By नीरज कुमार दुबे | Sep 26, 2026
लद्दाख में अधिकारों, राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची की मांग को लेकर लंबे समय से मुखर रहे जलवायु कार्यकर्ता और लेह एपेक्स बॉडी के सदस्य सोनम वांगचुक अब अपने एक बयान को लेकर विवादों में घिर गए हैं। लद्दाख की मौजूदा परिस्थितियों की तुलना चीन के कब्जे वाले तिब्बत से करने पर केंद्रीय तिब्बती प्रशासन ने कड़ी आपत्ति जताई है। धर्मशाला स्थित केंद्रीय तिब्बती प्रशासन ने वांगचुक की टिप्पणी को न केवल अनुचित, बल्कि वास्तविक परिस्थितियों को गलत तरीके से प्रस्तुत करने वाली बताया है।
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हम आपको बता दें कि 24 सितंबर 2025 को लेह में हुई हिंसा की पहली बरसी पर लोगों को संबोधित करते हुए वांगचुक ने लद्दाख में पिछले वर्ष हुए घटनाक्रम को लेकर सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि छठी अनुसूची और राज्य का दर्जा देने के कथित आश्वासनों को पूरा नहीं किया जाना ही पिछले वर्ष के आंदोलन की मूल वजह था।
वांगचुक ने दावा किया कि पिछले साल प्रदर्शन के दौरान पुलिस गोलीबारी में चार लोगों की मौत हुई और करीब 90 लोग घायल हुए। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदर्शन कर रहे निहत्थे युवाओं पर स्वचालित हथियारों से गोलियां चलाई गईं। उनका कहना था कि मृतकों के सीने, पीठ और सिर में गोलियां लगी थीं और यह महज भीड़ को नियंत्रित करने के लिए छोड़े गए छर्रे नहीं थे।
इसी संदर्भ में वांगचुक ने लद्दाख की तुलना तिब्बत से करते हुए कहा कि लद्दाख में कथित तौर पर ऐसी ज्यादतियां हो रही हैं, जो उनके अनुसार चीन भी तिब्बत में नहीं कर रहा। उन्होंने यह भी कहा कि लद्दाख के लोगों ने भारत को इसलिए चुना था क्योंकि यहां लोकतांत्रिक व्यवस्था है। हालांकि, इसी तुलना ने अब तिब्बती प्रशासन को खुलकर सामने आने के लिए मजबूर कर दिया है।
वांगचुक ने पिछले वर्ष हुई मौतों की जांच के लिए जनता की अदालत गठित करने की मांग भी उठाई। उनका कहना था कि केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा गठित न्यायिक आयोग की रिपोर्ट अब तक सामने नहीं आई है। उन्होंने दावा किया कि 24 सितंबर 2025 को मारे गए चार प्रदर्शनकारी अपने अधिकारों की मांग कर रहे थे और उन पर कथित रूप से अत्यधिक बल का इस्तेमाल किया गया।
वांगचुक ने आंदोलन के लिए खुद को जिम्मेदार ठहराए जाने के आरोपों को भी खारिज किया। उन्होंने दावा किया कि 2020 में लेह स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषद के चुनाव से पहले लद्दाख के कुछ प्रतिनिधियों को विशेष विमान से नई दिल्ली ले जाया गया था और उन्हें राज्य का दर्जा तथा छठी अनुसूची का दर्जा देने का आश्वासन दिया गया था। उनके मुताबिक इन कथित आश्वासनों को पूरा नहीं किए जाने से लोगों में असंतोष बढ़ा और अंततः पिछले साल प्रदर्शन भड़क उठे।
हम आपको याद दिला दें कि हिंसा के बाद लेह में कर्फ्यू जैसी पाबंदियां लगाई गई थीं। आगजनी और दंगे के आरोपों के बाद प्राथमिकी दर्ज हुईं और 81 लोगों को गिरफ्तार किया गया। इनमें वांगचुक भी शामिल थे। उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत कार्रवाई की गई और उन्हें जोधपुर जेल भेजा गया। करीब 170 दिन हिरासत में रहने के बाद केंद्र सरकार ने इस वर्ष 14 मार्च को उनकी हिरासत वापस ले ली, जिसके बाद उन्हें रिहा किया गया।
अब वांगचुक ने आशंका जताई है कि लद्दाख में कथित अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाने के कारण उन्हें किसी मुठभेड़ में निशाना बनाया जा सकता है। दूसरी ओर, तिब्बती प्रशासन की आपत्ति ने इस पूरे विवाद को एक नए स्तर पर पहुंचा दिया है। देखा जाये तो एक तरफ वांगचुक लद्दाख में लोकतांत्रिक अधिकारों और कथित सरकारी वादाखिलाफी का मुद्दा उठा रहे हैं, तो दूसरी तरफ केंद्रीय तिब्बती प्रशासन यह स्पष्ट कर रहा है कि चीन के अधीन तिब्बत की राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों को लद्दाख से जोड़ना उचित नहीं है।
बहरहाल, इस विवाद ने लद्दाख के अधिकारों की लड़ाई को अब केवल राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची की मांग तक सीमित नहीं रहने दिया है। सवाल यह भी उठ खड़ा हुआ है कि लोकतांत्रिक भारत में शासन और सुरक्षा बलों की कार्रवाई पर उठाए जा रहे सवालों की तुलना चीन के तिब्बत शासन से किस सीमा तक की जा सकती है और इस तुलना की राजनीतिक तथा ऐतिहासिक कीमत क्या होगी।