सुनते औऱ पढ़ते आए हैं। लेकिन इतिहास के कुछ योद्धा ऐसे भी हैं जिनके बारे में बहुत कम ही सुनते को मिलता है। ये कहानी ऐसे सम्राट की है जिसकी कीर्ति केवल भारत में ही नहीं बल्कि पूरे मध्य एशिया में गूंजती थी। ऐसा योद्धा जिसने अखंड भारत के सपने को सच करके दिखाया और भारत पर हो रहे अरबी और तुर्की आक्रमणों को रोक कर रखा। इनके शासनकाल में राज्य की सीमा कश्मीर से लेकर मध्य एशिया तक और उज्बेकिस्तान से होते हुए बंगाल के सुंदरवन तक फैली हुई थी। 

कार्कोटा वंश 

सम्राट ललितादित्य मुक्तपीड के जीवन की जानकारी हमें बहुत से मध्य कालीन क्रानिकल जैसे 12वी सदीं में लिखी गई रजतरंगिनी, शींतांग शू व फतहनामसिंध से मिलती है। ललितादित्य का जन्म कश्मीर के कारकोटा वंश में हुआ। कारकोटा वंश को 625 सीई में दुर्लभवर्धन द्वारा स्थापित किया गया था। दुर्लभवर्धन गोंडिया यानी गोनार्ड वंश के राजा बालादित्य के सेनापति थे। राजा बालादित्य ने इनकी वीरता से प्रसन्न होते हुए अपनी पुत्री अनंतलेखा का विवाह इनसे करवाया था। राजा बालादित्य की मृत्यु के बाद राज्य की बागडोर दुर्लभवर्धन के हाथों में आ गई। तब उन्होंने कार्कोटा वंश की स्थापना की। दुर्लभवर्धन के बाद इनके पुत्र दुर्लभका यानी प्रतापादित्य राजा बने। ललितादित्य राजा प्रतापादित्य और रानी नरेंद्रप्रभा के ही पुत्र थे। इनके दो और भाई ब्रजादित्य और उदयादित्य थे। 724 सीई में ललितादित्य मुक्तपीड राजा बने। उन्होंने 761 सीई तक सफलता पूर्वक राज किया। 

तीनों तरफ से अपने साम्राज्य की सीमा की सुरक्षा सुनिश्चित करने की चुनौती 

प्रारंभ से ही सम्राट ललितादित्य साहस और पराक्रम की मूरत रहे। उनके 37 साल के शासनकाल को कश्मीर का स्वर्ण युग कहा जाता है। जिस समय सम्राट ललितादित्य गद्दी पर बैठे उस वक्त भारत के उत्तरी भाग में तिब्बती बहुत ताकतवर हो चुके थे। कश्मीर पर अपना प्रभाव बढ़ाते जा रहे थे। वहीं पश्चिमी भाग से अरब का आक्रमण शुरू हो गया था। जिन्होंने अब तक सिंध के राजा ताहिर को पराजित कर सिंध पर कब्जा कर लिया था। वहीं दक्षिण की तरफ राजा हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद कन्नौज में के खालीपन सा आ गया था। 725 सीई आते आते कार्कोटा शासन के सामने तीनों तरफ से अपने साम्राज्य की सीमा की सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी हो गया था। हालांकि सम्राट ललितादित्य ऐसी समस्याओं से भयभीत होने वाले नहीं थे। 

