सपा की नई कार्यकारिणी अखिलेश यादव की तुष्टिकरण की राजनीति का गजब उदाहरण है

By अजय कुमार | Aug 16, 2023

समाजवादी पार्टी अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव में एक बार खोलकर मुस्लिम कार्ड खेलने की तैयारी कर रही है। इस बात का एहसास सपा की घोषित नई कार्यकारणी से लगाया जा रहा है। सपा ने आबादी के औसत से काफी अधिक पद मुस्लिम नेताओं को दिए हैं। मुसलमानों के बाद सपा ने दलित और पिछड़ों पर दांव लगाया है। लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुटी समाजवादी पार्टी ने जैसे ही सपा प्रदेश इकाई की नई टीम घोषित की इसको लेकर प्रतिक्रियाएं भी आना शुरू हो गई हैं। बीजेपी इसे तुष्टिकरण की सियासत बता रही है, तो बसपा को लगता है कि मुसलमान उसके साथ खड़ा है। बसपा आजमगढ़ लोकसभा उप-चुनाव के नतीजों के आधार पर सपा को आईना दिखा रही है। बहरहाल, आम चुनाव के मैदान में उतरने के लिए सपा ने उत्तर प्रदेश की 182 सदस्यीय भारी-भरकम राज्य कार्यकारिणी में पी0डी0ए0 (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) को महत्व दिया है और मुसलमानों के बाद बड़ी संख्या में अति पिछड़ों को जगह दी गई है। वरिष्ठ नेता आजम खां के बेटे अब्दुल्ला आजम खां को सचिव बनाया जाना बताता है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अखिलेश को आजम से काफी उम्मीदें हैं। कई विधायकों को भी कमेटी में स्थान दिया गया है।


उत्तर प्रदेश भारत की सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है। यहां 80 लोकसभा सीटे हैं, जिसमें से करीब 29 सीटों पर मुस्लिम वोटर निर्णायक रहते हैं। सपा का इन्हीं मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर फोकस है। देश की कुल आबादी का 16.51 फीसदी मुसलमान यहीं बसता है। ये बात भी जगजाहिर है कि इस सूबे में चुनावों में हुई हार-जीत का गणित देश की सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाता है। साल 2011 की जनगणना पर नजर डालें तो यूपी की कुल आबादी 19.98 करोड़ रही और इसमें 3.84 करोड़ मुस्लिम थे। इस हिसाब से देखा जाए तो इस सूबे की कुल आबादी में 20.26 फीसदी मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व करता है। यही वजह है कि सियासी शतरंजी बिसात पर मुस्लिम वोट बैंक की अहमियत को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। यहां विभिन्न राजनीतिक दलों की हार-जीत का दारोमदार मुस्लिम नेताओं पर रहता है। यूपी में कई बड़े सियासी मुस्लिम चेहरे हैं। यही मुस्लिम नेता अपने प्रभाव से इस समुदाय का वोट बैंक खींचते हैं। ऐसे कुछ असरदार और रौबदार नेताओं में आजम खान, मुख्तार अंसारी, नसीमुद्दीन सिद्दीकी हैं तो इमरान मसूद, शफीकुर्रहमान बर्क, नाहिद हसन, हाजी फजलुर्रहमान, एसटी हसन जैसे जनता के बीच मशहूर चेहरे भी शामिल हैं। इसमें दो राय नहीं कि लोकसभा 2024 के चुनावों में भी इन चेहरों पर दांव लगाकर राजनीतिक पार्टियां मुसलमान वोट पाने की कवायद करेंगी।

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बात 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की कि जाए तो तब मुस्लिम वोटरों ने कांग्रेस-बसपा के मुस्लिम प्रत्याशियों को नजर अंदाज करके सपा के गैर-मुस्लिम कैंडिडेट को वोट दिए थे। सीएसडीएस के आंकड़ों की मानें तो यूपी में 87 फीसदी मुसलमानों ने सपा को वोट दिया था, जो अब तक के इतिहास में सबसे अधिक है। वैसे भी मुसलमानों को सपा का कोर वोट बैंक माना जाता है। जानकार कहते हैं कि मुसलमानों का समाजवादी पार्टी से लगाव काफी पुराना है। इसके लिए पूर्व सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने काफी मशक्कत की थी। जब मुलायम विपक्ष में रहते तो मुस्लिमों की आवाज बनते और जब सत्ता में होते तो उनके लिए काम करते। मुसलमानों का मुलायम सिंह के प्रति प्रेम उस समय जागा था जब अयोध्या में रामलला मंदिर और कथित बाबरी मस्जिद का विवाद गरमाया हुआ था। विश्व हिन्दू परिषद और भारतीय जनता पार्टी सहित तमाम हिन्दूवादी संगठन विवादित ढांचा तोड़कर वहां रामलला का मंदिर बनाये जाने की बात कर रहे थे, तब तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव दहाड़ रहे थे कि बाबरी मस्जिद के ढांचे के पास परिंदा भी पर नहीं मार पायेगा। ऐसा करने के लिए 1990 में उन्होंने कारसेवा करने जा रहे कारसेवकों पर गोली बरसाने में भी गुरेज नहीं किया था, जिसमें दर्जनों कारसेवकों की मौत हो गई थी। इसी के बाद मुसलमान पूरी तरह से मुलायम के सामने नतमस्तक हो गया, जो कांग्रेस का वोट बैंक हुआ करता था, उसे सपा ने हथिया लिया। खैर, इधर कुछ समय से अखिलेश राज में मुसलमानों का मोह सपा से भंग हुआ है, जिसकी भरपाई के लिए ही सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने सपा की राज्य कार्यकारिणी में मुसलमानों को तरजीह दी है।


-अजय कुमार

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