पर्युषण पर्व में साफ-सफाई का रखा जाता है खास ख्याल

By प्रज्ञा पाण्डेय | Aug 30, 2019

पर्युषण पर्व जैनियों का प्रमुख त्यौहार है। यह त्यौहार भादो महीने में मनाया जाता है। जैन समाज में विशेष महत्ता के कारण इसे पर्वाधिराज भी कहा जाता है। तो आइए हम आपको पर्युषण पर्व में बारे में कुछ रोचक जानकारी देते हैं। 

पर्युषण शब्द परि और उषण शब्दों से मिलकर बना होता है जिसका अर्थ है आत्मा का उच्चभावों में रहना। यह पर्व तन-मन को शुद्ध करने का पर्व है। पर्युषण पर्व में पर्युषण शब्द का अर्थ है मन के सभी विकारों को खत्म करना। अर्थात मन में जितने प्रकार के भी बुरे विचार आते हैं उन्हें खत्म करना। बुरे विचारों को खत्म करने के कारण ही इस त्यौहार को महापर्व की भी संज्ञा दी जाती है। इस पर्व पर क्रोध, मोह, लोभ जैसे अनेक दुष्प्रवृत्तियों पर नियंत्रण कर शांति की ओर अग्रसर होते हैं। भादो मास की पंचमी से शुरू होकर अनंत चतुर्दशी तक मनाया जाता है। इसका उद्देश्य अपने जीवन में सत्य तथा अहिंसा का पालन करना है। 

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पर्युषण पर्व मनाने में अलग-अलग है मत

जैन धर्म में श्वेताम्बर और दिगम्बर अलग-अलग महीनों में पर्युषण पर्व मनाते हैं। इसे दशलक्षण व्रत भी कहा जाता है। साथ ही इस पर्व को श्वेतांबर समाज आठ दिन तक मनाता है इसलिए इसे अष्टान्हिका भी कहते हैं। इस त्यौहार में जैन दर्शन के पांच तत्वों अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य पर विशेष रूप से जोर दिया जाता है। उत्तम संयम, उत्तम क्षमा, उत्तम आर्जव, उत्तम तप, उत्तम मार्दव, उत्तम त्याग, उत्तम सत्य, उत्तम अकिंचन्य, उत्तम ब्रह्मचर्य, उत्तम शौच के जरिए आत्मसाधना की जाती है।


इस पर्व में होता है कठिन व्रत 

जैन समाज के प्रिय पर्व में कठिन तप, जप और उपवास का खास महत्व होता है। इस दौरान पूरे दिन उपवास किया जाता है। कुछ लोग इस उपवास में निराहार रहते हैं और केवल पानी पीते हैं। पर्यूषण पर्व में तपस्या भी तीन तरह की होती है। इसमें एकासना जब दिन में एक बार भोजन ग्रहण किया जाता है। उपवास के दौरान 24 घंटे गर्म पानी पीकर रहा जाता है। इसके अलावा तेलातप और अठाई तप भी किया जाता है जिसमें तेलातप में 3 दिन और अठाई तप में आठ तीन केवल गर्म पानी पीकर रहा जाता है। 

जैन धर्म का पर्युषण पर्व हिंदुओं की नवरात्रि की भांति माना जाता है। इस त्यौहार में जैन धर्मावलंबी पूरे संसार की भलाई की कामना करते हैं और अपनी गलतियों के लिए माफी भी मांगते हैं। जैन धर्म का यह पर्व हमें प्रकृति से जोड़ता है। 

पर्युषण पर्व को बरसात में मनाया जाता है

पर्युषण पर्व को बरसात में मनाए जाने के पीछे कारण है। बरसात के चार महीने में चारों तरफ बारिश, कीचड़ और पानी हो जाता है जिससे कहीं आना-जाना मुश्किल हो जाता है। साथ ही अत्यधिक वर्षा के कारण तरह-तरह के जीव-जन्तु भी घूमते हैं। ऐसे में जैन अनुयायियों ने एक स्थान पर रहकर तप करने का तरीका अपनाया।

पर्युषण पर्व पर निकलती है यात्राएं

जैन समाज के महत्वपूर्ण पर्व पर मंदिरों में विशेष साफ-सफाई की जाती है। साथ ही श्रद्धालु धर्म ग्रंथों का पाठ करते हैं। इसके अलावा रथयात्राएं या शोभायात्राएं भी निकाली जाती है। यही नहीं मंदिरों और सार्वजनिक स्थलों पर भोज का भी आयोजन किया जाता है। 

प्रज्ञा पाण्डेय

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