समस्याओं से निपटने का तरीका योगी सरकार से सीखें राज्य

By योगेंद्र योगी | Nov 18, 2025

अपराधियों से निपटने और धार्मिक स्थलों की आड़ में आम लोगों का जीना दुश्वार करने वाले लोगों को कानून का पाठ पढ़ाने की सीख उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ की सरकार से देश के अन्य राज्यों की सरकारों को भी लेनी चाहिए। दलगत राजनीति से हटकर योगी सरकार ने साबित कर दिया है कि यदि इरादे मजबूत और व्यापक जनहित से जुड़े हों तो समझाइश से भी समस्या का हल किया जा सकता है। ऐसा धार्मिक स्थलों पर कानफाडू लाउडस्पीकर्स को हटा कर किया गया। योगी सरकार ने साफ कर दिया है कि धार्मिक स्थलों पर लगे लाउडस्पीकर्स की तेज आवाज से होने वाला ध्वनि प्रदूषण बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। लखनऊ में ध्वनि प्रदूषण रोकने के लिए विशेष अभियान चलाया। राजधानी लखनऊ में धार्मिक स्थलों पर अवैध रूप से लगे लाउड स्पीकर हटाने का अभियान के तहत वजीरगंज इलाके में पुलिस की टीम ने मस्जिदों और मंदिरों में लगे लाउडस्पीकर और स्पीकर हटवाए।

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लखनऊ जोन में भी कम से कम 350 लाउडस्पीकर हटाए गए। आगरा जोन में भी करीब 150 लाउडस्पीकर हटाए गए। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ध्वनि प्रदूषण से आम जनता को परेशानी न हो और शांति व्यवस्था बनी रहे। लाउडस्पीकर का इस्तेमाल नियमों के दायरे में ही होना चाहिए, ताकि किसी को असुविधा न हो। गौरतलब है कि योगी सरकार ने 2022 से यूपी के धार्मिक स्थलों से अवैध लाउडस्पीकर हटाने का अभियान शुरू किया था और अब तक यूपी में धार्मिक स्थलों से एक लाख से ज्यादा लाउडस्पीकर्स हटाये जा चुके हैं वहीं, डेढ़ लाख से ज्यादा लाउडस्पीकर्स की आवाज कम की जा चुकी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि धार्मिक आयोजन धार्मिक स्थल के भीतर तक ही सीमित होने चाहिए। सड़क पर किसी भी पर्व त्यौहार का आयोजन नहीं होना चाहिए,वहीं लाउडस्पीकर दोबारा न लगे यह जिम्मेदारी जिलाधिकारियों की होगी। योगी आदित्यनाथ ने कहा कि किसी भी धार्मिक कार्यक्रम का आयोजन धार्मिक स्थल के परिसर में ही होना चाहिए। रास्तों में इसका आयोजन नहीं होना चाहिए।

गौरतलब है कि महाराष्ट्र में लाउडस्पीकर पर हो रहे अजान को लेकर राज ठाकरे ने महाराष्ट्र सरकार को चेतावनी दी थी। इसके बाद से ही देश के कई राज्यों में लाउडस्पीकर के खिलाफ आवाज उठने लगी। शहरी ध्वनि प्रदूषण चुपचाप हमारे समय की सबसे उपेक्षित जन स्वास्थ्य समस्याओं में से एक बनकर उभरा है। ध्वनि प्रदूषण सिर्फ़ पर्यावरणीय उदासीनता नहीं है। यह संवैधानिक उपेक्षा की सीमा पर है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, शांत क्षेत्रों में सुरक्षित सीमा दिन में 50 डीबी (ए) और रात में 40 डीबी (ए) है। फिर भी, दिल्ली और बेंगलुरु जैसे शहरों में, संवेदनशील संस्थानों के पास रीडिंग अक्सर 65 डीबी (ए)-70 डीबी (ए) तक पहुँच जाती है। शहरी ध्वनि प्रदूषण और त्यौहारों का शोर सुनने की क्षमता के लिए खतरा बन रहा है। जब "शांत क्षेत्र" शोर का केंद्र बन जाते हैं, तो यह राज्य की क्षमता और नागरिक सम्मान पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। साल 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने पुनः पुष्टि की कि पर्यावरणीय व्यवधान - जिसमें अत्यधिक शोर भी शामिल है। अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और सम्मान के मौलिक अधिकार का उल्लंघन कर सकते हैं। ध्वनि प्रदूषण (वी) मामले में, न्यायालय ने माना कि अनियंत्रित शहरी शोर मानसिक स्वास्थ्य और नागरिक स्वतंत्रता के लिए एक गंभीर खतरा पैदा करता है।

भारत में ध्वनि प्रदूषण से होने वाली मौतों का कोई सटीक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, लेकिन अनुमान है कि इससे हुए इस्कीमिक हृदय रोग के कारण लगभग 12,000 मौतों और प्रति वर्ष 48,000 नए मामलों के लिए जिम्मेदार है। ध्वनि प्रदूषण से उच्च रक्तचाप, तनाव, नींद की कमी और सुनने में समस्या जैसी कई स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं, जो अप्रत्यक्ष रूप से मौतों का कारण बन सकती हैं। पर्यावरण क्षेत्र में कार्य करने वाली अर्थ फाइवआर संस्था ने 2023 में भारत में ध्वनि प्रदूषण पर एक व्यापक सर्वेक्षण में बताया गया कि आवासीय क्षेत्रों में ध्वनि प्रदूषण का शोर का स्तर 50 डीबी की सीमा से लगभग 50 प्रतिशत अधिक था। 80 डीबी वाली ध्वनि कानों पर अपना प्रतिकूल असर शुरू कर देती है। 120 डीबी की ध्वनि कान के पर्दों पर भीषण दर्द उत्पन्न कर देती है और यदि ध्वनि की तीव्रता 150 डीबी अथवा इससे अधिक हो जाए तो कान के पर्दे फट सकते हैं, जिससे व्यक्ति बहरा हो सकता है।

