मंदिरों की मणिमाला का मोती है जगत का अम्बिका मंदिर

By डॉ.प्रभात कुमार सिंघल | Oct 20, 2018

सरस्वती, नृत्य भाव में गणपति, महिषासुर मर्दिनी, नवदुर्गा, वीणाधारिणी, यम, कुबेर, वायु, इन्द्र, वरूण, प्रणय भाव में युगल, अंगड़ाई लेते हुए व दर्पण निहारती नायिका, शिशु क्रीडा, वादन, नृत्य आकृतियां एवं पूजन सामग्री सजाये रमणी आदि कलात्मक प्रतिमाओं का अचंभित कर देने वाली मूर्तियों का खजाना और आदित्य स्थापत्य कला को अपने में समेटे जगत का अम्बिका मंदिर राजस्थान के मंदिरों की मणिमाला का मोती कहा जा सकता है। मूर्तियों का लालित्य, मुद्रा, भाव, प्रभावोत्पादकता, आभूषण, अलंकरण, केशविन्यास, वस्त्रों का अंकन और नागर शैली में स्थापत्य का आकर्षण इस शिखरबंद मंदिर को खजुराहो और कोणार्क मंदिरों की श्रृंखला में ला खड़ा करता है। मंदिर के अधिष्ठान, जंघाभाग, स्तम्भों, छतों, झरोखों एवं देहरी का शिल्प−सौन्दर्य देखते ही बनता है।

प्रवेश मण्डप और मुख्य मंदिर के मध्य खुला आंगन है। प्रवेश मण्डप से मुख्य मंदिर करीब 50 फुट की दूरी पर पर्याप्त सुरक्षित अवस्था में है। मंदिर के सभा मण्डप का बाहरी भाग दिग्पाल, सुर−सुंदरी, विभिन्न भावों में रमणियों, वीणाधारिणी, सरस्वती, विविध देवी प्रतिमाओं की सैंकड़ों मूर्तियों से सज्जित है। दायीं ओर जाली के पास सफेद पाषाण में निर्मित नृत्य भाव में गणपति की दुर्लभ प्रतिमा है। मंदिर के पार्श्व भाग में बनी एक ताक में महिषासुर मर्दिनी की प्रतिमा विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उत्तर एवं दक्षिण ताक में भी विविध रूपों में देवी अवतार की प्रतिमाएं नजर आती हैं। मंदिर के बाहर की दीवारों की मूर्तियों के ऊपर एवं नीचे कीचक मुख, गज श्रृंखला एवं कंगूरों की कारीगरी देखते ही बनती है। प्रतिमाएं स्थानीय पारेवा नीले−हरे रंग के पाषाण में तराशी गई हैं।

गर्भ गृह की परिक्रमा हेतु सभा मण्डप के दोनों ओर छोटे−छोटे प्रवेश द्वार बनाए गए हैं। गर्भ गृह की विग्रह पटि्टका मूर्तिकला का अद्भुत खजाना है। यहां द्वारपाल के साथ गंगा, यमुना, सुर−सुंदरी, विद्याधर एवं नृत्यांगनाओं के साथ−साथ देवप्रतिमाओं के अंकन में शिल्पियों का श्रम देखते ही बनता है। गर्भ गृह की देहरी भी अत्यन्त कलात्मक है। गर्भ गृह में प्रधान पीठिका पर अम्बिका माता की प्रतिमा स्थापित है।

मध्यकालीन गौरवपूर्ण मंदिरों की श्रृंखला में सुनियोजित ढंग से बनाया गया जगत का अम्बिका मंदिर मेवाड़ के प्राचीन उत्कृष्ठ शिल्प का नमूना है। जीवन की जीवंतता एवं आनंदमयी क्षणों की अभिव्यक्ति मूर्तियों में स्पष्ट दर्शनीय है। यहां से प्राप्त प्रतिमाओं के आधार पर इतिहासकारों का मानना है कि यह स्थान पांचवी व छठी शताब्दी में शिव−शक्ति संप्रदाय का महत्वपूर्ण केन्द्र रहा है। इसका निर्माण खजुराहो में बने लक्ष्मण मंदिर से पहले करीब 960 ईस्वी के आसपास माना जाता है। मंदिर के स्तम्भों पर उत्कीर्ण लेखों से पता चलता है कि ग्यारहवीं शताब्दी में मेवाड़ के शासक अल्लट ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। यहां देवी को अम्बिका कहा गया है। धार्मिक महत्व की दृष्टि से यह प्राचीन शक्तिपीठ है।

मंदिर को पुरातत्व विभाग के अधीन संरक्षित स्मारक घोषित किया गया है। यद्यपि इस मंदिर को देखने के लिए उदयपुर से पर्यटक बड़ी संख्या में पहुंचते हैं, तथापि पुरातत्व, मूर्ति एवं शिल्पकला में रूचि रखने वालों के लिए मंदिर का विशेष महत्व है।

डॉ.प्रभात कुमार सिंघल

लेखक एवं पत्रकार

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