तिब्बतियों से जंग की कहानी 

जिस समय ललितादित्य गद्दी पर बैठे उस समय चीन में तांग वंश का शासन था। तिब्बत एक शक्तिशाली राज्य के रूप में अपनी पहचान बना चुका था। कश्मीर और चीन दोनों ही तिब्बत के बढ़ते हुए प्रभाव से परेशान थे। ललितादित्य अरब मुस्लिमों के बढ़ते प्रभाव को भी रोकना चाहते थे। वो जानते थे कि अरब पंजाब औऱ सिंध को जीत कर कश्मीर पर हमला जरूर करेंगे। इस समय कश्मीर एक छोटा राज्य था। इसलिए ललितादित्य ने तिब्बत के खिलाफ चीन का साथ दिया। साथ ही अपना एक दूत राजा तांग के पास भेजा कि कश्मीर के बाद अरब चीन पर भी हमला करेंगे। कश्मीर और चीन ने एक दूसरे से सैन्य समझौता किया। इस तरह से ललितादित्य ने डिप्लोमेसी के तहत तिब्तियों और अरब दोनों के ही खिलाफ चीन से मिलिट्री स्टेथ हासिल कर ली थी। इस रणनीति के तहत ललितादित्य ने अपनी सेना में बड़ी संख्या में चीनी सैनिक और रणनीतिज्ञ भर्ती किए। तांग वंश की मदद से 736 सीई में ललितादित्य ने तिब्बतियों को परास्त कर दिया। ललितादित्य ने अपना शासन अहोम किंगडम और बांग्लादेश तक बढ़ा लिया था। 

अरब को कैसे कराया 

आठवीं सदी के शुरू होते ही अरबों का आक्रमण काबुल घाटी को चुनौती दे रहा था। इसी दौरान सिंध के रास्ते से मुस्लिम शक्तियां उत्तर की ओर बढ़ने का प्रयास कर रही थी। जिस समय काबुल और गांधार का शाही साम्राज्य इन आक्रमणों में व्यस्त था, ललितादित्य के लिए उत्तर दिशा में पांव जमाने का एक सुंदर अवसर था। अपनी विजयी सेना के साथ ललितादित्य, तुर्किस्तान की ओर बढ़े. ललितादित्य के मार्गदर्शन में कश्मीरी सेना ने मध्य एशियाई नगरों पर विजय प्राप्त कर ली। ललितादित्य की सेना की पदचाप अरण्यक यानि आज के ईरान तक पहुंच गई थी। सम्राट ललितादित्य ने कश्मीर पर आक्रमण करने वाले अरब हमलावर मोमिन के विरोध चार युद्ध लड़े और चारों बार उसे हराया। 

मर्तांड सूर्य मंदिर का कराया निर्माण 

ललितादित्य ने मर्तांड सूर्य मंदिर का भी निर्माण किया था। हालांकि, ललितादित्य के समय के बनाए गए कोई भी मंदिर या मूर्ति अब मौजूद नहीं हैं। पर मर्तांड मंदिर के अवशेष आज भी मौजूद है। इस मंदिर के अवशेष को देखकर पता चल जाता है कि ललितादित्य कितने कला प्रेमी रहे होंगे। ऐसा कहा जाता है कि मार्तंड सूर्य मंदिर को सुल्तान सिकंदर शाह मिरी के आदेश पर नष्ट कर दिया गया था 

सम्राट ललितादित्य का क्या हुआ? 

ललितादित्य की मृत्यु को लेकर अलग-अलग कहानियां है। एक सोर्स के अनुसार एक मिलिट्री अभियान के दौरान बर्फ में दबने के कारण उनकी मौत हो गई थी। जबकि एक दूसरी कहानी के अनुसार एक युद्ध में हार के चलते वे अपने मंत्रियों के साथ आग में कूद गए थे।

प्रमुख खबरें

खड़गे परिवार के ट्रस्ट ने हड़पी 100 करोड़ की जमीन? BJP ने लगाए बड़े आरोप, Karnataka में घमासान

Priyank Kharge का Tejasvi Surya पर पलटवार, बोले: पहले Acche Din का White Paper दिखाएं

SP में फूट की गलत जानकारी फैलाने पर Rajiv Rai का OP Rajbhar को लीगल नोटिस

Luka Modric ने रचा इतिहास! 200 इंटरनेशनल मैच खेलने वाले चौथे खिलाड़ी बने, Ronaldo-Messi लिस्ट में शामिल