सपा और राजद को BJP ने बताया नमाजीवाद पार्टी, सुधांशु त्रिवेदी बोले- संविधान को कूडे़दान में नहीं फेंकने देंगे

By अंकित सिंह | Jun 30, 2025

भाजपा ने बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव पर रविवार को पटना में वक्फ संशोधन अधिनियम पर दिए गए विवादास्पद बयान के लिए हमला बोला और कहा कि उनकी पार्टी समाजवाद से ज्यादा नमाजवाद को बढ़ावा देने में दिलचस्पी रखती है। भाजपा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने आज दिल्ली में एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि राजद, समाजवादी पार्टी आदि जैसी पार्टियां, जो समाजवाद का चोला ओढ़े हुए हैं, गरीब और उत्पीड़ित मुसलमानों के अधिकारों के लिए खड़ी नहीं हो रही हैं। इसलिए राजद और सपा के समाजवाद को कतई समाजवाद नहीं कहा जा सकता। अगर इसे नमाजवाद कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

सुधांशु त्रिवेदी ने तंज कसते हुए कहा कि वोट बैंक की चाहत में इंडी गठबंधन के सहयोगी तेजस्वी यादव द्वारा जो कुछ बोला गया है, उससे साफ है कि ये संविधान को कूड़ेदान में फेंकने की मानसिकता से बाहर नहीं आ पा रहे हैं। उन्होंने कहा कि मैं यह कहना चाहता हूँ कि कुरान में ‘वक्फ’ जैसा कोई शब्द नहीं है। यह मुल्लाओं और मौलवियों द्वारा बनाया गया शब्द है। इस्लाम आपको खर्च करना, देना सिखाता है, न कि रखना या जमा करना। और फिर भी, आप कहते हैं, “संग्रह करो”? यह बाबा साहब के संविधान का मज़ाक उड़ाने के अलावा और कुछ नहीं है, इसे धर्मनिरपेक्ष दस्तावेज़ से मौलवियों की स्क्रिप्ट में बदलने की कोशिश है।

उन्होंने कहा कि ये समाजवादी अल्पसंख्यकों की भी परवाह नहीं करते। मुल्ला-मौलवियों के आगे सिर झुकाकर ये 'समाजवाद' को 'नमाजवाद' में बदलना चाहते हैं। 'पक्के नमाजवादी हैं, आरजेडी हो या कांग्रेस, कठमुल्ला वोटो की प्यास में कितनी तड़प है।' मैं बिहार के लोगों से कहना चाहता हूं कि दो विकल्प हैं। एक तरफ इंडी गठबंधन, जो सत्ता में आने पर पिछले दरवाजे से शरिया लागू करने की कोशिश करेगा और दूसरी तरफ हमारी सरकार, जो बाबा साहब के संविधान की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध रहेगी। 

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विपक्ष पर वार करते हुए उन्होंने कहा कि अगर वे कभी सत्ता में आए तो यह संभव नहीं है, लेकिन वे बाबा साहब अंबेडकर के संविधान को कूड़ेदान में फेंक देंगे और शरिया कानून लागू करेंगे। यह कोई अतिशयोक्ति नहीं है। अतिशयोक्ति नहीं। याद रखें, भारत में सरकार ने केवल एक बार 400 सीटें पार की हैं - 1985 में। और फिर क्या हुआ? शाहबानो मामले को देखें। उस 400 से ज़्यादा की सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को कुचल दिया और शरिया कानून को संविधान से ऊपर रख दिया।

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