10 रुपये के किराए की दुकान से शुरुआत, ​1 रुपये में पहली किताब, 14 भाषाओं में साहित्य की छपाई, गांधी शांति पुरस्कार पाने वाले गीता प्रेस की कहानी बेहद दिलचस्प है

By अभिनय आकाश | Jun 19, 2023

वर्ष 2021 का गांधी शांति पुरस्कार गीता प्रेस, गोरखपुर को प्रदान किय जाएगा। गीता प्रेस को यह पुरस्कार अहिंसक और अन्य गांधीवादी तरीकों से सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तन की दिशा में उत्कृष्ट योगदान के लिए दिया जाएगा। पुरस्कार में एक करोड़ रुपये, एक प्रशस्ति पत्र, एक पट्टिका और एक उत्कृष्ट पारंपरिक हस्तकला/हथकरघा वस्तु दी जाएगी। संस्कृति मंत्रालय ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता वाली जूरी ने सर्वसम्मति से गीता प्रेस गोरखपुर को गांधी शांति पुरस्कार के लिए चुनने का फैसला किया। लेकिन जानकारी के मुताबिक, बोर्ड की बैठक में तय हुआ है कि पुरस्कार के साथ मिलने वाली एक करोड़ रुपये की धनराशि गीता प्रेस स्वीकार नहीं करेगा। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर स्थित 'गीता प्रेस' को वर्ष 2021 का ‘गांधी शांति पुरस्कार’ प्रदान किये जाने पर बधाई दी है।

साल 1923 में किराए की दुकान में शुरू हुए इस प्रेस की कहानी भी बेहद दिलचस्प है। मात्र 1 रुपये में लोगों तक गीता उपलब्ध करवाने वाली गीताप्रेस ने कई उतार चढ़ाव देखें हैं। 1923 में स्थापित गीता प्रेस दुनिया के सबसे बड़े प्रकाशकों में से एक है, जिसने 14 भाषाओं में 41.7 करोड़ पुस्तकें प्रकाशित की हैं, जिनमें 16.21 करोड़ श्रीमद भगवद गीता शामिल हैं। संस्था ने राजस्व सृजन के लिए कभी भी अपने प्रकाशनों में विज्ञापन पर भरोसा नहीं किया है। गीता प्रेस अपने संबद्ध संगठनों के साथ, जीवन की बेहतरी और सभी की भलाई के लिए प्रयासरत है। 100 साल पहले सनातन धर्म को आगे बढ़ाने के लिए शुरू हुई तपस्या और साधना का है। कल्पना नहीं की जा सकती की 100 साल पहले जिस गीता प्रेस को महज 100 रुपये किराये के भवन में शुरू किया गया था, वो आज दो लाख वर्गफीट में फैल चुका है। 1926 को प्रेस को हिंदी बाजार से शिफ्ट करने का फैसला लिया गया। 1000 रुपये की लागत से गीताप्रेस की मौजूदा जगह पर प्रेस शिफ्ट कया गया

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क्या है गांधी शांति पुरस्कार?

गांधी शांति पुरस्कार महात्मा गांधी की 125वीं जयंती के अवसर पर महात्मा गांधी द्वारा प्रतिपादित आदर्शों को श्रद्धांजलि के रूप में 1995 में भारत सरकार द्वारा स्थापित एक वार्षिक पुरस्कार है। पुरस्कार राष्ट्रीयता, नस्ल, भाषा, जाति, पंथ या लिंग की परवाह किए बिना सभी व्यक्तियों के लिए खुला है। पुरस्कार में 1 करोड़ रुपये की राशि, एक प्रशस्ति पत्र, एक पट्टिका और एक उत्कृष्ट पारंपरिक हस्तकला / हथकरघा वस्तु होती है। पिछले पुरस्कार विजेताओं में इसरो, रामकृष्ण मिशन, बांग्लादेश के ग्रामीण बैंक, विवेकानंद केंद्र, कन्याकुमारी, अक्षय पात्र, बेंगलुरु, एकल अभियान ट्रस्ट, भारत और सुलभ इंटरनेशनल, नई दिल्ली जैसे संगठन शामिल हैं। यह स्वर्गीय डॉ. नेल्सन मंडेला, दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति, डॉ. जूलियस न्येरेरे, तंजानिया के पूर्व राष्ट्रपति, डॉ. ए.टी. अरियारत्ने, सर्वोदय श्रमदान आंदोलन, श्रीलंका के संस्थापक अध्यक्ष, डॉ. गेरहार्ड फिशर, जर्मनी संघीय गणराज्य, बाबा आमटे, डॉ. जॉन ह्यूम, आयरलैंड, वाक्लेव हवेल, चेकोस्लोवाकिया के पूर्व राष्ट्रपति, दक्षिण अफ्रीका के आर्कबिशप डेसमंड टूटू, चंडी प्रसाद भट्ट और योही ससाकावा, जापान को भी प्राप्त हुआ है। हाल के पुरस्कार विजेताओं में सुल्तान कबूस बिन सैद अल सैद, ओमान (2019) और बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान (2020), बांग्लादेश शामिल हैं।

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