परिसीमन मुद्दे पर उत्तर बनाम दक्षिण का नैरेटिव खड़ा कर रहे नेताओं से कुछ सवाल

By नीरज कुमार दुबे | Apr 15, 2026

केंद्र सरकार और तमिलनाडु सरकार के बीच परिसीमन को लेकर छिड़ा विवाद अब राजनीतिक टकराव के नए चरण में पहुंच चुका है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन द्वारा राज्य भर में काला झंडा प्रदर्शन की घोषणा ने इस मुद्दे को और अधिक तीखा बना दिया है। यह विवाद उत्तर और दक्षिण के बीच राजनीतिक शक्ति संतुलन के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, जो कई सवाल खड़े करता है।

इसे भी पढ़ें: Delimitation पर भड़के CM Stalin, बोले- South India के साथ ऐतिहासिक अन्याय, परिणाम भुगतने होंगे

केंद्र का तर्क है कि देश की जनसंख्या संरचना में भारी बदलाव आया है और प्रतिनिधित्व को वास्तविक स्थिति के अनुरूप बनाया जाना आवश्यक है। साथ ही महिला आरक्षण को लागू करने के लिए भी यह प्रक्रिया महत्वपूर्ण मानी जा रही है। लेकिन दक्षिण के कई नेता इस प्रस्ताव को संदेह की नजर से देख रहे हैं।

एमके स्टालिन ने इसे दक्षिणी राज्यों के खिलाफ पक्षपात बताया है। उनका कहना है कि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता पाई, उन्हें इस प्रक्रिया के जरिए दंडित किया जा रहा है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि केंद्र सरकार ने उनकी चिंताओं को नजरअंदाज किया तो उसे भारी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ेगी। उन्होंने इस मुद्दे को केवल तमिलनाडु का नहीं बल्कि संघीय ढांचे की रक्षा का सवाल बताया है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने भी इस प्रस्ताव पर गंभीर चिंता जताई है। उनका कहना है कि जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण दक्षिणी राज्यों की राजनीतिक शक्ति को कमजोर कर सकता है। उन्होंने सुझाव दिया कि एक संतुलित मॉडल अपनाया जाए जिसमें जनसंख्या के साथ-साथ आर्थिक योगदान को भी ध्यान में रखा जाए। कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने भी चेतावनी दी है कि यह प्रक्रिया कुछ बड़े राज्यों के पक्ष में शक्ति का केंद्रीकरण कर सकती है और संघीय संतुलन को बिगाड़ सकती है।

देखा जाये तो यहां तक तो बहस एक लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा लगती है, लेकिन जिस तरह से इसे उत्तर बनाम दक्षिण की लड़ाई के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, वह चिंताजनक है। भारत एक संघीय गणराज्य है जहां सभी राज्यों की समान भागीदारी और राष्ट्रीय एकता सर्वोपरि है। ऐसे में क्षेत्रीय भावनाओं को भड़काना और राजनीतिक लाभ के लिए विभाजन की रेखाएं खींचना एक गलत मानसिकता को दर्शाता है।

कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम का बयान भी कई सवाल खड़े करता है। उन्होंने दावा किया कि परिसीमन से दक्षिणी राज्यों की आवाज दब जाएगी और संसद सत्र को चुनाव के समय बुलाना एक सुनियोजित साजिश है।  लेकिन यह समझना जरूरी है कि परिसीमन एक संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसे समय समय पर लागू किया जाना आवश्यक है। इसे साजिश या राजनीतिक चाल बताना क्या देश की संस्थाओं पर अनावश्यक संदेह पैदा नहीं करता?

चिदंबरम जैसे वरिष्ठ नेता, जो देश के गृह मंत्री रह चुके हैं, उनसे अपेक्षा की जाती है कि वह तथ्यों और संतुलित दृष्टिकोण के साथ अपनी बात रखें। यदि तमिलनाडु की सीटें बढ़कर 39 से 58 तक पहुंच सकती हैं, जैसा उन्होंने स्वयं कहा, तो फिर यह कैसे कहा जा सकता है कि राज्य की आवाज पूरी तरह दब जाएगी? यह तर्क स्वयं में विरोधाभासी प्रतीत होता है।

दरअसल, इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व लोकतंत्र का मूल सिद्धांत नहीं है? यदि किसी क्षेत्र की जनसंख्या अधिक है, तो उसका प्रतिनिधित्व भी अधिक होना स्वाभाविक है। साथ ही यह भी सही है कि विकास और जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। इसलिए इस मुद्दे पर संतुलित और व्यावहारिक समाधान की आवश्यकता है, न कि राजनीतिक ध्रुवीकरण की।

दक्षिणी राज्यों के नेताओं को चाहिए कि वह इस विषय पर संवाद और सहमति की दिशा में आगे बढ़ें, न कि विरोध और टकराव की राजनीति को बढ़ावा दें। केंद्र सरकार को भी सभी राज्यों की चिंताओं को गंभीरता से सुनते हुए ऐसा रास्ता निकालना चाहिए जो न्यायसंगत और सर्वमान्य हो।

यहां यह भी उल्लेखनीय है कि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने घोषणा की है कि INDIA ब्लॉक के तहत एकजुट विपक्षी दल संसद में प्रस्तावित परिसीमन विधेयक का कड़ा विरोध करेंगे। नई दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में विपक्षी नेताओं की बैठक के बाद पत्रकारों से बातचीत में खरगे ने कहा कि यह विधेयक लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को कमजोर कर सकता है और सरकार ने इसे बिना जनगणना पूरी किए पेश किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि कार्यपालिका संवैधानिक संस्थाओं की शक्तियों को अपने हाथ में ले रही है और परिसीमन के जरिए कभी भी सीमाओं में बदलाव कर सकती है। देखा जाये तो तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, डीएमके और आम आदमी पार्टी सहित कई दलों की मौजूदगी में हुई इस बैठक को 16 अप्रैल से शुरू हो रहे संसद सत्र से पहले विपक्षी एकजुटता के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। विपक्ष का मानना है कि यह विधेयक हिंदी भाषी राज्यों को लाभ पहुंचाकर दक्षिण और पूर्वी राज्यों के प्रभाव को कम कर सकता है।

बहरहाल, इसमें कोई दो राय नहीं कि परिसीमन का मुद्दा केवल सीटों के बंटवारे का नहीं, बल्कि देश की एकता और लोकतांत्रिक मूल्यों की परीक्षा भी है। इसे क्षेत्रीय अस्मिता की लड़ाई बनाने की बजाय राष्ट्रीय हित में संतुलित दृष्टिकोण अपनाना ही समय की मांग है।

-नीरज कुमार दुबे

प्रमुख खबरें

Jyotiraditya Scindia बोले: दो सदियों से Hindi Journalism राष्ट्र चेतना की रीढ़, राष्ट्र निर्माण में अहम योगदान।

Rulers have become killers..., अभिषेक बनर्जी हमले पर Mamata आग बबूला, Kharge-Akhilesh ने भी BJP को घेरा

केंद्रीय मंत्री का दावा- पहले गांधी, अब PM Modi हैं India के सबसे बड़े Brand Ambassador

Russia की तस्वीर ने हिलाई दुनिया, रातों-रात पलटी भारत की किस्मत!