By अभिनय आकाश | Jul 07, 2026
इतिहास गवाह है कि दुश्मन की घेराबंदी वहीं करनी चाहिए जहां उसे सबसे ज्यादा दर्द हो और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जकार्ता की धरती से चीन की दुखती रथ पर हाथ रख दिया। जब दुनिया की नजरें पीएम मोदी और राष्ट्रपति प्रोवोबो की मुलाकात पर थी तब बंद कमरे में एक ऐसी डील फाइलन हो रही थी जिसने बीजिंग के रक्षा एक्सपर्टों के पसीने छुड़ा दिए। इंडोनेशिया ने अब भारत की उस अस्त्र मिसाइल को खरीदने का फैसला किया है जिसने ऑपरेशन सिंदूर में अपनी मारक क्षमता का लोहा पाकिस्तान में घुसकर मनवाया। जकार्ता में मंगलवार को जो कुछ हुआ वो सिर्फ दो देशों की मुलाकात नहीं थी बल्कि एक नए डिफेंस सुपर पावर का उदय था। पीएम मोदी और राष्ट्रपति प्रोबोबो के बीच हुई द्विपक्षीय बैठक में कई अहम समझौते हुए। लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा अस्त्र एयर टू एयर मिसाइल की हो रही है। भारत ने ना केवल इंडोनेशिया को ब्रह्मोस दी बल्कि अब अपनी सबसे आधुनिक अस्त्र मिसाइल भी सौंप दी है। इसका मतलब साफ है कि भारत ने इंडोनेशिया के जरिए चीन की घेराबंदी पूरी कर ली है।
दोनों नेताओं ने सबांग पोर्ट को मिलकर विकसित करने के लिए एक समझौते पर भी हस्ताक्षर किए। यह पोर्ट इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप के उत्तरी सिरे पर स्थित है, जहाँ से मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) दिखाई देता है और यह भारत के आने वाले ग्रेट निकोबार ट्रांस-शिपमेंट पोर्ट प्रोजेक्ट से लगभग 160 किलोमीटर दूर है। चूंकि सबांग पोर्ट मलक्का जलडमरूमध्य के पास स्थित होगा, इसलिए भारत के लिए मलक्का जलडमरूमध्य तक पहुँचना आसान हो जाएगा। जो लोग नहीं जानते, उन्हें बता दें कि मलक्का जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक है, जहाँ से वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा गुजरता है। दरअसल, यह संकरा मार्ग विश्व के व्यापार का एक बड़ा हिस्सा संभालता है, जो वैश्विक व्यापार मात्रा का 25-35 प्रतिशत है, और चीन अपनी ऊर्जा आपूर्ति का लगभग 80 प्रतिशत इसी पर निर्भर करता है। इससे भारत को हिंद महासागर में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) नौसेना की गतिविधियों पर बेहतर निगरानी रखने की क्षमता भी मिलेगी, जहां वह अपनी ताकत का प्रदर्शन कर रही है। 'द डिप्लोमैट' की एक रिपोर्ट के अनुसार, सबांग पोर्ट भारतीय नौसेना को पूर्वी हिंद महासागर और मलक्का जलडमरूमध्य में ऑपरेशन जारी रखने के लिए एक अच्छी जगह पर स्थित लॉजिस्टिक्स और री-सप्लाई नोड देगा। खास तौर पर, सबांग का पोर्ट मानवीय आपात स्थितियों में मदद करने, आपदा राहत पहुंचाने और समुद्री लुटेरों के खिलाफ गश्त करने की भारतीय नौसेना की क्षमता को बढ़ा सकता है। रक्षा विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि सबांग भारत को समुद्र में बेहतर पहुंच प्रदान करता है। इसके अलावा, यह गहरे पानी वाला पोर्ट पनडुब्बियों सहित सभी तरह के नौसैनिक जहाजों को संभालने में सक्षम है।
मोदी और प्राबोवो की बातचीत का एक अहम नतीजा मिनरल्स के क्षेत्र में सहयोग के लिए हुआ MoU था। भारत ने इंडोनेशिया में स्टील, निकेल और रेयर-अर्थ परमानेंट मैग्नेट बनाने की सुविधाओं में निवेश करने के लिए समझौता किया है, क्योंकि नई दिल्ली सप्लाई चेन में विविधता लाना चाहती है। भारत की निकेल में खास दिलचस्पी है, जो EV बैटरी और इलेक्ट्रिक वाहनों का एक अहम हिस्सा है। यह भारत के लिए बहुत ज़रूरी है क्योंकि वह साफ़ ऊर्जा वाली तकनीकों की ओर बढ़ना चाहता है। अभी, भारत अपने फेरोनिकेल का 80 प्रतिशत से ज़्यादा हिस्सा इंडोनेशिया से आयात करता है, जो स्टील बनाने के लिए बहुत ज़रूरी है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी की 'ग्लोबल मिनरल्स आउटलुक 2024' रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के रिफाइंड निकेल में इंडोनेशिया और चीन की हिस्सेदारी 65 प्रतिशत थी, और अकेले इंडोनेशिया की हिस्सेदारी 2040 तक 44 प्रतिशत होने का अनुमान है।
दोनों देशों ने चुनाव में सहयोग के लिए एक MoU पर भी साइन किए हैं। इस समझौते के तहत, नई दिल्ली जकार्ता को कस्टमाइज़्ड इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें (EVM) उपलब्ध कराएगी। पीएम मोदी ने कहा कि लोकतांत्रिक मूल्य और विविधता में एकता भारत और इंडोनेशिया, दोनों की साझा ताकत रही है। हम दोनों देशों के चुनाव आयोगों के बीच MoU के ज़रिए अपने लोकतांत्रिक सहयोग को और मज़बूत करने के लिए तैयार हैं। उन्होंने आगे कहा कि यह समझौता चुनाव टेक्नोलॉजी, क्षमता निर्माण, मानव संसाधन विकास और बेहतरीन तौर-तरीकों के आदान-प्रदान में सहयोग को बढ़ाएगा। खबरों के मुताबिक, भारत जिन EVM को तैयार करेगा, उन्हें जकार्ता 2029 के आम चुनावों में इस्तेमाल करेगा। दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा लोकतंत्र अभी भी पेपर बैलेट का इस्तेमाल करके चुनाव कराता है।
इंडोनेशिया भौगोलिक रूप से उस जगह बैठा है जहां से चीन का व्यापारिक और सैन्य रास्ता गुजरता है। अगर इंडोनेशिया के फाइटर जेट्स भारत की अस्त्र मिसाइल से लैस हो जाते हैं तो चीन की वायु सेना के लिए इस इलाके में घुसपैठ करना सुसाइड मिशन यानी आत्मघाती जैसा होगा। ब्रह्मोस के बाद अब बात अस्त्र की करें तो भारत ने पहले ब्रह्मोस देकर इंडोनेशिया की नौसेना को मजबूत किया, एमओयू साइन किया और अब अस्त्र देकर उसकी वायुसेना को अजय बना दिया है। यह पीएम मोदी का वो डबल अटैक है जिसने चीन के स्ट्रिंग ऑफ पल्स के जवाब में भारत का नेकलेस ऑफ डायमंड्स तैयार कर लिया है।