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में खुलासा किया गया कि भारत में ध्वनि प्रदूषण की वजह से कम सुनने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत 6.3 करोड़ की आबादी ऐसी है, जो सुनाई नहीं देने की समस्या से पीड़ित है। इतना ही नहीं यूनाइटेड नेशंस एनवाइयरमेंट प्रोग्राम की ओर से जारी कई गई वार्षिक ‘फ्रंटियर रिपोर्ट 2022 में भारत के मुरादाबाद शहर को विश्व का दूसरे नंबर का सबसे अधिक ध्वनि प्रदूषित शहर घोषित किया गया था। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि ध्वनि प्रदूषण की वजह से शारीरिक और मानसिक कल्याण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। खासकर इन एक्टिविटीज से भारत के युवा अपनी श्रवण क्षमता यानी सुनने की क्षमता तेजी से खोते जा रहे हैं। यही हाल रहा, तो साल 2030 तक भारत में कम सुनने वालों की संख्या दोगुनी से ज्यादा यानी 13 करोड़ से ज्यादा हो जाएगी। इस रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि भारत में 10 में से दो लोग ही इस समस्या का इलाज करवाते हैं और श्रवण यंत्र पहनते हैं।

नॉर्थ अमेरिका ब्रीडिंग बर्ड सर्वे के मुताबिक पिछले 50 वर्षों में गौरैयों की संख्या 82 प्रतिशत तक कम हो चुकी है। शहरों में बढ़ता हुआ प्रदूषण गौरैयों के जीवन के लिए सबसे बड़ा संकट है। विश्व के सभी देशों में पर्यावरण प्रदूषण एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। पृथ्वी पर संतुलन बनाने के लिए जीव-जंतु, पेड़-पौधें, जल और इंसानों आदि का एक संतुलित संख्या में होना बेहद जरूरी है। इन सभी के संतुलन से ही पृथ्वी पर जीवनचक्र बना रहता है लेकिन बढ़ते प्रदूषण से हम जो सांस लेते हैं, खाना खाते हैं, पानी पीते हैं, उन सभी में किसी न किसी प्रकार से प्रदूषण के कण हमारे अंदर तो आते ही हैं। इसके साथ ही पशु-पक्षियों का भी अस्तित्व संकट में है। पक्षियों को जल और वायु प्रदूषण से तो खतरा है ही इसके साथ ध्वनि प्रदूषण से उनकी प्रजनन क्षमता पर असर पड़ रहा है। जर्मनी के मैक्स प्लैँक इंस्टीट्यूट फॉर ऑर्निथोलॉजी के शोधार्थियों ने जेब्रा फिंच नाम के पक्षी पर अध्ययन किया है। इस अध्ययन के मुताबिक पक्षियों के प्रजनन की शक्ति घट रही है और उनके व्यवहार में भी परिवर्तन देखा गया है। अध्ययन में दावा किया गया है कि शोर की वजह से पक्षियों के गाने-चहचहाने पर भी फर्क पड़ता है। कंजर्वेशन फिजियोलॉजी नाम की पत्रिका में यह अध्ययन प्रकाशित भी किया गया है।

भारत का कानूनी ढाँचा, कागज़ों पर तो मज़बूत है, लेकिन उसके क्रियान्वयन में बिखराव है। ध्वनि प्रदूषण नियम, 2000 को शहरी वास्तविकताओं के अनुरूप शायद ही कभी क्रियान्वित किया जाता है। नगर निकायों, यातायात पुलिस और प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के बीच समन्वय बहुत कम है। राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों के अनुरूप एक राष्ट्रीय ध्वनिक नीति की तत्काल आवश्यकता है। ऐसे ढाँचे में सभी क्षेत्रों में अनुमेय डेसिबल स्तरों को परिभाषित किया जाना चाहिए, नियमित ऑडिट अनिवार्य किए जाने चाहिए और स्थानीय शिकायत निवारण तंत्र को सशक्त बनाया जाना चाहिए। अंतर-एजेंसी तालमेल के बिना, प्रवर्तन छिटपुट और प्रतीकात्मक ही रहेगा।

शहरी शोर के विरुद्ध लड़ाई केवल नियामक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक भी है। शहरों को ध्वनि-सहिष्णुता की साझा नैतिकता विकसित करनी होगी। जन अभियानों को नारों से आगे बढ़कर स्कूलों, चालक प्रशिक्षण कार्यक्रमों और सामुदायिक स्थलों में गहन शिक्षा तक पहुँचाना चाहिए। जब तक भारत शहरी शोर के प्रति अधिकार-आधारित दृष्टिकोण नहीं अपनाता, तब तक उसके स्मार्ट शहर ध्वनि के स्तर पर रहने लायक नहीं रह पाएँगे।

- योगेन्द्र योगी

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