कभी अन्नदाता तो कभी आमलोगों को रुलाता टमाटर

By डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा | Apr 01, 2025

यह कैसी विडंबना है कि टमाटर की खेती करने वाले काश्तकारों को आज टमाटर की लागत तो दूर तुड़वाई के पैसे भी नहीं मिल पा रहे हैं। मध्य प्रदेश की मण्डियों से आ रहे समाचार केवल मध्यप्रदेश के टमाटर उत्पादक किसानों की ही पीड़ा व्यक्त नहीं कर रहे अपितु देश की अधिकांष मण्डियों में टमाटर के भाव औंधे मुंह गिर गए हैं। कुछ समय पहले ही गृहणियों की रसोई में टमाटर का तड़का मुश्किल हो गया था और टमाटर के खुदरा भाव 200 रु. प्रति किलो को छू गए थे आज वहीं टमाटर देश की किसी किसी मण्डी में तो एक रु. प्रति किलो से भी कम में बोला जा रहा है। ऐसे में किसान अपनी बदनसीबी के आंसू बहाते हुए सड़कों पर फेंकने, पशुओं को खिलाने या मण्डियों में बिखेरने को मजबूर हो रहे हैं। आज गली मौहल्ले में फेरी लगाकर बेचने वाले सब्जी विक्रेता ही 10 से 15 रु. किलों में टमाटर बेच रहे हैं। खुदरा में टमाटरों के भाव कम होने से आम नागरिकों को तो तात्कालीक फायदा हो रहा है पर उत्पादक किसान अपने आपको ठगा महसूस कर रहा है। यह केवल इस बार की ही समस्या नहीं है अपितु प्रतिवर्ष इस तरह के हालातों से किसानों को दो चार होना पड़ता है। देखा जाएं तो टमाटर ना कोई से दोस्ती और ना कोई से प्रेम वाली कहावत को चरितार्थ करता रहा है। साल में मौका मिलने पर पहले आमनागरिकों को रुलाता है तो फिर आमलोगों को थोड़ी राहत देते हुए उत्पादक काश्तकारों को रुलाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ता। लगभग यही स्थिति प्याज की कई सालों से चली आ रही है। 

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जहां तक टमाटर की गणित समझने का सवाल उठता है विशेषज्ञों का मानना है कि टमाटर की खेती में काश्तकार की एक से दो लाख रु. तक की लागत प्रति एकड आती है और यह भी माना जाता है कि सामान्य परिस्थितियों में 400 से 420 क्विंटल टमाटर की पैदावार काश्तकार प्रति एकड़ तक ले लेते है। अत्यधिक गर्मी, अत्यधिक बरसात और ओलावृष्टि से सबसे अधिक टमाटर की फसल प्रभावित होती है। कीट प्रकोप के कारण भी टमाटर की पैदावार पर सीध असर पड़ता है। सबसे अधिक चिंतनीय बात यह है कि जब टमाटर की फसल तैयार होकर बाजार में आती है तो टमाटर की भावों में तेजी से गिरावट आने लगती है। इसका व्यापारी दोहरा लाभ उटाते हैं। एक तो ज्यादा से ज्यादा टमाटरों की खरीद कर निजी कोल्ड स्टोरेज में जमा कर देते हैं और मौके बेमौके बाजार में कृतिम अभाव पैदा कर दोहरा लाभ कमा लेते हैं। इसके अलावा बड़ी मात्रा में टमाटर के सहउत्पाद तैयार करने वाली मल्टीनेशनल कंपनियां बुवाई से पहले ही काश्तकारों से सौदा कर लाभ उठाती है। खैर यह विषयांतर होगा।

टमाटर उत्पादक किसान तुड़वाई या मण्डी तक पहुंचाने की लागत भी नहीं मिलने से किसान परेशान है तो किसान इन हालातों को देखते हुए टमाटर के भी न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करने और सरकारी खरीद की दबी जुवान से बात करने लगे हैं। खैर यह तो अलग बात हुई पर कहीं ना कहीं सरकार को भी साल दर साल होने वाले ऐसे हालातों को देखते हुए किसानों और आमलोगों के हित का रोडमेप बनाना ही होगा। इसमें कोई दो राय नहीं कि जब सड़कों पर टमाटर बिखरे मिलते हैं तब भी सरकार की साख प्रभावित होती है तो जब टमाटर के भाव आसमान छूने लगते हैं तब भी सरकार की साख पर सीधा सीधा असर पड़ता है। राजनीतिज्ञ भूले नहीं होंगे प्याज के भावों में उतार-चढ़ाव का असर सरकारों के आने और जाने से जुड़ा रह चुका है। सवाल यह है कि सरकार को टमाटर या इसी तरह की जल्द खराब होने वाले उत्पादों के रखरखाव और एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचाने के लिए कोल्ड स्टोरेज और कोल्ड स्टोरेज युक्त परिवहन वाहनों की संख्या बढ़ानी होगी। सरकार ने भले ही किसानों के उत्पादों को लाने ले जाने के लिए ट्रेन सेवा शुरु कर दी है पर अभी इस दिशा में तेजी से काम करने की आवश्यकता है। देश में फूड पार्क बनाने की दिशा में तेजी लानी होगी। सबसे ज्यादा जरुरी सरकार को तत्काल बाजार हस्तक्षेप की और ध्यान देना होगा। एक विंग ऐसी होनी चाहिए कि जो बाजार में मांग और उपलब्धता पर नजर रखे और समय रहते काश्तकारों के लिए जब जरुरत हो तब और आमलोगों के लिए जब जरुरत हो तब कदम उठाएं ताकि किसान, मण्डी और आमलोगों के हितों की रक्षा की जा सके। अब तो यह भी साफ हो गया है कि बाजार में कब अधिक माल आयेगा तो कब किल्लत वाल स्थिति होगी। जब सब कुछ सामने है तो दीर्घकालीन नीति बनाकर दोनों के हितों को ध्यान में रखना होगा।

- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

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