कोडुंगल्लूर देवी मंदिर: अदभुत है इस मंदिर की मान्यता और इसका इतिहास

By प्रकृति चौधरी | May 12, 2020

कोडुंगल्लूर देवी मंदिर अत्यंत प्राचीन मंदिर है, जो कि केरल राज्य के त्रिशूर जिले में स्थापित है। वैसे तो दक्षिण भारत मे बहुत से मंदिर है परंतु यह मंदिर सब मंदिरों में सबसे अद्भुत है। कोडुंगल्लूर देवी मंदिर को "श्री कुरम्बा भगवती मंदिर" के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर में माँ भद्रकाली उपस्थित है, उनकी काली रूप में पूजा की जाती है। यहां आने वाले लोग देवी को कुरम्बा या कोडुंगल्लूर अम्मा के नाम से बुलाते है।

केरल के मंदिर में माँ काली के रुद्र रूप की पूजा अर्चना की जाती है यह मंदिर मालाबार के 64 भद्रकाली मंदिरों में से प्रमुख है माँ काली ने अपने प्रचण्ड रूप में आठों हाथों में कुछ न कुछ पकड़ रखा है जैसे:- एक हाथ मे राक्षस राजा दारूका का सिर पकड़ा हुआ है, एक हाथ मे घंटी, एक हाथ मे तलवार और एक हाथ मे अंगूठी। मंदिर में दोपहर 3 बजे से लेकर रात 10 बजे तक पूजा होती है।

कोडुंगल्लूर मंदिर का इतिहास

यहां के लोगो का मानना है कि इस मंदिर में भगवान शिव की आराधना की जाती थी और परशुराम जी ने मंदिर के निकट ही माँ काली की प्रतिमा लगाई थी। कोडुंगल्लूर कभी चेरा साम्राज्य की राजधानी हुआ करता था, जो एक महत्वपूर्ण नगर कहलाता था। इस मंदिर को चेरमान पेरुमल ने बनवाया। यह मंदिर केरल के मध्य में स्थित है। इस मंदिर में उपस्थित माँ भद्रकाली को यहां के लोग "मलयाला भगवती" बुलाते है। इस मंदिर में प्राचीनतम तरह से ही देवी के निर्देशानुसार पूजा की जाती है। यहं पांच 'श्री चक्र' शंकराचार्य ने स्थापित किए, जिन्हें देवी की शक्तियों का मुख्य स्रोत माना जाता है। इस मंदिर में पुष्प अर्जित करने का अधिकार केवल यहाँ के पुजारी नंबूदिरीस और आदिकस का है।

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कोडुंगल्लूर मंदिर की मान्यताएं

इतिहास के पन्नों में कहा गया है कि प्राचीन काल मे इस मंदिर में सबसे पहले जानवरों की बलि की परंपरा हुआ करती थी बलि पक्षियों और बकरी की होती थी। भक्तों की मांग व उनके द्वारा संरक्षण की मांग में इन बलिदानों का चलन था, मगर अब इस सभ्यता में केरल सरकार के हस्तक्षेप के बाद से ही इस मंदिर में अब पशु-बलि पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, लेकिन यहां धार्मिक अनुष्ठानों की समाप्ति नहीं हुई है।  अब यहां पर भगवान को लाल धोती अर्पित करने की परंपरा है, भक्त महंगे उपहार, सोना-चांदी अपनी इच्छा व क्षमता अनुसार चढ़ाया जाता है। 

कौडुंगल्लूर भगवती मंदिर के त्यौहार

भरानी त्यौहार केरल के प्रमुख त्योहारों में से एक है इस त्योहार का आयोजन हर साल मार्च और अप्रैल महीने के बीच किया जाता है यह त्यौहार आमतौर पर 'कोझिकलकु मूडल' नामक अनुष्ठान से शुरू हुआ, जिसमे मुर्गो की बलि और उनके रक्त का बहाव शामिल है। इस त्यौहार का इतना माध्यम है कि इसके द्वारा माँ काली और उनके राक्षसों को प्रसन्न किया जा सके।

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'केतू थेण्डल' इस मंदिर का प्रमुख त्यौहार है बरगद के पेड़ के चारो ओर एक मंच बनाया जाता है राजा इस मंच पर खड़े होकर "रेशमी छतरी" फैलता है जिसके तुरंत बाद ही मंदिर के दरवाज़े खोल दिये जाते है। इसके बाद कोई भी जाति का श्रद्धालु मंदिर में प्रवेश कर सकता है, ऐसा कहा जाता है कि इस दौरान दारूका राक्षस की हत्या का जश्न मनाया जाता है इस प्रकार इसमें छड़ों का उपयोग किया जाता है जिसको तलवार का प्रतीक माना जाता है। इस मौके पर श्रद्धालु देव की तरह वस्त्र धारण करते है तथा मंदिर के चारो तरफ हाथों में छड़ लिए दौड़ते है, छड़ हवा में लहराने से यह अनुष्ठान पूरा किया जाता है। इसके पश्चात अगले दिन 'शुद्धिकरण' का समारोह आयोजन किया जाता है।

-प्रकृति चौधरी

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